Posts

स्वयं को टटोलें

Image
                   स्वयं को टटोलें           एक बार अलग अलग दो आदमी यात्रा पर निकले! रास्ते में दोनों की मुलाकात हुई, दोनों का गन्तव्य एक थाए तो दोनों यात्रा में साथ हो लिए। सात दिन बाद दोनों के जुदा होने का समय आया, तो एक ने कहा - भाई साहब! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे। क्या आपने मुझे पहचाना? दूसरे ने कहा - नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना। पहला यात्री बोला - महोदय! मैं एक नामी ठग हूँ, परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरु निकले। दूसरा यात्री बोला - कैसे? पहला यात्री - कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली, परंतु मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतने दिन साथ रहने के बाद मुझे यह पता चल चुका है कि आप बहुत धनी व्यक्ति हैं और इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके पास कुछ भी नहीं है? लेकिन आप बिल्कुल खाली हाथ हैं! दूसरा यात्री - मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी-सी रजत मुद्राएं भी हैं। पहला यात्री बोला - तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं? दूसरा यात्री - मैं जब...

समस्या का सामना

Image
  समस्या का सामना ही समाधान एक बार बनारस में स्वामी विवेकनन्द जी मां दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे कि तभी वहां मौजूद बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया। वे उनसे प्रसाद छीनने लगे। वे उनके नजदीक आने लगे और डराने भी लगे। स्वामी जी बहुत भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे। वे बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए और वे भी उनके पीछे पीछे दौड़ने लगे। पास खड़े एक वृद्ध संन्यासी यह सब देख रहे थे। उन्होनें स्वामी जी को रोका और कहा, “रुको! डरो मत, उनका सामना करो।” वृद्ध संन्यासी की यह बात सुनकर स्वामी जी तुरंत पलटे और बंदरों के तरफ बढने लगे। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उनके ऐसा करते ही सभी बन्दर तुरंत भाग गए। उन्होनें वृद्ध संन्यासी को इस सलाह के लिए बहुत धन्यवाद किया। शिक्षा - इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक सम्बोधन में इसका जिक्र भी किया और कहा, “यदि तुम कभी किसी समस्या से भयभीत हो, तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो।” वाकई, यदि हम भी अपने जीवन में आई समस्याओं का सामना करें और उनसे भागें नहीं, तो बहुत.सी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। सद...

भक्त की रक्षा

Image
  भक्त की रक्षा   एक गांव में कृष्णा बाई नाम की बुढ़िया रहती थी। वह भगवान श्री कृष्ण की परम भक्त थी। वह एक झोपड़ी में रहती थी। कृष्णा बाई का वास्तविक नाम सुखिया था पर कृष्ण भक्ति के कारण इनका नाम गांव वालों ने कृष्णा बाई रख दिया। घर-घर में झाड़ू, पोछा, बर्तन और खाना बनाना ही इनका काम था। कृष्णा बाई रोज फूलों की माला बनाकर दोनों समय श्री कृष्ण जी को पहनाती थी और घण्टों कान्हा से बात करती थी। गांव के लोग यहीं सोचते थे कि बुढ़िया पागल है। एक रात श्री कृष्ण जी ने अपनी भक्त कृष्णा बाई से कहा - ‘कल बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है तुम यह गांव छोड़ कर दूसरे गांव चली जाओ।’ अब क्या था मालिक का आदेश था। कृष्णा बाई ने अपना सामान इकट्ठा करना शुरू किया और गांव वालों को बताया कि कल सपने में कान्हा आए थे और कह रहे थे कि बहुत प्रलय होगा, पास के गांव में चली जा। लोग कहाँ उस बूढ़ी पागल का बात मानने वाले थे। जो सुनता वही जोर-जोर ठहाके लगाता। इतने में बाई ने एक बैलगाड़ी मंगाई और अपने कान्हा की मूर्ति ली और सामान की गठरी बांध कर गाड़ी में बैठ गई। और लोग उसकी मूर्खता पर हंसते रहे। बाई जाने लगी बिल्कुल अपने गांव ...

