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मित्र की परिभाषा

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मित्र की परिभाषा  एक बार उद्धव जी ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा - हे "कृष्ण"! आप तो महाज्ञानी हैं, भूत, वर्तमान व भविष्य के बारे में सब कुछ जानने वाले हो आपके लिए कुछ भी असम्भव नही। मैं आपसे मित्र धर्म की परिभाषा जानना चाहता हूँ। उसके गुण धर्म क्या क्या हैं? भगवान बोले - उद्धव! सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति के समय बिना मांगे ही अपने मित्र की सहायता करे। उद्धव जी ने बीच मे रोकते हुए कहा - "हे कृष्ण"! अगर ऐसा ही है, तो फिर आप तो पांडवों के प्रिय बांधव थे। एक बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर विश्वास किया, किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, उसके अनुरूप मित्रता नही निभाई। आप चाहते तो पांडव जुए में जीत सकते थे। आपने धर्मराज युधिष्ठिर को जुआ खेलने से क्यों नही रोका।  ठीक है! आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन यदि आप चाहते तो अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा पासे को धर्मराज के पक्ष में भी तो कर सकते थे, लेकिन आपने भाग्य को धर्मराज के पक्ष में भी नहीं किया। आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और स्वयं को हारने के बाद भी तो रोक सकते थे। उसके बाद जब धर्मराज ने अपने भाइयों को दांव पर ल...

सच्ची कहानी

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॥ सच्ची कहानी: पुणे स्टेशन, 2018 ॥ पुणे रेलवे स्टेशन के बाहर एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। उस दुकान के मालिक थे रमेश अन्ना—62 वर्ष के, जिनकी एक टांग दिव्यांग थी। वे हर सुबह 5 बजे दुकान खोलते और रात 11 बजे तक चाय बेचते। एक कप चाय की कीमत थी 5 रुपये... और उसके साथ मुफ्त में मिलती थी एक मुस्कान। लोग चाय पीते, 10 मिनट बैठकर बातें करते और हल्का मन लेकर चले जाते। एक दिन किसी ने उनसे कहा,"अन्ना, आप तो मनोचिकित्सक (Psychiatrist) हैं।" अन्ना मुस्कुराकर बोले, "नहीं बेटा, मैं तो बस एक चायवाला हूँ। लेकिन मैंने ज़िंदगी का बहुत दुःख देखा है... इसलिए अपनी चाय में चीनी कम और प्यार ज़्यादा मिलाता हूँ।" एक दिन लगभग 25 साल का एक युवक आया। वह इंजीनियर था। उसने सूट पहन रखा था, लेकिन उसकी आँखें पूरी रात रोने की गवाही दे रही थीं। उसने कहा,"अन्ना, एक कटिंग चाय... ज़रा कड़क बनाना।" अन्ना ने चाय दी। लड़के ने एक ही घूंट में पूरी चाय पी ली। उसने जेब से 100 रुपये का नोट निकाला, मेज़ पर रखा और बोला, "अन्ना, बाकी पैसे आप रख लीजिए... यह मेरी ज़िंदगी की आख़िरी चाय है।" अन्ना के हा...

