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पंच परमेश्वर

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हिंदी कहानी पंच परमेश्वर (कहानी) : मुंशी प्रेमचंद 1 जुम्मन शेख अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गये थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गये थे, और अलगू जब कभी बाहर जाते, तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खाना-पाना का व्यवहार था, न धर्म का नाता; केवल विचार मिलते थे। मित्रता का मूलमंत्र भी यही है। इस मित्रता का जन्म उसी समय हुआ, जब दोनों मित्र बालक ही थे, और जुम्मन के पूज्य पिता, जुमराती, उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे। अलगू ने गुरू जी की बहुत सेवा की थी, खूब प्याले धोये। उनका हुक्का एक क्षण के लिए भी विश्राम न लेने पाता था, क्योंकि प्रत्येक चिलम अलगू को आध घंटे तक किताबों से अलग कर देती थी। अलगू के पिता पुराने विचारों के मनुष्य थे। उन्हें शिक्षा की अपेक्षा गुरु की सेवा-शुश्रूषा पर अधिक विश्वास था। वह कहते थे कि विद्या पढ़ने ने नहीं आती; जो कुछ होता है, गुरु के आशीर्वाद से। बस, गुरु जी की कृपा-दृष्टि चाहिए। अतएव यदि अलगू पर जुमराती शेख के आशीर्वाद अथवा सत्संग का कुछ फल न हुआ, तो यह मानकर सं...

सनातन संस्कृति और संस्कार

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 सनातन संस्कृति और संस्कार जब समुद्र में 740 बच्चों की मृत्यु होने को थी और हर देश ने "नहीं" कहा,  तो एक व्यक्ति - जिसके पास चुप रहने का कारण था - ने "हां" कहा। वर्ष 1942 था। जहाज़ एक तैरते हुए ताबूत की तरह अरब सागर में बह रहा था। बोर्ड पर 740 पोलिश बच्चे थे। अनाथ। सोवियत श्रम शिविरों के बचे हुए, जहां उनके माता-पिता की फ्लू या भुखमरी से मृत्यु हो गई थी। वे ईरान के माध्यम से भाग गए थे, लेकिन एक और भयानक सजा उनका इंतज़ार कर रही थी। कोई भी उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। ब्रिटिश साम्राज्य - अपने समय की सबसे शक्तिशाली शक्ति - ने भारतीय तट के बंदरगाह के बाद बंदरगाह में प्रवेश करने से इनकार कर दिया। "यह हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है। दूर चले जाओ।" भोजन लगभग समाप्त हो गया। कोई दवा नहीं। समय समाप्त हो रहा था। बारह वर्षीय मारिया ने अपने छह वर्षीय भाई का हाथ पकड़ा। उसने अपनी मरने वाली माँ से उसकी रक्षा करने का वादा किया था। लेकिन जब पूरी दुनिया उनके ख़िलाफ़ हो जाती है तो आप किसी की रक्षा कैसे करते हैं? और फिर गुजरात के छोटे से महल में ख़बर आई। शासक जाम साहिब दिग्विजय सिंह जी...

जीवन रथ की डोरी

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जीवन रथ की डोरी एक संत एक छोटे से आश्रम का संचालन करते थे। एक दिन पास के रास्ते से एक राहगीर को पकड़कर अंदर ले आए और शिष्यों के सामने उससे प्रश्न किया कि यदि तुम्हें सोने की अशर्फियों की थैली रास्ते में पड़ी मिल जाए तो तुम क्या करोगे?  वह आदमी बोला - तत्क्षण उसके मालिक का पता लगाकर उसे वापस कर दूंगा, अन्यथा राजकोष में जमा करा दूंगा। संत हंसे और राहगीर को विदा कर शिष्यों से बोले - यह आदमी मूर्ख है। शिष्य बहुत हैरान कि गुरुजी क्या कह रहे हैं? इस आदमी ने ठीक ही तो कहा है तथा सभी को यही सिखाया गया है कि ऐसे किसी परायी वस्तु को ग्रहण नहीं करना चाहिए। थोड़ी देर बाद फिर संत किसी दूसरे को अंदर ले आए और उससे भी वही प्रश्न दोहरा दिया।  दूसरे राहगीर ने उत्तर दिया कि क्या मुझे निरा मूर्ख समझ रखा है, जो स्वर्ण मुद्राएं पड़ी मिलें और मैं लौटाने के लिए मालिक को खोजता फिरूं? तुमने मुझे समझा क्या है?  वह राहगीर जब चला गया तो संत ने कहा - यह व्यक्ति शैतान है।  शिष्य बहुत हैरान हुए कि पहला मूर्ख और दूसरा शैतान, फिर गुरुजी चाहते क्या हैं?            अबकी बार सं...

