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Learn to adjust

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समायोजन और समझौता करना सीखो। Learn to adjust and compromise. प्रत्येक व्यक्ति की यह इच्छा होती है कि जीवन में सभी बातें वैसी ही होनी चाहिएं, जैसी वह चाहता है और यह कि दुनिया उसके प्रति दयालु और ईमानदार होनी चाहिए। लोग उसके साथ आदर व विनम्रता का व्यवहार करें और यह कि केवल उसके विचार और दृष्टिकोण ही स्वीकार किए जाने चाहिएं और लागू किए जाने चाहिएं। पर दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है और ऐसा कभी हो भी नहीं सकता। यह संसार बहुत पेचीदा है और इसे केवल तुम्हारे और मेरे मन की चंचलताओं और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नहीं बनाया गया है। संसार कुछ विशेष योजनाओं और दैवीय नियमों के अनुसार दौड़ रहा है और किसी की इच्छाओं और आवश्यकताओं के अनुसार नहीं। पुराना पेड़ और नई हवा एक नदी के किनारे एक बहुत पुराना और विशाल बरगद का पेड़ था। वह अपनी मजबूती पर बहुत घमंडी था। वहीं पास में ही एक छोटी-सी, लचीली घास भी उगी हुई थी। एक दिन जोर का तूफान आया। बरगद का पेड़ अपनी अकड़ में खड़ा रहा, उसने सोचा कि वह तूफान का मुकाबला करेगा। उसने लचीलापन नहीं दिखाया, वह झुका नहीं। नतीजा यह हुआ कि जब हवा और तेज हुई, तो बरगद का पेड़ जड़ से ...

Avoid stress of perfection

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  पूर्ण प्रवीणता और आदर्शवादिता के तनाव से बचो। . Avoid stress of perfection and  idealism. इस दुनिया में बहुत से लोग हैं जो हमेशा तनाव में रहते हैं क्योंकि वे प्रत्येक काम में पूर्ण दक्षता की उम्मीद रखते हैं परन्तु वे इसे पाने में समर्थ नहीं होते। इस संबंध में कृपया यह समझें कि पूर्ण दक्षता का गुण तो केवल ‘भगवान’ के पास है। परिभाषा के अनुसार- हम मनुष्य शत-प्रतिशत प्रवीण नहीं हो सकते। सवाल यह नहीं है कि हम किस स्तर तक पहुँचे हैं, लेकिन यह सच है कि हम ग़लतियां करना नहीं छोड़ पाते। हम अपने सतत ज्ञान व अभ्यास से अपनी अप्रवीणता को कम तो कर सकते हैं, लेकिन हम निष्कलंक प्रवीणता को प्राप्त नहीं कर सकते। एक मनुष्य केवल तभी पूर्ण दक्षता प्राप्त कर सकता है, जब वह चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँच जाए, जिसे ‘मोक्ष’ या ‘निर्वाण’ या ‘मुक्ति’ या ‘भगवद् सत्ता की अनुभूति’ की अवस्था कहते हैं। इस अवस्था में वह एक सामान्य व्यक्ति नहीं रहता और भगवान का सह-भागीदार बन जाता है। उसे फिर पाठ सीखने या प्रवीणता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रह जाती और वह जन्म और मृत्यु के चक्कर से आज़ाद हो जाता है। मिट्टी का ...

Eliminate self-centeredness

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अपनी बातों और कामों के बारे में आत्म-केन्द्रितपना या आत्म-प्रशंसा का भाव छोड़ दो।  Eliminate self-centeredness in your talking and dealings. कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी सारी बातचीत मुझे, मेरा, मैं या मैंने यह किया, मुझे यह अच्छा लगता है और इसी प्रकार की बातों से भरी होती हैं। इसमें हम भी शामिल हैं। उनकी बातों से यह ज़ाहिर होता है कि उनसे अच्छा इस दुनिया में कोई भी नहीं है। वास्तव में केवल अपने बारे में बोलना या सोचना संकुचित बुद्धि के निम्न स्तर का लक्षण है, जिसके द्वारा हम अपने आप को बहुत छोटा बना लेते हैं। हम अधिक समय तक भगवान की महान लीला के प्रतिभागी और इस विश्व का एक हिस्सा नहीं रहते, हम अलग हो जाते हैं और इसलिए बाहरी दुनिया से नाख़ुश और बेचैन महसूस करते हैं। अपने आप को इस दुनिया का हिस्सा समझो और भगवान की विशाल लीला का एक अंग मानो, जो यहां फैली हुई है। तुम अन्य व्यक्तियों से अलग नहीं हो। हम सब की सामान्य आवष्यकताएं और लक्ष्य एक हैं। हम सब का भगवान के साथ एक जैसा सम्बन्ध है। सारे विश्व को ध्यान में रखते हुए व सामान्य लाभ को ध्यान में रखते हुए कुछ सोचना और विभिन्न कार्यों को करना ...