ज्ञान भंडार

Image
  ज्ञान भंडार एक बहुत ज्ञानी व्यक्ति था। वो अपनी पीठ पर ज्ञान का भंडार लाद कर चला करता था। सारी दुनिया उसकी जयजयकार करती थी। ज्ञानी अपने ज्ञान पर दंभ करता इतराता फिरता था। एक बार वह किसी पहाड़ी से गुजर रहा था, रास्ते में उसे भूख लग आई। उसने इधर-उधर देखा, कुछ दूरी पर नयासर गांव दिखा। वहां एक बुढ़िया इमरती देवी पत्थरों के पीछे अपने लिए रोटी पका रही थी। ज्ञानी व्यक्ति उसके पास पहुंचा और उसने उससे अनुरोध किया कि क्या वह उसे भी एक रोटी खिला सकती है?   बुढ़िया ने कहा, “जरूर।” आदमी ने कहा कि लेकिन उसके पास देने को कुछ नहीं है, हां ज्ञान है और वह चाहे तो उसे थोड़ा ज्ञान वो दे सकता है। बुढ़िया ने कहा कि ठीक है। तुम रोटी खा लो और मुझे मेरे एक सवाल का जवाब दे दो।  आदमी ने रोटी खाने के बाद बुढ़िया से कहा कि पूछो अपना सवाल।  बुढ़िया ने पूछा, “तुमने अभी-अभी जो रोटी खाई है, उसे तुमने अतीत के मन से खाई है, वर्तमान के मन से खाई है या फिर भविष्य के मन से खाई है?” आदमी अटक गया। उसने अपनी पीठ से ज्ञान की बोरी उतारी और उसमें बुढ़िया के सवाल का जवाब तलाशने लगा। हजारों पन्ने पलटने के बाद भी उ...

जीवनसाथी

Image
  जीवनसाथी निशा जी के पति रजत जी को रिटायर हुए 5 वर्ष हो चुके थे। उनका इकलौता बेटा अमेरिका में कार्यरत था और परिवार के साथ वही बस चुका था। शुरू-शुरू में वह हर दिन कॉल करता था, पर अब कभी कभार भूले भटके ही उनकी खबर ले लिया करता है। मन पर पत्थर रख कर निशा जी और रजत जी ने इसी में सन्तोष कर लिया। यहाँ उनका पुश्तैनी मकान था, जहाँ बस निशा जी और उसके पति रजत जी रह गये थे। रजत जी खाली समय में अगल-बगल के बच्चों को पढ़ा कर अपना समय बिताया करते थे और निशा जी घर की देखभाल बड़े प्यार से किया करती थी और रजतजी की पेंशन से घर का खर्च चलता था। रजतजी रोज सुबह मॉर्निंग वॉक पर जाया करते थे और तब तक निशाजी नहा धोकर चाय और नाश्ता बना कर रखती थीं। रजत जी के आने के बाद दोनो साथ में नाश्ता करते थे और फिर नित्य की दिनचर्या शुरू हो जाती थी।     उस दिन सुबह से ही निशा जी का सिर कुछ भारी-सा लग रहा था। रात होते-होते उन्हें बुखार आ गया। वह किसी प्रकार सारे काम निपटा कर दवाई लेकर वह सो गईं। सुबह उठीं तो सर दर्द से फटा जा रहा था। उन्होंने आंख मूँदे-मूँदे ही अपने पति को आवाज दी। पर कोई प्रत्युत्तर ना पाकर उन...