माॅं और छुट्टी

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माॅं और छुट्टी?         पता नहीं आज बेटे ने कौन सी शरारत कर दी 🤔 प्रिंसिपल ने अचानक एक माँ को स्कूल बुलाकर कहा— "आपके बेटे ने आज 'अगर मेरी माँ एक दिन के लिए छुट्टी पर चली जाए' विषय पर ऐसा निबंध लिखा है कि पूरी स्टाफ रूम में सन्नाटा छा गया। पहले सब हँस रहे थे... फिर सब रोने लगे।" माँ घबराकर कुर्सी पर बैठ गई। उसे लगा, पता नहीं बेटे ने कौन-सी शरारत कर दी होगी। प्रिंसिपल ने मुस्कुराते हुए कॉपी उसकी ओर बढ़ाई और कहा, "इसे घर जाकर मत पढ़िए... यहीं पढ़ लीजिए।" कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा था— "अगर मेरी माँ एक दिन के लिए छुट्टी पर चली जाए..." "पहले मुझे लगता था कि मेरी माँ दुनिया की सबसे गुस्सैल औरत है। सुबह पाँच बजे उठाकर पढ़ाई कराती है। टिफिन पूरा खत्म नहीं करूँ तो डाँटती है। देर तक मोबाइल चलाऊँ तो छीन लेती है। छुट्टी के दिन भी कहती है— कमरा साफ़ करो। मुझे लगता था कि काश... मेरी माँ एक दिन के लिए कहीं चली जाए। फिर पिछले सोमवार मेरी माँ बीमार पड़ गई। डॉक्टर ने उन्हें पूरा आराम करने को कहा। उस दिन पहली बार मेरी माँ सचमुच बिस्तर से नहीं उठी। सुबह अलार्म ...

अपनी पहचान

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अपनी पहचान एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत लौटा। वह एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ। उस रियासत के राजा को जब पता चला तो वे उनसे भेंट करने गए और बोले - हे महात्मन्! एक प्रश्न 20 वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं। कभी खुद से तो कभी दूसरों से। लेकिन अब तक कोई सतुष्ट कर देने वाला उत्तर नहीं मिला। क्या आप मुझे उत्तर देंगे? महात्मा ने कहा - निश्चित रूप से दूंगा, राजन्! आप पूछिए तो सही, क्या पूछना है? आज आप खाली हाथ नहीं लौटेंगे।  इस पर राजा ने कहा - मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं और हाँ! अब आप भी मुझे अन्य लोगों की तरह ईश्वर के बारे में समझाने का प्रयास मत करना। मैं बस अब सीधा ईश्वर से मिलना चाहता हूं।  सन्यासी ने कहा - अभी मिलना चाहते हो या थोड़ी देर ठहर कर!  “माफ करिये, महात्मन्! शायद आप भूल कर  रहे हैं। मैं परमपिता परमात्मा से मिलवाने  की बात कर रहा हूं. न की किसी ईश्वर नाम के व्यक्ति विशेष से।” संन्यासी मुस्कराए और बोले - “महानुभाव! भूलने की तो कोई गुंजाईश ही नहीं है। मैं तो 24 घंटे ईश्वर से मिलाने का ही काम करता हूं। अभी मिलोगे या थोड़ी देर ठहर कर। सीधे जबाब द...

इनाम

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इनाम सात वर्षीय बेटी दूसरी कक्षा में प्रवेश पा गयी.....  वह क्लास में  हमेशा से अव्वल आती रही है। पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाजार ले गया.... बेटी ने जूते लेने से यह कह कर मना कर दिया कि पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरूरत है। वे अभी इस साल काम दे सकते हैं.....  अपने जूतों की बजाए उसने मुझे अपने दादा की कमज़ोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा...  मैंने सोचा कि बेटी अपने दादा से शायद बहुत प्यार करती है, इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी समझ रही है.... खैर! मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा..... दुकानदार ने बेटी के साइज की सफेद शर्ट निकाली... डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी। फिर भी बेटी ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा.... मैंने बेटी से कहा....आराध्या बेटा.... ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है, तो फिर और लम्बी क्यों? .... बेटी ने कहा .... पापा जी मुझे शर्ट स्कर्ट के अंदर ही डालनी होती है, इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा.....लेकिन यही शर्ट म...

