प्रभु नाम का जाप
प्रभु नाम का जाप एक बार एक गांव में बहुत से महात्मा आकर यज्ञ कर रहे थे और वह वृक्षों के पत्तों पर चंदन से श्री कृष्ण का नाम लिखकर पूजा कर रहे थे। वह जगह गांव से बाहर थी। वहां एक आदमी अपनी बकरियों को रोज घास चराने जाता था। साधु हवन यज्ञ करके वहां से जा चुके थे, लेकिन वह पत्ते वहीं पड़े रह गए। तभी घास चरती बकरियों में से एक बकरी ने वो कृष्ण नाम रूपी पत्तों को खा लिया। जब आदमी सभी बकरियों को घर लेकर गया, तो सभी बकरियां अपने बाडे में जाकर 'मैं - मैं' करने लगी लेकिन वह बकरी, जिसने कृष्ण नाम को अपने अंदर ले लिया था, वह 'मैं - मैं' की जगह 'कृष्ण - कृष्ण' करने लगी, क्योंकि उसके अंदर कृष्ण वास करने लगे थे। उसका 'मैं' यानी अहम तो अपने आप ही दूर हो चुका था ! जब सब बकरियां उसको कृष्ण कृष्ण कहते सुनती हैं तो वह कहती हैं - यह क्या कह रही हो? अपनी भाषा छोड़ कर यह क्या बोले जा रही है। मैं - मैं बोल। तो वह कहती है - कृष्ण नाम रूपी पत्ता मेरे अंदर चला गया। मेरा तो "मैं" भी चला गया। सभी बकरियां उसको अपनी भाषा में बहुत कुछ समझाती, परंतु वह टस से मस ना हुई और...