Do you feel lonely.

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क्या आप अकेलापन और ऊब अनुभव कर रहे हो? Do you feel lonely & bored. आध्यात्मिक भाषा में अकेला आदमी वह है जो अपने आप को नहीं जानता और वास्तव में अपना सामना नहीं कर सकता। केवल ऐसा व्यक्ति ही अपने मन को व्यस्त रखने के लिए अन्य वस्तुओं और व्यक्तियों  के पीछे भागता है। जब उसे कोई वस्तु या व्यक्ति अपने दिमाग़ को व्यस्त  रखने के लिए नहीं मिलता तो वह ऊब जाता है। ऊबाऊपन किसी वस्तु  को चाहने, लेकिन उसे न पाने पर होता है। वह यह नहीं जानता कि अपने  अन्तर्मन की ओर ध्यान मोड़ कर किसी बाहरी वस्तु के बिना भी आनन्द  अनुभव किया जा सकता है। वह आन्तरिक आनन्द और शान्ति को  अनुभव करने में असफल रहता है जो प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर उसकी  आत्मा में या मन में गहरे गुप्त स्थान पर विद्यमान रहती है।   लेकिन अपनी सन्तुष्टि के लिए अन्य वस्तुओं और व्यक्तियों पर  निर्भर रहना अत्यन्त मायावी (छलने वाला) है क्योंकि इस दुनिया में कुछ  भी स्थाई रूप से तुम्हारे साथ रहने वाला नहीं है। प्रत्येक वस्तु या व्यक्ति  तुम्हें एक दिन छोड़ जाएगा और तब चाहे इच्छा से या बलपूर्व...

चिर-वियोग के पल

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 चिर-वियोग के पल सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Sung by Bindu Jain, Delhi कोई ऐसे भी कहीं, जाता है सबसे रूठ कर;  और जाता भी है तो, फिर लौट क्यों आता नहीं।  (1)  क्या हुई गुस्ताखियाँ, जो आपने मोड़ा है मुख,  ऐसा साथी इस जहां में, हर कोई पाता नहीं।  (2)  आपने अंगुली पकड़, चलना हमें सिखला दिया;  अब तो अपने पाँव पर भी, है चला जाता नहीं।  (3)  आशियाँ हमको मिला है, ये बदौलत आपकी;  आज इस आँगन में तेरा अक्स भी पाता नहीं।  (4)  छिप कर खड़े हो क्यों यहां, सबको रुलाने के लिए;  महसूस होता है मगर, क्यों सामने आता नहीं।  (5)  है यही अरदास भगवन्, हमको कुछ तो शक्ति दो;  वरना इक पल याद को, तेरी भुला पाता नही। द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद।  

Learn to give up

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  ख़ुशी प्राप्त करने के लिए बेकार के विचारों को छोड़ना सीखो और जाने दो।  Learn to give up & let go. कुछ लोग सोचते हैं कि किसी के विकास और ख़ुशी का रास्ता जितनी संभव हो सके उतनी अधिक से अधिक वस्तुएं इकट्ठी करना, जीवन में जितना संभव हो सके अधिक से अधिक लोगों के साथ संबंध रखना, जितना संभव हो उतनी नौकरियां या काम बदलना, जहां तक हो सके अधिक से अधिक स्थानों पर घूमने जाना है। लेकिन ऐसे लोग जब अपने जीवन के अन्तिम भाग में पहुँच कर अतीत पर दृष्टि डालते हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है कि वे किस लिए इतनी भागदौड़ कर रहे थे। वास्तव में सत्य यह है कि ख़ुशी वस्तुओं या विचारों को इकट्ठा करने में नहीं, बल्कि छोड़ने और जाने देने में है। जितना अधिक तुम छोड़ोगे, उतनी ही अधिक शांति और हल्कापन अनुभव करोगे। यहाँ एक लघुकथा है जो जीवन के दृष्टिकोण को बदलने का संदेश देती है: चाय का कप और समझदार बुजुर्ग एक युवक अपनी नौकरी में आई एक छोटी-सी समस्या को लेकर बेहद परेशान था। उसे लग रहा था कि उसका करियर खत्म हो गया है और जीवन में अब सब कुछ बर्बाद हो गया है। वह रोता हुआ अपने दादाजी के पास गया और अपनी आपबीती सुनाई। द...

