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चार रत्न

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चार रत्न               एक वृद्ध संत ने अपने जीवन की अंतिम घड़ीयों को नज़दीक देख अपने बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा: मैं तुम बच्चों को चार कीमती रत्न दे रहा हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि तुम इन्हें सम्भाल कर रखोगे तो पूरी ज़िन्दगी इनकी सहायता से अपना जीवन आनंदमय तथा श्रेष्ठ बना पाओगे। 1~पहला रत्न है: “माफी” :~ हमारे लिए कोई कुछ भी कहे, हमें उसकी बात को कभी अपने मन में नहीं  बिठाना हैं और ना ही उसके लिए कभी किसी प्रतिकार की भावना मन में रखना हैं, बल्कि उसे माफ़ कर देना है। 2~दूसरा रत्न है: “भूल जाना” :~ अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद अपने मन में नहीं रखना। 3~तीसरा रत्न है: “विश्वास” :~ हमें अपनी मेहनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना हैं, क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते.. जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीं लिखा होगा। परमपिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास ही हमें अपने जीवन के हर संकट से बचा पाएगा और सफल करेगा। 4~चौथा रत्न है: “वैराग्य” :~ हमेशा यह याद रखें  ...

भगवान पर भरोसा

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भगवान पर भरोसा  भगवान पर भरोसा रहे तो सही रास्ता मिलता है ======================== एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में माधव नाम का एक साधारण व्यक्ति रहता था। वह भगवान श्रीकृष्ण का बहुत बड़ा भक्त था। हर सुबह सूर्योदय से पहले उठता, स्नान करता, अपने घर के छोटे से मंदिर में दीपक जलाता और पूरे मन से भगवान का स्मरण करता। उसके घर में धन-दौलत बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन उसे विश्वास था कि जब तक श्रीकृष्ण उसके साथ हैं, तब तक उसे किसी चीज की कमी नहीं हो सकती। लेकिन समय के साथ उसके जीवन में एक के बाद एक ऐसी परेशानियां आने लगीं कि उसका विश्वास भी डगमगाने लगा। कभी व्यापार में नुकसान होता, कभी खेत में फसल खराब हो जाती, कभी घर में कोई नई समस्या खड़ी हो जाती। वह हर बार भगवान के सामने सिर झुकाकर कहता कि प्रभु, मैं आपकी पूजा करता हूं, फिर मेरे जीवन में इतनी कठिनाइयां क्यों आती हैं? एक दिन समस्या इतनी बढ़ गई कि माधव का धैर्य पूरी तरह टूट गया। वह सुबह मंदिर में गया, भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने दीपक जलाया और कुछ देर तक चुपचाप खड़ा रहा। उसकी आंखों में आंसू थे और मन में बहुत सारे सवाल।  आखिरकार...

गलती

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गलती   एक बार एक राजा भोजन कर रहा था, अचानक खाना परोस रहे सेवक के हाथ से थोड़ी सी सब्जी राजा के कपड़ों पर छलक गई। राजा की त्यौरियां चढ़ गयीं। जब सेवक ने यह देखा तो वह थोड़ा घबराया, लेकिन कुछ सोचकर उसने प्याले की बची सारी सब्जी भी राजा के कपड़ों पर उड़ेल दी। अब तो राजा के क्रोध की सीमा न रही। उसने सेवक से पूछा, तुमने ऐसा करने का दुस्साहस कैसे किया?' सेवक ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया, 'महाराज ! पहले आपका गुस्सा देखकर मैनें समझ लिया था कि अब जान नहीं बचेगी। लेकिन फिर सोचा - लोग कहेंगे कि राजा ने छोटी सी गलती पर एक बेगुनाह को मौत की सजा दी। ऐसे में आपकी बदनामी होती। तब मैनें सोचा कि सारी सब्जी ही उड़ेल दूं। ताकि दुनिया आपको बदनाम न करे। और मुझे ही अपराधी समझे।' राजा को उसके जबाव में एक गंभीर संदेश के दर्शन हुए और पता चला कि सेवक भाव कितना कठिन है। जो समर्पित भाव से सेवा करता है, उससे कभी गलती भी हो सकती है फिर चाहे वह सेवक हो, मित्र हो, या परिवार का कोई सदस्य, ऐसे समर्पित लोगों की गलतियों पर नाराज न होकर उनके प्रेम व समर्पण का सम्मान करना चाहिए   द्वारा -- सरिता जैन सेवान...