पार्वती की रसोई

Image
  पार्वती की रसोई जब पार्वती ने भोजन बनाया तो........ जब पार्वती ने बनाया भोजन तो शिवजी ने उन्हें बताई ये अनोखी बात... .एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि प्रभु मैंने पृथ्वी पर देखा है कि जो व्यक्ति पहले से ही अपने प्रारब्ध से दुःखी है आप उसे और ज्यादा दुःख प्रदान करते हैं और जो सुख में है आप उसे दुःख नहीं देते है। भगवान ने इस बात को समझाने के लिए माता पार्वती को धरती पर चलने के लिए कहा और दोनों ने इंसानी रूप में पति-पत्नी का रूप लिया और एक गांव के पास डेरा जमाया। शाम के समय भगवान ने माता पार्वती से कहा कि हम मनुष्य रूप में यहां आए हैं, इसलिए यहां के नियमों का पालन करते हुए हमें यहां का भोजन ही करना होगा। इसलिए मैं भोजन की सामग्री की व्यवस्था करता हूं, तब तक तुम भोजन पकाने का प्रबन्ध करोे।  भगवान के जाते ही माता पार्वती रसोई में चूल्हे को बनाने के लिए बाहर से ईंटें लेने गईं और गांव में कुछ जर्जर हो चुके मकानों से ईंटें लाकर चूल्हा तैयार कर दिया। चूल्हा तैयार होते ही भगवान वहां पर बिना कुछ लाए ही प्रकट हो गए। माता पार्वती ने उनसे कहा - आप तो कुछ लेकर नहीं आए, भोजन कैसे ...

अच्छाई

Image
अच्छाई  अ च्छाई पलट-पलट कर आती रहती है... ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में फ्लेमिंग नाम का एक गरीब किसान था। एक दिन वह अपने खेत पर काम कर रहा था। अचानक पास में से किसी के चीखने की आवाज़ सुनाई पड़ी । किसान ने अपना साजो सामान व औजार फेंका और तेजी से आवाज की तरफ लपका। आवाज़ की दिशा में जाने पर उसने देखा कि एक बच्चा दलदल में डूब रहा था । वह बालक कमर तक कीचड़ में फंसा हुआ बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था। वह डर के मारे बुरी तरह कांप पर रहा था और चिल्ला रहा था। किसान ने आनन-फानन में लंबी टहनी ढूंढी। अपनी जान पर खेलकर उस टहनी के सहारे बच्चे को बाहर निकाला।अगले दिन उस किसान की छोटी सी झोपड़ी के सामने एक शानदार गाड़ी आकर खड़ी हुई। उसमें से कीमती वस्त्र पहने हुए एक सज्जन उतरे। उन्होंने किसान को अपना परिचय देते हुए कहा- मैं उस बालक का पिता हूं और मेरा नाम राँडॉल्फ चर्चिल है। फिर उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल ने कहा कि वह इस एहसान का बदला चुकाने आए हैं। फ्लेमिंग नामक उस किसान ने उन सज्जन के ऑफर को ठुकरा दिया । उसने कहा, ‘मैंने जो कुछ किया उसके बदले में कोई पैसा नहीं लूंगा। किसी को बचाना मेरा कर्तव्य है, मा...

मथुरा की एक छोटी लड़की

Image
  मथुरा की  एक छोटी लड़की की गाथा मथुरा के निकट एक गांव में छोटी लड़की रहती थी। वृन्दावन के निकट होने के कारण वहां से बहुत लोग ठाकुर जी के दर्शनों को जाते थे। जब वह छोटी बच्ची 5 साल की हुई तो उसके घर वाले बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए जा रहे थे। उस समय वाहन बहुत कम थे। उनको दर्शन को जाते देख उस छोटी लड़की ने कहा, “पिता जी मुझे भी अपने साथ ठाकुर जी के दर्शनों के लिए ले चलो।” पिता जी ने कहा, ‘बेटी! अभी आप छोटी हो, इतना चल नहीं पाओगी, थोड़ी बड़ी हो जाओ तब तुम्हें साथ में ले चलेंगे।’ कुछ समय बीता, जब वह 7 साल की हुई, तो फिर घरवालों का किसी कारणवश वृन्दावन जाना हुआ। फिर उस बच्ची ने कहा, “पिता जी अब मुझे भी साथ ले चलो, ठाकुर जी के दर्शनों के लिए।” लेकिन किसी कारणवश वे उसको न ले जा सके। बच्ची के मन में ठाकुर जी के प्रति बहुत प्रगाढ़ प्रेम था। वह बस उनका मन से चिंतन करती रहती थी और दुरूखी भी होती थी कि ठाकुर जी के दर्शनों को न जा सकी आज तक। गांव में उसके सभी सहपाठी प्रभु जी के दर्शन कर चुके थे। जब वे सब ठाकुर जी के मंदिर और उनके रूप का वर्णन करते तो इस बच्ची के मन में दर्शन की ललक और...