Don't make catastrophe

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Don't make catastrophe out of unpleasant events of life. जीवन की अप्रिय घटनाओं को बड़ी आफ़त न बनाओ। हमारे जीवन में बहुत सी अप्रिय घटनाएं घटित होती हैं लेकिन वे हमें अव्यवस्थित (upset) नहीं कर सकती, जब तक हम अपने आप से निम्नलिखित बातें कर के उन्हें बड़ी आफ़त नहीं बना लेते- 1) यह मेरे जीवन की बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है, इसलिए इसके बारे में मुझे अवश्य चिन्तित होना चाहिए। 2) जीवन में केवल यही एक दुर्घटना है, इसलिए मुझे इस पर लगातार सोचना चाहिए। 3) यही संसार का अन्त है। 4) यह जीवन और मृत्यु वाली परिस्थिति है। 5) दुनिया समाप्त होने जा रही है। या इसी प्रकार का कोई अशुभ विचार।  लेकिन क्या ऐसा है? क्या जीवन में कोई घटना वास्तव में इतनी महत्त्वपूर्ण या भयानक हो सकती है? हज़ारों ज्ञान प्राप्त व्यक्तियों के अनुभव, जिन्होंने जीवन के कई तूफ़ानों का सामना स्वयं किया था, यह दिखाते हैं कि इस जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे आफ़त या असहनीय कहा जा सके। प्रत्येक घटना को शांति से स्वीकार किया जा सकता है। किसी बुरी घटना से अपरिहार्य संबंध दिखाना और उसका उपचार करने का साधन जुटाना ठीक है लेकिन आवष्यकता से अधिक सम...

Be grateful to God.

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  अपने जीवन के हर ऐश्वर्य और आराम के लिए भगवान के धन्यवादी बनो।  Be grateful to God for every luxury and comfort of your life. इस जीवन में हम बहुत सी सुविधाओं का आनन्द लेते हैं। हम में से कई लोग अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने में बहुत भाग्यशाली होते हैं। उदाहरण के लिए हमें रहने के लिए एक घर, पहनने के लिए कपड़े, पीने के लिए पानी, अपने दुःख-सुख को बांटने के लिए परिवार, अपनी सामाजिक आवष्यकताओं को पूरा करने के लिए पड़ोसी, जीवन-यापन के लिए और अपने आप को व्यस्त रखने व कमाने के लिए नौकरी और 70-80 साल तक अपने कार्य कलापों को चलाने के लिए अच्छा स्वास्थ्य मिला है। लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा है कि किसकी कृपा से हम इन सब का आनन्द उठा रहे हैं? क्या यह हमारी शक्ति के अन्दर था या अन्य किसी व्यक्ति की ताकत का कमाल है, जिसने हमारे लिए इस पृथ्वी पर हमें लम्बे जीवनकाल तक चलने वाला इतना सामान उपलब्ध कराया? निश्चय ही नहीं। हमारी आरामदायक ज़िन्दगी के लिए यह सब जादुई तामझाम केवल भगवान के द्वारा ही बनाया जा सकता है और हमें प्रदान किया जा सकता है। इसलिए तब क्या यह हमारा पुनीत कर्त्तव्य नहीं बनता कि ...

अंधेरी रात

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अंधेरी रात सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा   Sung By - Bindu Jain, Delhi रात बनी काली नागिन, यह मुझको डसने आई है, लहराती और बल खाती यह मुझमें बसने आई है। (1)  कहाँ गए वो सोने से दिन, और चाँदी सी रातें,  मेरा मन बहलाती थीं जब मीठी-मीठी बातें; अब तो मन बहलाने को मैं और मेरी तन्हाई है,  रात बनी..........। (2)  जीवन इक सपना-सा लगता, आँख खुली और टूट गया,  चला साथ जो अब तक मेरे, पल भर में ही छूट गया। सपना तो सच हुआ नहीं, यह विरह बना सच्चाई है,  रात बनी..........। (3)  इस मतलब की दुनिया में, देखा यह गोरख धन्धा है,  अपने-अपने सुख पाने को, व्याकुल हर इक बंदा है; बीती बातें याद करूँ तो, आती मुझे रुलाई है,  रात बनी..........।  (4)  जाने कब होगा प्रभात और फिर से चिड़ियां चहकेंगी, मेरे मन की बगिया जाने, कब फूलों से महकेगी; राग मिलन का सुना नहीं] विरहा की गज़ल सुनाई है,  रात बनी..........। द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्...

External circumstances & stress.

