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भाग्य और कर्म

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    भाग्य और कर्म एक बार की बात है कि देवर्षि नारद वैकुंठ धाम गए। वहां उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और श्रीहरि विष्णु भगवन से कहा, ‘‘ हे प्रभु! पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म की राह पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा और जो पाप कर रहे हैं उनका सब भला हो रहा है। उनके मजे ही मजे हैं। ’’ तब श्रीहरि विष्णु भगवान् ने कहा, ‘‘ ऐसा नहीं है ‘नारद’ । जो भी हो रहा है सब नियति के कारण हो रहा है। ’’ नारद बोले, ‘‘प्रभु! मैं तो यह सब पृथ्वी लोक देख कर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।’’ श्री विष्णु भगवान ने कहा, ‘‘नारद कोई ऐसी घटना बताओ जो तुमने देखा हो। ’’ तब..नारद जी ने कहा: अभी मैं पृथ्वी लोक के एक जंगल से आ रहा हूँ। मैंने देखा कि वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।  तभी एक चोर उधर से गुजर रहा था। वह चोर गाय को फंसा हुआ देखकर भी रुका नहीं, बल्कि वह उसपर पैर रखकर दलदल लांघ कर आगे निकल गया। “आश्चर्य तो तब हुआ जब आगे जाकर उस चोर को सोने की मोहरों स...

बच्चों की सही परवरिश

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बच्चों की सही परवरिश शहर से कुछ दूरी पर बसे एक मोहल्ले में रुचिका अपने हस्बैंड के साथ रहती थी. उसके ठीक बगल में एक बुजर्ग व्यक्ति अकेले ही रहा करते थे, जिन्हें सभी “दादा जी” कह कर बुलाते थे। एक बार मोहल्ले में एक पौधे वाला आया. उसके पास कई किस्म के खूबसूरत, हरे-भरे पौधे थे। रुचिका और दादाजी ने बिलकुल एक तरह का पौधा खरीदा और अपनी-अपनी क्यारी में लगा दिया. रुचिका पौधे का बहुत ध्यान रखती थी. दिन में तीन बार पानी डालना, समय-समय पर खाद देना और हर तरह के कीटनाशक का प्रयोग कर वह कोशश करती की उसका पौधा ही सबसे अच्छा ढंग से बड़ा हो। दूसरी तरफ दादा जी भी अपने पौधे का ख़याल रख रहे थे, पर रुचिका के तुलना में वे थोड़े बेपरवाह थे… दिन में बस एक या दो बार ही पानी डालते, खाद डालने और कीटनाशक के प्रयोग में भी वे ढीले थे। समय बीता. दोनों पौधे बड़े हुए। रुचिका का पौधा हरा-भरा और बेहद खूबसूरत था. दूसरी तरफ दादा जी का पौधा अभी भी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में नहीं आ पाया था। यह देखकर रुचिका मन ही मन पौधों के विषय में अपनी जानकारी और देखभाल करने की लगन को लेकर गर्व महसूस करती थी। फिर एक रात अचानक ही मौसम बिगड़ गया. ह...

प्रेम और समर्पण

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प्रेम और समर्पण द्वारका नगरी में उस दिन एक भव्य महोत्सव की तैयारी चल रही थी। राजमहल दीपों फूलों और सुगंधित पुष्प मालाओं से सजा हुआ था। चारों ओर उत्सव का वातावरण था और महल की विशाल रसोई में तरह तरह के पकवान बनाए जा रहे थे। सोने-चांदी की थालियों में मोदक, लड्डू और अनेक प्रकार के मिष्ठान सजाकर रखे गए थे। किसी को क्या पता था कि कुछ ही क्षणों में स्वयं पवनपुत्र हनुमान की बाल सुलभ लीला इस पूरे राजमहल में हलचल मचाने वाली है। उसी समय हनुमान जी आकाश मार्ग से द्वारिका के ऊपर से गुजर रहे थे। समुद्र की लहरों के बीच बसी सुंदर नगरी को देखकर उनके मन में बाल सुलभ उत्सुकता जागी। अचानक उन्हें राजमहल की ओर से आती मिष्ठान की अद्भुत सुगंध महसूस हुई। हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, "अरे वाह! यह कैसी सुगंध है? ऐसा लगता है जैसे माता सीता के हाथों से बना हुआ प्रसाद हो। उत्सुकता में वे अपनी दिव्य शक्ति से स्वयं को अदृश्य करके राजमहल के भीतर प्रवेश कर गए। हनुमान जी धीरे-धीरे रसोई तक पहुंचे। जैसे ही उन्होंने सामने रखे मोदक और लड्डुओं को देखा उनकी आंखों में बालक जैसी चमक आ गई। उन्होंने एक लड्डू उठाया और प्रेम स...