महादेव के दरबार में न्याय

Image
महादेव के दरबार में न्याय  कहते हैं कि बैद्यनाथ धाम में महादेव के दर्शन के लिए वही आता है, जिसे बाबा बुलाते हैं ,  लेकिन कभी-कभी बाबा सिर्फ दर्शन देने के लिए नहीं, बल्कि कर्मों का हिसाब चुकता करने के लिए बुलाते हैं। यह कथा है “शालिनी” और “राघव” की। दस साल पहले एक गलत फहमी और गरीबी ने इन्हें अलग कर दिया था। आज शालिनी उस जिले की DM (डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट) है और राघव उसी मंदिर की चौखट पर एक ऐसी हालत में है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती!! दस साल पहले राघव और शालिनी एक छोटे से कस्बे में रहते थे। राघव एक फैक्ट्री में काम करता था और शालिनी का सपना प्रशासनिक अधिकारी बनने का था। राघव ने अपनी पूरी जमा पूंजी और रातों की नींद शालिनी की पढ़ाई पर कुर्बान कर दी। लेकिन एक दिन फैक्ट्री में हुए एक भीषण हादसे में राघव ने अपने दोनों पैर खो दिए !! अपाहिज होने के बाद राघव को लगा कि वह अब शालिनी के लिए सिर्फ एक बोझ बन जाएगा। उसी समय शालिनी के परिवार ने उस पर दबाव डाला कि वह एक अपाहिज’ के साथ अपनी जिंदगी बर्बाद न करे। राघव ने एक कठोर फैसला लिया। उसने शालिनी से कहा कि वह अब उससे प्यार नहीं करता और...

एक बुढ़िया की रोचक कहानी

Image
एक बुढ़िया की रोचक कहानी पथवारी माता की कहानियाँ ग्रामीण लोककथाओं का हिस्सा हैं, इसलिए इनके कई रूप मिलते हैं। लेकिन सबसे प्रचलित और "मूल" मानी जाने वाली कथा कार्तिक मास के स्नान और तुलसी माता के साथ उनके संबंध को दर्शाती है। बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक गरीब बुढ़िया रहती थी। वह नियम से हर रोज सुबह जल्दी उठकर नदी में स्नान करती और लौटते समय गाँव की पथवारी (रास्तों की देवी) और तुलसी की पूजा करती थी। वह सादगी से अपना जीवन जीती और भगवान का नाम लेती थी। उसी गाँव के साहूकार की बहू बहुत घमंडी थी। वह भी कार्तिक स्नान करती थी, लेकिन उसे अपनी धन-दौलत और सज-धज पर बहुत मान था। वह अक्सर बुढ़िया का मजाक उड़ाती कि "यह फटे हाल बुढ़िया रोज यहाँ पत्थर पूजने आती है, इससे क्या मिलेगा?" परीक्षा की घड़ी एक दिन बुढ़िया माई ने श्रद्धा के साथ पथवारी माता से विनती की कि "हे माता! मुझे मोक्ष की राह दिखाना और मेरे कष्ट हरना।" उधर साहूकार की बहू ने सोचा कि वह सबसे महंगी पूजा करेगी ताकि उसकी प्रसिद्धि हो। कुछ समय बाद, भगवान ने दोनों की परीक्षा ली। रास्ते में एक कठिन मोड़ आया,...