सर्वस्व न्योछावर

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  सर्वस्व  न्योछावर    एक थे ग्वारिया बाबा। वृन्दावन में ही रहते थे। बिहारी जी को अपना यार कहते थे। सिर्फ कहते ही नहीं, मानते भी थे। नियम था कि वे बिहारी जी को नित्य सायं शयन करवाने जाते थे।  एक बार शयन आरती करवाने जा रहे थे। बिहारी जी की गली में बढ़िया मोदक बन रहे थे। अच्छी खुशबू आ रही थी। चार मोदक मांग लिए बिहारी जी के लिए ! वृन्दावन के लोग बिहारी जी के भक्तों का बड़ा आदर करते हैं । उन्होंने मना नहीं किया। एक दोने में बांध दिये। बाबा भीतर गए तो बिहारी जी के भोग के पट बंद हो  चुके थे।  ग्वारिया बाबा जी ने वहीं अपना कम्बल बिछाया और उस पर बैठकर अपने मन के भाव में खो गए। वहाँ बिहारी जी की आरती का समय हुआ तो श्री गौसाई जी बड़ा प्रयास कर रहे हैं लेकिन ठाकुर जी के मंदिर का पट नहीं खुल रहा। बड़े हैरान इधर-उधर देख रहे। एक संत कोने में बैठे सब दृश्य आरंभ से देख रहे थे। पुजारी जी ने लाचारी से देखा तो संत बोले, ‘उधर ग्वारिया बाबा बैठे हैं उनसे पूछो वो बता देंगे। गौसाईं जी ने बाबा से कहा - रे बाबा! तेरे यार तो दरवाजा ही नहीं खोल रहियो?’ बाबा हड़बड़ा कर उठे। रोम रोम पुल...

चोरी का दंड

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  चोरी का दंड एक समय कांचीपुर नामक गांव में वज्र नाम का एक चोर रहता था। चोर नाम के भांति ही वज्र ह्रदय का था। उसे जिसका जो धन या सामान मिलता, वही चुरा लेता। उसे तनिक भी दया नहीं आती थी कि उस सामान के स्वामी को कितना कष्ट होगा ! वह चुराए हुए धन को सिपाहियों के भय से जंगल में जमीन के अंदर छुपा देता था ! एक रात वीरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली और चोर के जाने के पश्चात जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया और गड्ढे को पहले की भांति ढक दिया। लकड़हारा इतनी चालाकी से सामान निकलता कि चोर को इस चोरी का पता ही नहीं चल पता था। एक दिन लकड़हारा अपनी पत्नी को धन देते हुए बोला  कि तुम रोज धन माँगा करती थी, लो! आज पर्याप्त धन इक्कठा हो गया है। उसकी पत्नी ने कहा - जो धन अपने परिश्रम से उपार्जित न किया गया हो, वह स्थाई नहीं होता है। इसलिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिये। वीरदत्त को भी ये बात जच गयी ! इसलिए उसने इस धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया, जिसका पानी कभी भी नहीं सूखता था, लेकिन इसमें सीढ़ियाँ लगनी रह गयी थी और सारे पैसे समाप्त हो गये थे। तो वह फिर से छिप...

यम और नचिकेता

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 यम और नचिकेता की कथा:  आत्मज्ञान और समर्पण की अनमोल यात्रा यह कहानी  कठोपनिषद से है, जिसमें ऋषि वाजश्रवा, जो परम ज्ञानी थे, ने  विश्वजीत यज्ञ किया। इस यज्ञ के द्वारा उन्हें जीवन में किसी भी प्रकार के दुःख या विषाद से मुक्ति मिलनी थी, और वे हमेशा आनंदित रहना चाहते थे।  ऋषि वाजश्रवा ने यज्ञ के दौरान अपना सम्पूर्ण धन दान देने का संकल्प लिया था। उनके पास याचकों की लंबी कतार लगी थी, और वह लगातार अपनी संपत्ति दान करते जा रहे थे। पहले तो अच्छी चीज़ें जा रही थीं, लेकिन धीरे-धीरे केवल बूढ़ी गायें बच गईं।  इस समय बालक नचिकेता, जो केवल 6 या 7 साल का था, यह सब देख रहा था। उसने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, ये बूढ़ी गायें तो किसी काम की नहीं हैं, तो आप इन्हें क्यों दान कर रहे हैं?"  ऋषि वाजश्रवा ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने संकल्प लिया है कि मैं सम्पूर्ण धन दान करूंगा, इसलिए मैं इन्हें अपने पास नहीं रख सकता।" हालांकि, ऋषि ने यह नहीं सोचा कि दान हमेशा उपयोगी वस्तुओं का किया जाता है, जो दूसरों के काम आए। अनुपयोगी वस्तु दान करने से तो किसी पर बोझ ही पड़ता है। नचिके...

