प्रेम और समर्पण
प्रेम और समर्पण द्वारका नगरी में उस दिन एक भव्य महोत्सव की तैयारी चल रही थी। राजमहल दीपों फूलों और सुगंधित पुष्प मालाओं से सजा हुआ था। चारों ओर उत्सव का वातावरण था और महल की विशाल रसोई में तरह तरह के पकवान बनाए जा रहे थे। सोने-चांदी की थालियों में मोदक, लड्डू और अनेक प्रकार के मिष्ठान सजाकर रखे गए थे। किसी को क्या पता था कि कुछ ही क्षणों में स्वयं पवनपुत्र हनुमान की बाल सुलभ लीला इस पूरे राजमहल में हलचल मचाने वाली है। उसी समय हनुमान जी आकाश मार्ग से द्वारिका के ऊपर से गुजर रहे थे। समुद्र की लहरों के बीच बसी सुंदर नगरी को देखकर उनके मन में बाल सुलभ उत्सुकता जागी। अचानक उन्हें राजमहल की ओर से आती मिष्ठान की अद्भुत सुगंध महसूस हुई। हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, "अरे वाह! यह कैसी सुगंध है? ऐसा लगता है जैसे माता सीता के हाथों से बना हुआ प्रसाद हो। उत्सुकता में वे अपनी दिव्य शक्ति से स्वयं को अदृश्य करके राजमहल के भीतर प्रवेश कर गए। हनुमान जी धीरे-धीरे रसोई तक पहुंचे। जैसे ही उन्होंने सामने रखे मोदक और लड्डुओं को देखा उनकी आंखों में बालक जैसी चमक आ गई। उन्होंने एक लड्डू उठाया और प्रेम स...