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समय की महिमा

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  समय की महिमा वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से समय की महिमा जो समझ न पाए वो परेशान है, जो समझ गया उस के लिए वरदान है। समय ईश्वर की बेमिसाल रचना है।  सारी सृष्टि का चक्र समय बद्ध है।  एक पल भी इधर उधर नहीं होता। समय ओऽम नमः शिवाय है।  समय सत्य शिवम् सुन्दरम् है।  समय सत् चित आनंद है।  समय सत श्री अकाल है। समय विधि और विधान है।  समय ज्ञान और विज्ञान भी है। समय अभिशाप है तो वरदान भी है।  समय अमंगल है तो कल्याण भी है।  समय प्रयोग है तो परिणाम भी है। समय रिद्धि भी है सिद्धी भी है। समय निमित है निर्माण भी है। समय जीवन है तो निर्वाण भी है। समय समस्या है तो समाधान भी है।  समय भक्ति है तो शक्ति भी है। समय काल चक्र है तो महाकाल भी है। समय कर्म है तो समय धर्म भी है।  समय सृष्टा है तो दृष्टा भी है।  समय उत्कर्ष है तो अपकर्ष भी है। समय पथ है तो मजिल भी है। समय की कद्र कर समझ तू ए बन्दे! समय भक्त भी है भगवान भी है। समय बेनूर को नूर बना देता है  समय बेअदब को दस्तूर बना देता है  समय को समझ और कद्र...

Learn to change your thoughts

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अपने विचारों को शीघ्रता व सजगता से बदलना सीखो।  Learn to change your thoughts quickly and conciously. इस समय तुम्हारी चित्त-वृत्ति (mood) उन विचारों पर निर्भर है, जो वर्तमान समय में तुम्हारे मन में हैं। यदि तुम उन विचारों को बदल दो तथा कुछ और सोचना शुरू कर दो तो अवश्य ही तुम्हारी चित्त-वृत्ति (mood) बदल जाएगी। तुम्हारे पास एक साधारण सा सूत्र है। जब भी तुम व्याकुलता महसूस करो, केवल अपने मन और विचारों को किसी दूसरी जगह लगा दो। वह व्याकुलता उसी समय दूर हो जायगी। उदाहरण के लिए मान लो तुम अपने लड़के की सेहत के लिए चिन्तित हो जो हॉस्टल में रहता है। ऐसी स्थिति में तुम अपने विचारों को किसी ऐसे आवश्यक काम की ओर मोड़ दो जो तुम्हें कल दफ्तर में खत्म करना है या उन मीटींग व मुलाकातों की ओर, जो तुम्हें कल दफ्तर में करनी हैं। उन चिन्ता के विचारों को उसी समय दूर होना पड़ेगा क्योंकि दिमाग़ एक बार में कई बातें नहीं सोच सकता। इसलिए किसी के द्वारा व्याकुल किया जाना संभव नहीं है, जब तक तुम उस के बारे में सोचना न शुरू कर दो।  जादू की छड़ी (दृष्टिकोण का बदलाव) एक शहर में आर्यन नाम का एक युवक रहता था। वह...

अधिकार का वरदान

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  मानव को कर्म के अधिकार का वरदान  वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से ईश्वर ने मानव को ज्ञान जिज्ञासा विवेक युक्त कर्म करने का अधिकार दिया है। अच्छा और बुरा भी दिया है।  सकारात्मकता जीवन है, स्वर्ग योग है; नकारात्मक मृत्यु है, नरक है और भोग है। चुनाव आप का है।  दिन - रात                    गर्मी - सर्दी                  ज्ञान - अज्ञान  विश्वास - अन्धविश्वास धर्म - अधर्म                  सुख - दुःख                   अच्छा - बुरा सत्य - असत्य सत्कर्म - दुष्कर्म इच्छा - त्याग जागना - सोना हंसना - रोना लोभ - क्रोध सात्विक - तामसिक रस - गन्ध दृष्टि - शब्द योग - भोग राग - द्वेष  पाप - पुण्य   हिंसा - अहिंसा  सद्कर्म - कर्मकाण्ड  बेईमानी - ईमानदारी  - यह सच है कि सृष्टि की रचना की है मैंने, यह भी सच है कि हर सुविधा की व...

