कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
“ कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ” वे दिन भी क्या दिन थे, वे दिन भी क्या दिन थे। वह सुबह-सवेरे जग जाना, वह मित्र-मिलन को अकुलाना। उठा बैग को कांधे पर, वह दौड़ स्कूल की ओर लगाना। वह दोस्तों के टिफिन के लंच का स्वाद, वह शोर मचाने पर टीचर की डाँट। खेलने का घंटा लगता था छोटा, पढ़ाई का पीरियड तो लंबा ही होता। करते शरारत तो मिलती सज़ा, टीचर की डाँट का अलग था मज़ा। वे दिन भी क्या...................। टीचर न आने पर हवाई जहाज़ थे उड़ाते, टीचर के आने पर चुप बैठ जाते। एक्टिविटी किट जो घर भूल आते, तो दोस्तों के संग प्रोजैक्ट बनाते। ‘साॅरी टीचर’ सज़ा से बचाती, प्रोजैक्ट में अच्छे Marks दिलाती। वे दिन भी क्या...................। लैब में वह ड्रोन बनाना, गणतंत्र-दिवस पर उड़ा कर दिखाना। सबके साथ मिलकर, वह जन-गण-मन गाना। स्कूल में हम राजा थे, खूब मौज उड़ाते थे। वे दिन भी क्या...................। ‘हाॅली डे’ की न्यूज़ से, नई उमंग आती थी। घर में तो होम-वर्क की याद भी न आती थी। रोज़ नयी शिक्षा से, आगे बढ़ते जाते थे। वे दिन भी क्या...................। अब दी है चुनौती जो हमको विधाता, हटेंगे न पीछे ये सबका है वादा। ‘कोरोना’...