संकल्प

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संकल्प एक गाँव में शिवराम नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह कट्टर नास्तिक था। भगवान का नाम सुनते ही उसका रक्त खौल उठता था। आस्तिकों से बातचीत करना भी वह अपने लिए अपमान समझता था। एक बार उसी गाँव में एक संत-महात्मा पधारे। उन्होंने कई दिनों तक प्रवचन दिए। पूरा गाँव श्रद्धा से उनका प्रवचन सुनने उमड़ पड़ा, किंतु शिवराम ने उधर झाँककर देखना भी उचित न समझा। एक संध्या वह खेत से लौट रहा था, तभी हवा में तैरती महात्मा जी की वाणी उसके कानों से टकराई— “यदि जीवन में सफल होना चाहते हो, तो मन में कोई दृढ़ संकल्प करो और पूरी निष्ठा से उसे पूर्ण करने में लग जाओ। एक न एक दिन उसका फल अवश्य मिलेगा।” वह इस वाक्य को अनसुना करना चाहता था, परंतु रात भर वही शब्द उसके मन में गूँजते रहे। लाख चाहने पर भी वह उन्हें भूल न सका। अंततः उसने निश्चय किया—“मैं इस कथन को झूठा सिद्ध करके रहूँगा!” पर वह कौन-सा संकल्प करे जिसका कोई फल ही न मिले? काफी सोच-विचार के बाद उसकी दृष्टि अपने घर के सामने रहने वाले कुम्हार पर पड़ी। उसने निश्चय किया— “मैं प्रतिदिन कुम्हार का मुँह देखे बिना भोजन नहीं करूँगा।” अपने इस विचार पर वह मन ही मन हँस ...

एक विदेशी पर्यटक और संत

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एक विदेशी पर्यटक और संत की कहानी  एक बार एक विदेशी पर्यटक भारत आया। घूमते-घूमते उसने एक शांत जगह पर एक महात्मा (संत) को देखा।संत के पास रहने के नाम पर केवल एक छोटी-सी घास की कुटिया थी, पहनने के लिए गिनती के दो वस्त्र थे, और खाने-पीने के लिए बस एक कमंडल था। पर्यटक ने आश्चर्य से संत को देखा और पूछा, "महाराज, आपका बाकी का सारा सामान, फर्नीचर, अलमारी और कपड़े कहाँ हैं?" संत मुस्कुराए और उन्होंने पर्यटक से ही पलटकर एक सवाल पूछा, "अच्छा, तुम यह बताओ—तुम्हारा बाकी का सामान कहाँ है?" पर्यटक ने गर्व से कहा, "मेरा बाकी सामान? अरे, मैं तो एक विदेशी पर्यटक हूँ। मैं यहाँ कुछ दिनों के लिए घूमने आया हूँ, इसलिए मेरा सारा सामान मेरे होटल के बड़े सूटकेस में है।" संत ने शांत भाव से कहा, "बस! यही अंतर है। तुम इस दुनिया में केवल एक मुसाफिर या पर्यटक की तरह आए हो, फिर भी तुमने इतना सारा सामान जोड़ रखा है और उसे ढो रहे हो। जबकि मैंने यह जान लिया है कि यह शरीर और संसार भी मेरा स्थायी ठिकाना नहीं है। मैं इस संसार में केवल एक यात्री हूँ, इसलिए मैं अपने साथ कोई अनावश्यक बोझ (पर...

एक चोर

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एक  चोर  एक सम्मानित स्कूल मास्टर ने अभी-अभी रिटायरमेंट लिया था।  वे और उनकी पत्नी भोपाल के एक फ्लैट में रहते थे। दशहरा आने पर उन्होंने अपने गृहनगर जाने का निश्चय किया। रवाना होने से पहले मास्टर ने सोचा — “हमारे रहने पर तो कोई डर नहीं, पर अगर हमारी गैरमौजूदगी में कोई चोर घर में घुस गया तो? वह अलमारी तोड़ देगा, सब सामान इधर-उधर फैला देगा, जबकि घर में पैसे वैसे कुछ हैं ही नहीं!”  तो घर को नुकसान से बचाने के लिए, उन्होंने मेज पर ₹1000 रखे  और साथ में एक पर्ची भी रखी।  “प्रिय अज्ञात चोर,” आपको मेरे घर में घुसने के लिए की गई मेहनत पर हार्दिक बधाई! पर दुर्भाग्यवश मैं एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति हूँ, जो केवल अपनी पेंशन पर गुजर-बसर करता है। इसलिए घर में कोई कीमती सामान नहीं है। मुझे अफसोस है कि आपकी मेहनत और कीमती समय व्यर्थ जाएगा। इसलिए आपकी मेहनत के सम्मान में यह ₹1000 स्वीकार करें।  साथ ही, आपके “पेशे” (चोरी ) में अधिक सफलता पाने के लिए कुछ सुझाव नीचे दिए गए हैं - मास्टर साहब की “सलाह” इस प्रकार थी:  8वीं मंज़िल पर – एक भ्रष्ट मंत्री रहता है  7वीं मंज़...