ईश्वर नहीं होता खफा

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 ईश्वर नहीं होता खफा वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से एक तुम्हीं हो, जो मुझ से न होवे खफा, प्रभु! क्यों न करूं, मैं साथ तेरे वफा? एक तूने ही मुझ को, लगाया गले, ज़िन्दगी में तुम्हीं ,मेरे संग संग चले, तूने मुझ को निकाला है, उस दौर से, जब लगी चोट दिल को, बड़े जोर से, हाथ थामा है तूने, मेरा हर दफा ........... वक्त ऐसे ही इंसान को, आजमाता है, आ कर तू ही ज़मी पर, उस को समझाता है, सब से ऊँचा ही तेरा, ये किरदार है, जिस ने समझा तुझे, वो समझदार है, खुद को जोड़ा जो तुम से, मिली है शफा, हाथ थामा है तूने, मेरा हर दफा ........  मुझ को मालूम है, तुम में है ताकत बड़ी, आज दुनिया ये तेरे ही, दम पे खड़ी, हौसला मुझ में तुम ने, गजब भर दिया, मेरे पैरों पर मुझ को, खड़ा कर दिया, तेरा बन के मुझ को, हुआ है नफा।  हाथ थामा है तूने, मेरा हर दफा द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए...

Continue to progress

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दुर्घटनाओं और दुर्भाग्यों में भी आगे बढ़ना जारी रखो। Continue to progress even in tragedies and misfortunes कुछ लोग ऐसे होते हैं जब उन्हें किसी दुर्घटना या अवांछित परिस्थिति का सामना करना पड़ता है तब वे अपने जीवन को पूर्णतया निष्क्रिय और नीरस बना लेते हैं। वे निराशा और हताशा से ग्रस्त हो जाते हैं, जैसे जीवन में कुछ भी शेष नहीं रहा हो। जब तक दुर्घटना का भावनात्मक प्रभाव उनके मन से नहीं जाता, तब तक वे अपना जीवन इसी दुःखदाई अवस्था में व्यतीत करते रहते हैं और इसी में उनके जीवन का सबसे मूल्यवान समय चला जाता है। टूटे पंख और नई उड़ान रवि एक मेधावी छात्र था, जो एथलीट बनकर देश का नाम रोशन करना चाहता था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक सड़क हादसे में उसने अपना बायां पैर खो दिया। हादसे के बाद रवि बुरी तरह टूट गया। उसके पास 'दुर्भाग्य' को कोसने के अलावा कुछ नहीं था। वह कमरे में बंद रहता और अपने सुनहरे अतीत को याद कर रोता। उसे लगता कि अब उसकी जिंदगी खत्म हो चुकी है। एक दिन, उसके पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग, जिन्हें लोग 'बाबा' कहते थे, रवि के पास आए। उन्होंने रवि के कमरे के बाहर लग...

Don’t have expectations

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अपने जीवनसाथी (पति या पत्नी) से सामान्य से अधिक आशाएं न रखो।   Don’t have supernormal expectations from your spouse. तुम्हारा जीवनसाथी भी अन्य सामान्य व्यक्ति के समान ही है। जैसी कमज़ोरियाँ और मज़बूती किसी भी सामान्य व्यक्ति में होती हैं, वैसी ही उसमें भी हैं। उसे एक विशेष और आदर्श व्यक्ति मान कर उससे दोष रहित व्यवहार की उम्मीद मत रखो। ऐसा करना तो सपनों की दुनिया में रहने जैसा है। अन्य लोगों की तरह वह भी कई मूर्खतापूर्ण काम करेगा और मूर्खतापूर्ण आदतों (funny habits) का शिकार होगा। वास्तव में तुम्हें पहले ही ऐसी आदतों को स्वीकार कर लेना चाहिए। तुम्हारी योग्यता इसी में है कि जो गुण और सामर्थ्य उनमें हैं उनसे ही अच्छे से अच्छा प्राप्त किया जाए। तुम्हें उनके स्वभाव की बुरी आदतों और दुःख पहुंचाने वाले कामों से समझौता करना, सहना, समायोजन करना या यहाँ तक कि भूलना भी सीखना चाहिए। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। प्रत्येक में कुछ असामान्य और अनोखी विशेषताएं होती हैं जो उन्हें औरों से अलग करती हैं। तुम्हें यह प्रयत्न करना चाहिए कि उन परिस्थितियों को न पैदा किया जाए या न बनाया जाए जो तुम्हार...