परमात्मा की चाह

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  परमात्मा की  चाह आत्मा का कल्याण मनुष्य के मन और विचारों पर निर्भर है ! जब तक मन साफ नहीं भक्ति का भी कोई महत्व नहीं। जैसे पानी के हिलते रहने से उसमें सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं पड़ता है उसी प्रकार जब तक मन में कामनाओं और वासनाओं की चंचलता रहती है तब तक उसमें ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं ठहर सकता है।      एक बार एक राजा विदेश गया। जब उसने वापस देश लौटने का विचार बनाया तो घर में अपनी चारों रानियों को अलग अलग पत्र लिखकर पूछा कि विदेश से उनकी पसंद की कौन सी वस्तु उनके लिए लाई जाय? उनमें से तीन रानियों ने अपने पसंद की वस्तु लिखकर वापस राजा के पास पत्र भिजवा दिये ।   किन्तु जो सबसे छोटी रानी थी, उसने सिर्फ 1 लिखकर पत्र वापस भिजवा दिया। राजा ने चारों चिट्ठियों को पढ़ा । किसी रानी ने वस्त्र लिखे थे, किसी ने आभूषण लिखे थे, किसी ने अपने पसंद की वस्तु लिखी थीं। राजा विदेश से वापस आया और जिस रानी ने जो वस्तु लिखी थी, वह उसके पास पहुंचा दी। सबसे छोटी रानी ने 1 लिखकर पत्र भेजा था ।   राजा इसका आशय नहीं समझ पाया। वह छोटी रानी के महल में गया और पूछा ...

राजा मोरध्वज

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राजा मोरध्वज    हमारे देश में एक से एक महादानी हुए हैं किन्तु आज हम जिस व्यक्ति की बात करने वाले हैं उसने दानवीरता की सारी सीमाओं को पार कर लिया। ये कथा है महाराज मोरध्वज की। कथा महाभारत की है किन्तु मूल महाभारत का भाग नहीं है। भारतीय दंत कथाओं में इसकी बड़ी प्रसिद्धि है। विशेषकर छत्तीसगढ़ में इसे बड़े चाव से सुना और सुनाया जाता है। कथा महाभारत युद्ध के बाद की है। युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ किया। सहस्त्रों ब्राह्मणों को इतना दान दिया गया, जिसकी कोई उपमा नहीं थी। इसी कारण अर्जुन के मन में अभिमान आ गया। एक दिन उसने बात ही बात में श्रीकृष्ण से कहा कि हे माधव! मैं भी कितना भाग्यशाली हूँ जो मुझे आपका सबसे बड़ा भक्त बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बल में भी मेरी समता कोई और नहीं कर सकता और मेरे भ्राता युधिष्ठिर सा दानवीर भी कोई और नहीं है। श्रीकृष्ण समझ गए कि उसके सखा को अभिमान ने छू लिया है और उसका उद्धार करना आवश्यक है। उस समय उन्होंने कुछ नहीं कहा और थोड़े दिन के बाद अर्जुन अश्वमेघ यज्ञ के दिग्विजय के लिए निकल गया। कई दिनों तक चलने के बाद वो घोडा रतनपुर राज्य की सीमा मे...

मायाः महाठगिनी

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मायाः महाठगिनी (लघु नाटिका) हरियाणवी भाषा में मंच सज्जा - एक चारपाई, दूसरी ओर मटका, उसके ऊपर एक गिलास पात्र- परिचय 1. सूत्रधार 2. अम्मा (स्व॰ मायाराम की पत्नी) 3. छुआराम (सबसे बड़ा पुत्र) 4. रसना बाई (पुत्री) 5. नकटाराम (दूसरा पुत्र) 6. नयन सिंह (तीसरा पुत्र) 7. कर्णसिंह (चौथा पुत्र) 8. सुरसती की माँ और लछमी की आवाज़ नेपथ्य से ही सुनाई देगी। (सूत्रधार का प्रवेश) (इधर उधर देखता हुआ मोदी की आवाज़ में) ”मित्रों! ..............। (नेपथ्य से - सारे पात्र मिल कर - मोदी......... मोदी..........) नहीं....नहीं... आपने मुझे सही नहीं पहचाना। मैं मोदी नहीं हूँ। चलो! फिर से शुरू करता हूँ। भाइयों और बहनों!...... क्या आपने सुना है?..........(इधर उधर देखकर) ( कुछ आवाज़ें नेपथ्य से - सुना है..., सुना है..., नहीं सुना... नहीं सुना...) अरे!...... पूरी बात तो सुन लो। यह भी कोई बात हुई! कोई कहता है - सुना है, कोई कहता है - नहीं सुना। अरे! सब शांत कैसे हो गए? मैं मोदी जी के भाषण की बात नहीं कर रहा। मैं तो यह पूछ रहा हूँ कि क्या आपने वह सुना है, जो मैंने सुना है? (कान पर हाथ लगा कर) क्या कहा?.... न...