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  बाह्य परिस्थितियां अपने आप में तनाव उत्पन्न नहीं कर सकती। External circumstances, on their own, can't create stress. कुछ लोगों की यह ग़लत धारणा है कि कुछ बाह्य कारण या कोई अन्य व्यक्ति उनके तनाव का ज़िम्मेदार है और जब तक ये बाह्य परिस्थितियां नहीं बदलती, वे ख़ुश नहीं रह सकते। लेकिन ये तनाव के कारणों के नियम के बारे में ग़लत धारणा है। प्रायः तुम्हारे चारों ओर के लोगों और परिस्थितियों को तुम नहीं बदल सकते, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम जीवन भर तनावग्रस्त रहोगे। जैसा पहले बताया गया है, यह बाह्य परिस्थितियां नहीं, बल्कि उनके प्रति तुम्हारी प्रतिक्रिया है जो तनाव का कारण है। तुम अपनी प्रतिक्रियाओं को इस प्रकार नियंत्रित कर सकते हो, जैसे जो कुछ बाहरी दुनिया में घटित हो रहा है, वह तुम्हें भावनात्मक रूप से कभी प्रभावित नहीं कर सकता, चाहे कुछ भी हो जाए। यह नियंत्रण तुम्हारे मन को बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त करने के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करेगा। इस परिस्थिति में मन एक स्वामी की तरह और बाह्य परिस्थितियां एक दास की तरह व्यवहार करेंगी, ताकि मन बाह्य परिस्थितियों पर नियंत्रण कर सके...

प्यारी बिटिया

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  प्यारी बिटिया सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Presented by Bindu Jain, Delhi एक नन्हीं सी कली, मेरे आँगन में खिली;  उठाया जो मैंने गोद में, वह मुस्काई मन-मोद में; प्यार से जो मैंने सहलाया, चेहरा था उसका दमकाया;  दुलार के जल से सींचा मैंने,  वह बढ़ती गई और खिलती गई; बेटी बनकर मेरे घर में आई, मेरे मन की बगिया महकाई;  न चाहे उसने खेल, न उसका सजने को मन करता है; ”मम्मी मेरा तो केवल, कुछ लिखने को मन करता है“;  नानी ने की भविष्यवाणी, लेखिका बनेगी यह तो इक दिन; जग में नाम कमाएगी, और सबकी शान बढ़ाएगी;  जीवन उसका संगीत बन गया, और संगीत बना जीवन; अपनी मंजिल पाने को वह, तत्पर रहती थी हर पल; कली खिली और फूल बन गई, सारा चमन महका गई;  इक दिन माँ का छोड़ के आँगन, पिया के घर की शोभा बनी; अब मैं....अब मैं घर में रह गई अकेली, जैसे बिछड़ गई हो कोई सहेली; वो हँसती थी बतियाती थी, सब की उलझन सुलझाती थी;  सब के कामों में हाथ बँटा, वह पढ़ती और पढ़ाती थी;  वह हँसी गूँजती कानों में, पर आँखें देख न पाती हैं;  उस की बातों को याद ...

Don’t always misunderstand others.

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 दूसरों को हमेशा ग़लत मत समझो।  Don’t always misunderstand others. कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हमेशा दूसरों को ग़लत समझते हैं। वे हमेशा यह महसूस करते हैं कि अन्य व्यक्तियों के कार्यों का उद्देश्य केवल उन्हें हानि पहुँचाना और उनका अपमान करना ही है। उनके काम के लिए कोई छोटी-सी सलाह देना या टिप्पणी करना, उन्हें व्यक्तिगत अपमान और आलोचना दिखाई देता है। प्रत्येक बातचीत बहस के लिए चुनौती प्रतीत होती है। वास्तव में प्रत्येक अनजान या नई वस्तु को ख़तरे की आशंका से समझना हमारी असामान्य प्रकृति की मौलिक भावनाओं में से एक है। महर्षि पतंजलि ने अपने ‘योग शास्त्र’ में भी कहा है ‘मन का स्वभाव है- संदेह करना।’ लेकिन ठीक ध्यान व उचित ज्ञान के द्वारा इस स्वाभाविक कमज़ोरी पर विजय प्राप्त की जा सकती है और इसे दूर किया जा सकता है। यदि हम इस पर गहराई से चिन्तन करें तो हमें पता चलेगा कि यह सबको ग़लत समझने की भावना दूसरों से अलग हो जाने की भावना के कारण पनपती है। हम महसूस करते हैं कि हम बाकी दुनिया से अलग हैं और इसलिए सारी दुनिया दुश्मन की तरह लगती है और हमें अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए सुनिश्चित होने के ल...