एक गिलहरी

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एक गिलहरी एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी❗ गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी, क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था❗ गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा❗ गिलहरी फिर काम पर लग जाती❗ गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता, और वो फिर काम पर लग जाती❗ ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था❗ ऐसे ही समय बीतता रहा .... एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया❗ गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के❓ पूरी जिन्दगी काम करते-करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे❗ यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है❗ इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है❗ 60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है...

चिंतन

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चिंतन यूनान के मशहूर दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक नगर में गए। वहां उनकी मुलाकात एक वृद्ध सज्जन से हुई। दोनों आपस में काफी घुल-मिल गए। वृद्ध सज्जन आग्रहपूर्वक सुकरात को अपने निवास पर ले गए। भरा-पूरा परिवार था उनका। घर में बहू-बेटे, पौत्र-पौत्रियां सभी थे। सुकरात ने वृद्ध से पूछा, ‘आपके घर में तो सुख-समृद्धि का वास है। वैसे अब आप करते क्या हैं?’ वृद्ध बोले, ‘अब मुझे कुछ नहीं करना पड़ता। अच्छा कारोबार है, जिसकी सारी जिम्मेदारियां अब बेटों को सौंप दी हैं। घर की व्यवस्था बहुएं संभालती हैं। इसी तरह जीवन सुखपूर्वक चल रहा है। मैंने जीवन के इस मोड़ पर एक ही नीति अपनाई है कि दूसरों से अधिक अपेक्षाएं मत पालो और जो मिले, उसमें संतुष्ट रहो। मैं और मेरी पत्नी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने बेटे-बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं। अब वे जो कहते हैं, वह मैं कर देता हूं और जो कुछ भी खिलाते हैं, खा लेता हूं। अपने पौत्र-पौत्रियों के साथ हंसता-खेलता हूं। मैं बच्चों के किसी कार्य में बाधक नहीं बनता।’ ‘पर कभी तो आपका मन करता होगा कि वे आपकी बात मानें, या सुनें?’ सुकरात ने पूछा। वृद्ध बोले, ‘अगर वे मेरे पास स...

प्रेरणादायक कहानी

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 प्रेरणादायक  कहानी                           ..                                   ससुराल में कोहराम मच गया। मायके से भी फोन आए, भाई ने समझाया, "दीदी, थोड़ा सब्र करो।" पर नलिनी का सब्र अब स्वाभिमान में बदल चुका था। उसने अपना बैग उठाया, जिसमें उसके कपड़े कम और मेडिकल की किताबें ज्यादा थीं, और घर से निकल गई। बरामदे में रखी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर झूलते हुए, 70 वर्षीय नलिनी अपनी गोद में रखी डायरी के पन्नों को पलट रही थी। बाहर सावन की झड़ी लगी थी, ठीक वैसी ही बारिश, जैसी उस दिन हो रही थी जब उसकी विदाई हुई थी। आज वह अकेली थी, लेकिन यह अकेलापन उसे काटता नहीं था, बल्कि एक अजीब-सी शांति देता था। लोग कहते हैं कि बुढ़ापे का अकेलापन एक अभिशाप है, पर नलिनी के लिए यह उसकी 'जीत' का प्रमाण था। नलिनी अपने अतीत के गलियारों में झांकती है, तो उसे वह सीधी-सादी, पढ़ने में होशियार लड़की याद आती है। उसके पिता, मास्टर दीनानाथ जी, शहर के एक प्रतिष्ठित...