19 ऊंटों की कहानी

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19 ऊंटों  की कहानी मजाक में मत लेना जी 🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪🐪 एक गाँव में एक व्यक्ति के पास 19 ऊंट थे।  एक दिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी।  मृत्यु के पश्चात वसीयत पढ़ी गयी। जिसमें लिखा था कि मेरे 19 ऊंटों में से आधे मेरे बेटे को, 19 ऊंटों में से एक चौथाई मेरी बेटी को, और 19 ऊंटों में से पांचवाँ हिस्सा मेरे नौकर को दे दिए जाएँ। सब लोग चक्कर में पड़ गए कि ये बँटवारा कैसे हो ? 19 ऊंटों का आधा अर्थात एक ऊँट काटना पड़ेगा, फिर तो ऊँट ही मर जायेगा। चलो एक को काट दिया तो बचे 18 उनका एक चौथाई साढ़े चार- साढ़े चार. फिर? सब बड़ी उलझन में थे। फिर पड़ोस के गांव से एक बुद्धिमान व्यक्ति को बुलाया गया। वह बुद्धिमान व्यक्ति अपने ऊँट पर चढ़ कर आया, समस्या सुनी, थोडा दिमाग लगाया, फिर बोला - इन 19 ऊंटों में मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो। सबने सोचा कि एक तो मरने वाला पागल था, जो ऐसी वसीयत कर के चला गया, और अब ये दूसरा पागल आ गया ...जो बोलता है कि उनमें मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो... फिर भी सब ने सोचा - बात मान लेने में क्या हर्ज है.... 19+1=20 हुए। 20 का आधा 10, बेटे को दे दिए। 20 का चौ...

भक्त और भगवान

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    भक्त और भगवान           भक्त करमानन्द जी अपने गायन से प्रभु की सेवा किया करते थे। इनका गायन इतना भावपूर्ण होता था कि पत्थर-हृदय भी पिघल जाता था। ज्यादा दिनों तक इनको गृहस्थी रास नहीं आयी और ये सब कुछ छोड़कर निकल पड़े। इनके पास केवल दो चीजें ही थीं एक छड़ी और दूसरा ठाकुर बटुआ जिसे ये गले में टाँग कर चलते थे।   ये जहाँ विश्राम करने के लिये ठहरते, वहाँ छड़ी को गाड़ देते और उस पर ठाकुर बटुआ लटका देते थे। इससे ठाकुर जी को झूला झूलने का आनन्द मिलता था।  एक दिन ये सुबह सुबह ठाकुर जी की पूजा करके श्री ठाकुर बटुआ को गले में लटका कर चल दिए। उस समय ये भगवन्नाम में इतने डूबे हुए थे कि छड़ी को लेना भूल गए।  अब जब दूसरी जगह ये विश्राम करने के लिये रुके तो इन्हें छड़ी की याद आयी। अब समस्या थी कि ठाकुर जी को कैसे और कहाँ पधरावें। श्री ठाकुरजी में प्रेम की अधिकता के कारण इन्हें उन पर प्रणय-रोष हो आया।  ये गुस्सा करते हुए बोले कि ठाकुर हम तो जीव हैं, हम कितना याद रखें। हम छड़ी भूल गए थे, तो आपको याद दिलाना चाहिए था। अब दूसरी छड़ी कहाँ से लाएँ ? ...

लालच बुरी बला है

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  लालच बुरी बला है एक शहर में एक आदमी रहता था। वह बहुत ही लालची था। उसने सुन रखा था कि अगर संतों और साधुओं की सेवा करें तो बहुत ज्यादा धन प्राप्त होता है। यह सोच कर उसने साधु-संतों की सेवा करनी प्रारम्भ कर दी। एक बार उसके घर बड़े ही चमत्कारी संत आये। उन्होंने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसे चार दीये दिए और कहा,”इनमें  से एक दीया जला लेना और पूरब दिशा की ओर चले जाना। जहाँ यह दीया बुझ जाये, वहाँ की जमीन को खोद लेना, वहाँ तुम्हें काफी धन मिल जायेगा। अगर फिर तुम्हें धन की आवश्यकता पड़े,  तो दूसरा दीया जला लेना और पक्षिम दिशा की ओर चले जाना, जहाँ यह दीया बुझ जाये, वहाँ की जमीन खोद लेना। तुम्हें मन चाही माया मिलेगी। फिर भी संतुष्टि न हो तो तीसरा दीया जला लेना और दक्षिण दिशा की ओर चले जाना। उसी प्रकार दीया बुझने पर जब तुम वहाँ की जमीन खोदोगे, तो तुम्हें  बेअन्त धन मिलेगा। तब तुम्हारे पास केवल एक दीया बच जायेगा और एक ही दिशा रह जायेगी। तुम्हें यह दीया न ही जलाना है और न ही इसे उत्तर दिशा की ओर ले जाना है।” यह कह कर संत चले गए। लालची आदमी उसी वक्त पहला दीया जला कर पूरब दिशा की ओर...