आधे रास्ते को मंजिल न समझें

Image
आधे रास्ते को मंजिल न समझें  जंगल के किनारे एक छोटा सा गाँव था। जंगल में जंगली जानवरों की बहुतायत थी, इसलिए गाँव के लोगों को पेड़ पर चढ़ने का ज्ञान होना अति आवश्यक था, ताकि जंगली जानवरों से सामना होने पर वे पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचा सकें। जो लोग जंगल में लकड़ियाँ काटने जाते   थे,  उनके जंगली जानवरों से दो चार होने की अधिक संभावना थी। इसलिए वे लोग पेड़ पर चढ़ना अवश्य सीखते थे।   उस गाँव में एक बुजुर्ग सज्जन रहा करते थे। सब लोग उन्हें बाबा’ बुलाते थे। वे पेड़ पर चढ़ने की विधा में माहिर थे और लोगों को पेड़ पर चढ़ने का प्रशिक्षण दिया करते थे। गाँव के अधिकांश लोग उनसे ही प्रशिक्षण प्राप्त करने जाया करते थे। एक दिन बाबा ने उन युवकों के समूह को बुलाया, जिन्हें वे पेड़ पर चढ़ने का प्रशिक्षण दे रहे थे। वह उस समूह के प्रशिक्षण का अंतिम दिन था। बाबा उन्हें एक पेड़ के पास लेकर गए। वह एक ऊँचा और चिकना पेड़ था, जिस पर चढ़ना बेहद कठिन था। बाबा युवकों से बोले - आज तुम्हारे प्रशिक्षण का अंतिम दिन है। मैं देखना चाहता हूँ कि क्या तुम लोग पेड़ पर चढ़ने में माहिर हो गए हो? इसलिए मैं तुम्हें इस ...

प्लानिंग

Image
प्लानिंग (भगवान की प्लानिंग ओर मनुष्य की प्लानिंग में अंतर) एक बार मन्दिर से उनका सेवक कहता है, देवता आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे. एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ. देवता मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना. कुछ बोलना नहीं. मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है.  सेवक मान जाता है. सबसे पहले मंदिर में बिजनेस मैन आता है और कहता है, भगवान! मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे खूब सफल करना. वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे गिर जाता है. वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है. सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता. इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद कर. तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है. वह भगवान का शुक्रिया अदा करता है और पर्स लेकर चला जाता है. अब तीसरा व्यक्ति आता है. वह नाविक होता है. वह भगवान से कहता है कि मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा ...

हमारी पहचान

Image
  हमारी पहचान "मम्मी मैंने तुमसे हजार बार कहा है- कि चिंटू (आरव) के सामने अपनी ये गंवारी भाषा मत बोला करो। कल उसका 'इंटरनेशनल स्कूल' में इंटरव्यू है।  अगर उसने वहां जाकर 'कांई है, 'कांई हाल हे' या "राम-राम" बोल दिया न, तो मेरी नाक कट जाएगी।   तुम्हें पता है वहां डोनेशन देकर भी एडमिशन नहीं मिलता है सिर्फ स्टेटस और क्लास देखी जाती है।" पवन ने अपनी माँ, गुणमाला देवी पर झुंझलाते हुए कहा। गुणमाला देवी, जो गांव से आई थीं और शुद्ध देसी बोली बोलती थीं, बेटे की डांट सुनकर चुप हो गईं। उन्होंने           अपनी पोटली में से जो लड्डू निकाले थे, उन्हें वापस अंदर रख लिया। उनका मन था कि पोते को अपने हाथ के बने लड्डू खिलाएं और ढेर सारा आशीर्वाद दें । लेकिन बेटे के 'स्टेटस'    के आगे उनकी ममता सहम गई। पवन और उसकी पत्नी, रिया, अपने पांच साल के बेटे आरव (चिंटू) को पिछले एक महीने से तोते की तरह रटा         रहे थे। "Say हेलो," "Say गुड मॉर्निंग," "माय नेम इज़ आरव।"  घर का माहौल ऐसा था जैसे कोई मिलिट्री ट्रेनिंग चल रही हो...