मित्र की परिभाषा

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मित्र की परिभाषा  एक बार उद्धव जी ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा - हे "कृष्ण"! आप तो महाज्ञानी हैं, भूत, वर्तमान व भविष्य के बारे में सब कुछ जानने वाले हो आपके लिए कुछ भी असम्भव नही। मैं आपसे मित्र धर्म की परिभाषा जानना चाहता हूँ। उसके गुण धर्म क्या क्या हैं? भगवान बोले - उद्धव! सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति के समय बिना मांगे ही अपने मित्र की सहायता करे। उद्धव जी ने बीच मे रोकते हुए कहा - "हे कृष्ण"! अगर ऐसा ही है, तो फिर आप तो पांडवों के प्रिय बांधव थे। एक बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर विश्वास किया, किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, उसके अनुरूप मित्रता नही निभाई। आप चाहते तो पांडव जुए में जीत सकते थे। आपने धर्मराज युधिष्ठिर को जुआ खेलने से क्यों नही रोका।  ठीक है! आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन यदि आप चाहते तो अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा पासे को धर्मराज के पक्ष में भी तो कर सकते थे, लेकिन आपने भाग्य को धर्मराज के पक्ष में भी नहीं किया। आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और स्वयं को हारने के बाद भी तो रोक सकते थे। उसके बाद जब धर्मराज ने अपने भाइयों को दांव पर ल...

सच्ची कहानी

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॥ सच्ची कहानी: पुणे स्टेशन, 2018 ॥ पुणे रेलवे स्टेशन के बाहर एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। उस दुकान के मालिक थे रमेश अन्ना—62 वर्ष के, जिनकी एक टांग दिव्यांग थी। वे हर सुबह 5 बजे दुकान खोलते और रात 11 बजे तक चाय बेचते। एक कप चाय की कीमत थी 5 रुपये... और उसके साथ मुफ्त में मिलती थी एक मुस्कान। लोग चाय पीते, 10 मिनट बैठकर बातें करते और हल्का मन लेकर चले जाते। एक दिन किसी ने उनसे कहा,"अन्ना, आप तो मनोचिकित्सक (Psychiatrist) हैं।" अन्ना मुस्कुराकर बोले, "नहीं बेटा, मैं तो बस एक चायवाला हूँ। लेकिन मैंने ज़िंदगी का बहुत दुःख देखा है... इसलिए अपनी चाय में चीनी कम और प्यार ज़्यादा मिलाता हूँ।" एक दिन लगभग 25 साल का एक युवक आया। वह इंजीनियर था। उसने सूट पहन रखा था, लेकिन उसकी आँखें पूरी रात रोने की गवाही दे रही थीं। उसने कहा,"अन्ना, एक कटिंग चाय... ज़रा कड़क बनाना।" अन्ना ने चाय दी। लड़के ने एक ही घूंट में पूरी चाय पी ली। उसने जेब से 100 रुपये का नोट निकाला, मेज़ पर रखा और बोला, "अन्ना, बाकी पैसे आप रख लीजिए... यह मेरी ज़िंदगी की आख़िरी चाय है।" अन्ना के हा...

माॅं और छुट्टी

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माॅं और छुट्टी?         पता नहीं आज बेटे ने कौन सी शरारत कर दी 🤔 प्रिंसिपल ने अचानक एक माँ को स्कूल बुलाकर कहा— "आपके बेटे ने आज 'अगर मेरी माँ एक दिन के लिए छुट्टी पर चली जाए' विषय पर ऐसा निबंध लिखा है कि पूरी स्टाफ रूम में सन्नाटा छा गया। पहले सब हँस रहे थे... फिर सब रोने लगे।" माँ घबराकर कुर्सी पर बैठ गई। उसे लगा, पता नहीं बेटे ने कौन-सी शरारत कर दी होगी। प्रिंसिपल ने मुस्कुराते हुए कॉपी उसकी ओर बढ़ाई और कहा, "इसे घर जाकर मत पढ़िए... यहीं पढ़ लीजिए।" कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा था— "अगर मेरी माँ एक दिन के लिए छुट्टी पर चली जाए..." "पहले मुझे लगता था कि मेरी माँ दुनिया की सबसे गुस्सैल औरत है। सुबह पाँच बजे उठाकर पढ़ाई कराती है। टिफिन पूरा खत्म नहीं करूँ तो डाँटती है। देर तक मोबाइल चलाऊँ तो छीन लेती है। छुट्टी के दिन भी कहती है— कमरा साफ़ करो। मुझे लगता था कि काश... मेरी माँ एक दिन के लिए कहीं चली जाए। फिर पिछले सोमवार मेरी माँ बीमार पड़ गई। डॉक्टर ने उन्हें पूरा आराम करने को कहा। उस दिन पहली बार मेरी माँ सचमुच बिस्तर से नहीं उठी। सुबह अलार्म ...