सच्चा सहयोग

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          सच्चा सहयोग  शिवानी, 29 वर्ष की, पेशे से टीचर और दिल से बेहद संवेदनशील महिला। शादी को तीन साल हुए थे। पति राहुल एक कंपनी में सीनियर इंजीनियर थे और अक्सर बाहर प्रोजेक्ट पर रहते थे। शिवानी सातवें महीने की गर्भवती थी, जब डॉक्टर ने कहा — “अब आपको आराम की ज़रूरत है, बेहतर होगा आप मायके चली जाएं। माँ-बाप पंजाब में रहते थे। राहुल उस वक्त चेन्नई में थे। राहुल ने फौरन अपने छोटे भाई आरव से कहा कि वो शिवानी को स्टेशन छोड़ दे। शिवानी भारी बैग और सूजन भरे पाँवों के साथ रेलवे स्टेशन पर पहुँची — लेकिन ट्रेन दो घंटे लेट थी। आरव ने कहा,"भाभी, मैं ज़रा ऑफिस का ज़रूरी मेल कर आता हूँ… लौटता हूँ तब तक आप बैठिए।" वो गया… और फिर लौटकर नहीं आया। शिवानी स्टेशन की बेंच पर बैठी थी। प्यास लगी थी, पीठ दर्द कर रही थी और हर बीतता मिनट उसे असहाय बना रहा था। तभी उसकी नजर एक दुबले-पतले, बूढ़े कुली पर पड़ी। उसकी उम्र 65 से ऊपर रही होगी। सिर पर सफेद टोपी, एक फटी कमीज़, और आँखों में भूख और इज़्ज़त दोनों की झलक। शिवानी ने इशारा किया — “बाबा, सामान रखवाना है ट्रेन में। प्लेटफॉर्म नंबर ...

खत्म कर दिए हैं मैंने

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  खत्म कर दिए हैं मैंने वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से खत्म कर दिए हैं मैंने गिले-शिकवे सफाईयों के सिलसिले, तुम भी थक गए होंगे हमें बुरा समझते समझते. जो तुमने समझा वो हम थे ही नहीं, जो हम थे वो तुमने समझा ही नहीं. जायज है गिला तुम्हारा, क्या किया है हमारे लिए, जो कुछ भी तुम्हारे पास है, हमने तो कुछ दिया ही नहीं जो हम से बन पड़ा, तुम से तो कुछ लिया ही नहीं. जो भी किया हमने, वो हमारा फर्ज था, अहसान नहीं किसी पर, हम पे तुम्हारा कर्ज था. अब मेरी तुम्हारी कोई अनबन या उलझन नहीं, मैं इतना आगे निकल और थक चुका हूँ सुधार रहा हूँ, तुम्हारे साथ चल नहीं सकता अब मेरा वो मन नहीं. माफ तो वो तुम्हें कर गई, तुम्हारी सेवा पर कुर्बान थी, मगर मैं विश्वास कर नहीं सकता, तुम्हारी कोई जुबान नहीं. तुम सब खुश रहो आबाद रहो मेरे प्यारों, मुझे अब किसी से भी कुछ भी चाहिए ही नहीं और दरकार भी नहीं. (वेद गावड़ी) द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने ...