Don’t lower your level

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 अपने स्तर को उस व्यक्ति के स्तर तक न गिराओ जो तुम से दुर्व्यवहार कर रहा है।  Don’t lower your level to the level of the person who is misbehaving you. इस जीवन में बहुत से पल ऐसे आते हैं, जब दूसरे लोग तुम्हारे साथ लड़ाई करने लगते हैं और दुर्व्यवहार करने लगते हैं। बिना किसी कारण तुम पर अवांछित टिप्पणियां करने लगते हैं, लेकिन यह सब या तो किसी अनचाही क्रिया की प्रतिक्रिया है या उनकी नीच प्रकृति का लक्षण है। इस स्थिति में एक निर्दोष व्यक्ति की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होगी यह सिद्ध करना कि यह पहले व्यक्ति की ग़लती है, जिसने बिना बात लड़ाई शुरू की थी, लेकिन कई व्यक्ति ऐसी टिप्पणियां सुन कर और अधिक उग्र व आक्रमणकारी हो जाते हैं। इस मामले में प्रतिक्रिया करने का सही व्यवहार क्या है? ऐसी स्थिति में तुम अवश्य ही यह महसूस करो कि यह व्यक्ति अपनी बुरी आदतों और प्रकृति (स्वभाव) के वश में होकर तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार कर रहा है। उसके बुरे स्वभाव और मन की नीच अवस्था के कारण हमें अपने आप को अव्यवस्थित (upset) नहीं करना चाहिए। उसकी बुरी प्रकृति और स्वभाव के कारण उसे ही तनावयुक्त और अव्यवस्थित (upset...

Learn to adjust

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समायोजन और समझौता करना सीखो। Learn to adjust and compromise. प्रत्येक व्यक्ति की यह इच्छा होती है कि जीवन में सभी बातें वैसी ही होनी चाहिएं, जैसी वह चाहता है और यह कि दुनिया उसके प्रति दयालु और ईमानदार होनी चाहिए। लोग उसके साथ आदर व विनम्रता का व्यवहार करें और यह कि केवल उसके विचार और दृष्टिकोण ही स्वीकार किए जाने चाहिएं और लागू किए जाने चाहिएं। पर दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है और ऐसा कभी हो भी नहीं सकता। यह संसार बहुत पेचीदा है और इसे केवल तुम्हारे और मेरे मन की चंचलताओं और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नहीं बनाया गया है। संसार कुछ विशेष योजनाओं और दैवीय नियमों के अनुसार दौड़ रहा है और किसी की इच्छाओं और आवश्यकताओं के अनुसार नहीं। पुराना पेड़ और नई हवा एक नदी के किनारे एक बहुत पुराना और विशाल बरगद का पेड़ था। वह अपनी मजबूती पर बहुत घमंडी था। वहीं पास में ही एक छोटी-सी, लचीली घास भी उगी हुई थी। एक दिन जोर का तूफान आया। बरगद का पेड़ अपनी अकड़ में खड़ा रहा, उसने सोचा कि वह तूफान का मुकाबला करेगा। उसने लचीलापन नहीं दिखाया, वह झुका नहीं। नतीजा यह हुआ कि जब हवा और तेज हुई, तो बरगद का पेड़ जड़ से ...

