परोपकारी सन्त के विचार

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परोपकारी सन्त के विचार

भारत संतों का देश है। यहाँ एक से बढ़कर एक संत हुए हैं। एक ऐसे ही संत हुए जो बहुत ही सदाचारी और लोकसेवी थे। उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य परोपकार था। एक बार उनके आश्रम के निकट से देवताओं की टोली जा रही थी।

संत आसन जमाये साधना में लीन थे। आखें खोली तो देखा सामने देवतागण खड़े हैं। संत ने उनका अभिवादन कर उन सबको आसन दिया। उनकी खूब सेवा की।

देवतागण ने उनके इस व्यवहार और उनके परोपकार के कार्य से प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने को कहा। संत ने आदरपूर्वक कहा - “हे देवगण! मेरी कोई इच्छा नहीं है। आप लोगों की दया से मेरे पास सब कुछ है।”

देवतागण बोले - “आपको वरदान तो माँगना ही पड़ेगा क्योंकि हमारे वचन किसी भी तरह से खाली नहीं जा सकते।”

संत बोले - “हे देवगण! आप तो सब कुछ जानते हैं। आप जो वरदान देंगें वह मुझे सहर्ष स्वीकार होगा।”

देवगण बोले - “जाओ! तुम दूसरों की और भलाई करो। तुम्हारे हाथों दूसरों का सदा कल्याण हो।”

संत ने कहा - “महाराज! यह तो बहुत कठिन कार्य है?

देवगण बोले - “कठिन! इसमें क्या कठिन है?

संत ने कहा - “मैंने आज तक किसी को भी दूसरा समझा ही नहीं है, फिर मैं दूसरों का कल्याण कैसे कर सकूँगा?

सभी देवतागण संत की यह बात सुन एक दूसरे का मुंह देखने लगे। उन्हें अब ज्ञात हो गया कि ये एक सच्चा संत है। देवों ने अपने वरदान को दोहराते हुए पुनः कहा - “हे संत! अब आपकी छाया जिस पर भी पड़ेगी, उसका कल्याण होगा।”

संत ने आदर के साथ कहा - “हे देव! हम पर एक और कृपा करें। मेरी वजह से किस-किस की भलाई हो रही है, इसका पता मुझे न चले। नहीं तो इससे उत्पन्न अहंकार मुझे पतन के मार्ग पर ले जायेगा।”

देवगण संत के इस वचन को सुन अभिभूत हो गए। परोपकार करने वाले संत के ऐसे ही विचार होते हैं।

संत ने पुनः आदर के साथ कहा - “हे देव! यदि मेरी छाया आगे पड़ेगी, तो मुझे ज्ञात हो जाएगा कि मेरे द्वारा इसका कल्याण हो रहा है। इसका कोई उपाय करें।

देवगण बाले - ठीक है। इसका एक ही उपाय है। हम तुम्हें वरदान देते हैं कि जो तुम्हारे पीछे तुम्हारी छाया में चलेगा, उसका सदा कल्याण होगा।

इसीलिए जहाँ-जहाँ संत के चरण पड़ते हैं, सामान्य जन उनके पीछे-पीछे चल कर उनकी छत्रछाया में अपना कल्याण करते हैं।

यदि परोपकार का यह विचार लोगों में आ जाए तो पूरे संसार में कहीं दुःख नहीं होगा। कहीं कोई ग़रीब नहीं होगा। कहीं अभाव और अशिक्षा नहीं होगी।

किसी ने कहा था कि -

“मांगो उसी से, जो दे दे खुशी से। जो दे दे खुशी से और कहे न किसी से।”

सदैव प्रसन्न रहिये।

जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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