One Rupee इडली ट्रस्ट

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  वन रूपी(One Rupee) इडली ट्रस्ट सुबह के 3 बजे थे. _Chennai Central railway station._ प्लेटफॉर्म पर चारों तरफ लोग सोए हुए थे. बीच में एक बुजुर्ग बैठे थे—उम्र 78 साल. सफेद धोती और शर्ट. हाथ में बाँस की टोकरी. टोकरी में गरमागरम इडली भरी हुई.   "इडली... गरम इडली... एक रुपया... सिर्फ एक रुपया..."   कोई ले नहीं रहा था. साल 2026. एक रुपये में टॉफी भी नहीं मिलती—और इडली? लोग उन्हें पागल समझकर हँस रहे थे. मेरा नाम अरविंद है. मैं Infosys जैसी एक IT कंपनी में काम करता हूँ. रात की शिफ्ट खत्म करके घर जा रहा था. AC गाड़ी, अच्छी नौकरी... पर भूख लगी थी. स्टेशन के स्टॉल पर इडली ₹50 की मिल रही थी. उन दादाजी पर नज़र गई. टोकरी में करीब 100 इडलियाँ. एक भी ग्राहक नहीं. उनकी आँखों में पानी था. मैं नीचे उतरा. "दादाजी, एक रुपये में इडली? घाटा नहीं होता क्या?"   वे हँसे.  "बेटा, ये घाटा नहीं. ये मुनाफा है."   "कैसे दादाजी? चावल, गैस, सबके दाम बढ़े हैं. एक इडली कम से कम ₹5 की पड़ती है. आप ₹1 में बेचते हो?"   वे टोकरी बंद करके बोले,   "एक कहानी...

अहंकार से बचें

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अहंकार से बचें  जो लोग घमंड करते हैं उनका सारा ज्ञान व्यर्थ है, इस बुराई की वजह से सब कुछ खत्म हो सकता है। रामकृष्ण परमहंस से जुड़ी एक प्रेरक कथा प्रचलित है।  एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी संत के साथ बैठे हुए थे। ठंड के दिन थे। शाम हो गई थी। तब संत ने ठंड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां  इकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों संत धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे। इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे भी ठंड लगी तो उसने भी कुछ लकड़ियां इकट्ठा कर लीं। अब लकड़ी जलाने के लिए उसे आग की जरूरत थी। वह तुरंत ही दोनों संतों के पास पहुंचा और धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया। एक व्यक्ति ने संत द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया तो संत गुस्सा हो गए। वे उसे मारने लगे। संत ने कहा कि तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई? तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया।  रामकृष्ण परमहंस ये सब देखकर मुस्कुराने लगे। जब संत ने परमहंसजी को प्रसन्न देखा तो उन्हें और गुस्सा आ गया। उन्होंने परमहंसजी से कहा, ‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं? ये व्यक्ति अपवित्र ह...

भोगे बिना छुटकारा नहीं

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  भोगे बिना छुटकारा नहीं शंख और लिखित दो सगे भाई थे। दोनों ने साथ में  गुरु और माता पिता के द्वारा शिक्षा पाई थी। पूजनीय आचार्यों से प्रोत्साहन पाया था, मित्रों द्वारा सलाह पाई थी। उन्होंने कई वर्षों के अध्ययन, चिंतन, अन्वेषण, मनन के पश्चात् जाना था कि दुनिया में सबसे बड़ा काम, जो मनुष्य के करने का है, वह यह है कि अपनी आत्मा का उद्धार करे।  वे दोनों भाई शंख और लिखित इस तत्व को भली प्रकार जान लेने के बाद तपस्या करने लगे। पास-पास ही दोनों के कुटीर थे। मधुर फलों के वृक्षों से वह स्थान और भी सुंदर और सुविधा जनक बन गया था। दोनों भाई अपनी अपनी तपो भूमि में तप करते और यथा अवसर आपस में मिलते जुलते।  एक दिन लिखित भूखे थे। भाई के आश्रम में गए और वहां से कुछ फल तोड़ लाए। उन्हें खा ही रहे थे कि शंख वहां आ पहुंचे। उन्होंने पूछा - यह फल तुम कहां से लाए? लिखित ने उन्हें हंसकर उत्तर दिया - तुम्हारे कुटीर से। शंख यह सुनकर बड़े दुःखी हुए। फल कोई बहुत मूल्यवान वस्तु नहीं थी। दोनों भाई आपस में फल लेते देते भी रहते थे, किंतु चोरी से या बिना पूछे नहीं। शंख ने कहा - भाई! यह तुमने बु...