Avoid stress of perfection

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  पूर्ण प्रवीणता और आदर्शवादिता के तनाव से बचो। . Avoid stress of perfection and  idealism. इस दुनिया में बहुत से लोग हैं जो हमेशा तनाव में रहते हैं क्योंकि वे प्रत्येक काम में पूर्ण दक्षता की उम्मीद रखते हैं परन्तु वे इसे पाने में समर्थ नहीं होते। इस संबंध में कृपया यह समझें कि पूर्ण दक्षता का गुण तो केवल ‘भगवान’ के पास है। परिभाषा के अनुसार- हम मनुष्य शत-प्रतिशत प्रवीण नहीं हो सकते। सवाल यह नहीं है कि हम किस स्तर तक पहुँचे हैं, लेकिन यह सच है कि हम ग़लतियां करना नहीं छोड़ पाते। हम अपने सतत ज्ञान व अभ्यास से अपनी अप्रवीणता को कम तो कर सकते हैं, लेकिन हम निष्कलंक प्रवीणता को प्राप्त नहीं कर सकते। एक मनुष्य केवल तभी पूर्ण दक्षता प्राप्त कर सकता है, जब वह चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँच जाए, जिसे ‘मोक्ष’ या ‘निर्वाण’ या ‘मुक्ति’ या ‘भगवद् सत्ता की अनुभूति’ की अवस्था कहते हैं। इस अवस्था में वह एक सामान्य व्यक्ति नहीं रहता और भगवान का सह-भागीदार बन जाता है। उसे फिर पाठ सीखने या प्रवीणता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रह जाती और वह जन्म और मृत्यु के चक्कर से आज़ाद हो जाता है। मिट्टी का ...

Eliminate self-centeredness

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अपनी बातों और कामों के बारे में आत्म-केन्द्रितपना या आत्म-प्रशंसा का भाव छोड़ दो।  Eliminate self-centeredness in your talking and dealings. कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी सारी बातचीत मुझे, मेरा, मैं या मैंने यह किया, मुझे यह अच्छा लगता है और इसी प्रकार की बातों से भरी होती हैं। इसमें हम भी शामिल हैं। उनकी बातों से यह ज़ाहिर होता है कि उनसे अच्छा इस दुनिया में कोई भी नहीं है। वास्तव में केवल अपने बारे में बोलना या सोचना संकुचित बुद्धि के निम्न स्तर का लक्षण है, जिसके द्वारा हम अपने आप को बहुत छोटा बना लेते हैं। हम अधिक समय तक भगवान की महान लीला के प्रतिभागी और इस विश्व का एक हिस्सा नहीं रहते, हम अलग हो जाते हैं और इसलिए बाहरी दुनिया से नाख़ुश और बेचैन महसूस करते हैं। अपने आप को इस दुनिया का हिस्सा समझो और भगवान की विशाल लीला का एक अंग मानो, जो यहां फैली हुई है। तुम अन्य व्यक्तियों से अलग नहीं हो। हम सब की सामान्य आवष्यकताएं और लक्ष्य एक हैं। हम सब का भगवान के साथ एक जैसा सम्बन्ध है। सारे विश्व को ध्यान में रखते हुए व सामान्य लाभ को ध्यान में रखते हुए कुछ सोचना और विभिन्न कार्यों को करना ...

Do you feel lonely.

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क्या आप अकेलापन और ऊब अनुभव कर रहे हो? Do you feel lonely & bored. आध्यात्मिक भाषा में अकेला आदमी वह है जो अपने आप को नहीं जानता और वास्तव में अपना सामना नहीं कर सकता। केवल ऐसा व्यक्ति ही अपने मन को व्यस्त रखने के लिए अन्य वस्तुओं और व्यक्तियों  के पीछे भागता है। जब उसे कोई वस्तु या व्यक्ति अपने दिमाग़ को व्यस्त  रखने के लिए नहीं मिलता तो वह ऊब जाता है। ऊबाऊपन किसी वस्तु  को चाहने, लेकिन उसे न पाने पर होता है। वह यह नहीं जानता कि अपने  अन्तर्मन की ओर ध्यान मोड़ कर किसी बाहरी वस्तु के बिना भी आनन्द  अनुभव किया जा सकता है। वह आन्तरिक आनन्द और शान्ति को  अनुभव करने में असफल रहता है जो प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर उसकी  आत्मा में या मन में गहरे गुप्त स्थान पर विद्यमान रहती है।   लेकिन अपनी सन्तुष्टि के लिए अन्य वस्तुओं और व्यक्तियों पर  निर्भर रहना अत्यन्त मायावी (छलने वाला) है क्योंकि इस दुनिया में कुछ  भी स्थाई रूप से तुम्हारे साथ रहने वाला नहीं है। प्रत्येक वस्तु या व्यक्ति  तुम्हें एक दिन छोड़ जाएगा और तब चाहे इच्छा से या बलपूर्व...