सब कुछ है

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मनुष्य के पास सब कुछ है  फिर दु:खी, रोगी, अशांत क्यों? कहते हैं एक बार माता पार्वती ने कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव से पूछा, "हे प्रभु! मनुष्य को आपने बुद्धि दी, परिश्रम करने की शक्ति दी, अवसर दिए, फिर भी अनेक लोग जीवन भर गरीबी, अभाव और दुख में क्यों जीते हैं? आखिर वह कौन सा रहस्य है, जिसे जान लेने के बाद मनुष्य कभी निर्धन नहीं रहता?"  माता पार्वती के इस प्रश्न को सुनकर महादेव मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, "देवी!  गरीबी केवल धन की कमी का नाम नहीं है। वास्तविक गरीबी मनुष्य के विचारों, साहस और निर्णयों में होती है। आज मैं तुम्हें एक ऐसी कथा सुनाता हूं जिसमें जीवन को बदल देने वाले पांच रहस्य छिपे हैं।" बहुत समय पहले एक नगर में एक अत्यंत गरीब स्त्री रहती थी। उसके छह पुत्र थे और उसका जीवन अभावों से भरा हुआ था। वह प्रतिदिन अपने पुत्रों के साथ एक साहूकार के यहां मजदूरी करती थी। दिन भर कठोर परिश्रम करने के बदले उसे केवल थोड़े से जौ मिलते थे। उन्हीं जौ को पीसकर वह अपने परिवार के लिए भोजन बनाती थी, लेकिन भोजन इतना कम होता कि किसी का पेट ठीक से नहीं भरता था। गरीबी इतनी थी कि...

मदद

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 मदद शनिवार की रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे जय कार्यालय से घर लौट रहा था। कुछ दूर जाने पर उसे सड़क किनारे एक युवती दिखाई दी, जो हाथ देकर किसी वाहन को रोकने का प्रयास कर रही थी। जय ने समझा कि वह उससे सहायता माँग रही है, इसलिए उसने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी। तभी एक तिपहिया वाहन वहाँ से निकल गया। युवती क्रोधित होकर बोली, “मैंने उस वाहन को रोका था। बड़ी मुश्किल से वह आया था, लेकिन आपकी वजह से वह भी निकल गया!” जय को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने तुरंत क्षमा माँगी और उसे घर तक छोड़ने की बात कही, लेकिन युवती ने मना कर दिया। रात गहराती जा रही थी। सड़क सुनसान थी और आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था। जय चाहता तो वहाँ से चला जाता, लेकिन उसका मन उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रहा था। उसने सोचा, “यदि इस समय इस युवती के साथ कोई अनहोनी हो गई, तो क्या मैं स्वयं को कभी क्षमा कर पाऊँगा?” वह लगभग आधे घंटे तक वहीं खड़ा रहा। फिर उसने युवती से कहा, “मेरे घर में भी तुम्हारे जैसी एक छोटी बहन है। मैं तुम्हें उसी की तरह समझकर सहायता करना चाहता हूँ। कृपया मेरी बात मान लो।” युवती कुछ शांत हुई, लेकिन फिर भी झिझक रही थी। ...

पारस पत्थर

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पारस पत्थर बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक किसान रहता था, जिसके पास सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन थी। किसान अब बूढ़ा हो चला था। उसका एक ही बेटा था—दिनेश। वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद किसान ने इतनी बड़ी जमीन बनाई थी, परंतु उसका बेटा मेहनत से दूर भागता था। उसे खेती-बाड़ी में बिल्कुल रुचि नहीं थी। वह चाहता था कि बिना मेहनत किए जल्द से जल्द बहुत अमीर बन जाए। इसी बीच एक दिन किसान की मृत्यु हो गई। अब सारी ज़मीन की जिम्मेदारी दिनेश पर आ गई। पर दिनेश के मन में केवल एक ही लालच घर कर चुका था—किसी भी तरह पारस पत्थर प्राप्त कर लेना। लोगों से उसने सुना था कि पारस पत्थर को किसी भी धातु से स्पर्श करा दो, वह सोना बन जाती है। यह सुनकर दिनेश की आँखों में सपनों की चमक भर गई। दिनेश पारस पत्थर की खोज में यहाँ–वहाँ भटकने लगा। उसने कई लोगों से पूछा, कई जगह गया, लेकिन पत्थर कहीं नहीं मिला। उसकी बेचैनी देखकर आसपास के ठगों की आँखों में चमक आ गई। वे दिनेश को नकली पारस पत्थर दिखाकर उससे लाखों रुपये ठग ले गए। ठगों के बाद दिनेश ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फँस गया। वे भी उसे लालच देकर उसका खूब पैसा ऐंठते रहे। पारस पत्थर क...

किस्मत

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किस्मत किस्मत में जो लिखा है वह बार बार आप के पास लौट कर आ जाता है और आप को गरीब से राजा बना देता है 🌹 कुन्दनलाल सारा दिन धूप में इधर-उधर घूम-फिर कर टूटा-फूटा सामान और कबाड़ जमा करता और फिर शाम को उसे बड़े कबाड़ी की दुकान पर बेचकर पेट भरने लायक कमा लेता था। एक दिन वह एक घर से पुराना सामान खरीद रहा था। घर के मालिक ने उसे एक पुराना पानदान भी दिया, जो उसने मोल -भाव करके एक रुपये में खरीद लिया। कुछ आगे बढ़ने पर एक और घर ने उसे कुछ कबाड़ बेचा, लेकिन घर के मालिक को वह पानदान पसन्द आ गया और उसने पांच रुपये में उसे खरीद लिया। लेकिन जब काफी कोशिश के बाद भी वह पानदान उससे नहीं खुला तो अगले दिन उसने उसे कुन्दनलाल को वापस करके अपने पांच रुपये ले लिए। शाम को बड़े कबाड़ी ने भी वह पानदान न खुलने के कारण उससे नहीं खरीदा। अगले दिन रविवार था। रविवार को बाजार के चौंक पर कुन्दनलाल पुराना सामान बेचता था। वहाँ उससे कोई ग्राहक पांच रुपये देकर वह पानदान ले गया। लेकिन अगले रविवार को वह ग्राहक वह पानदान उसे वापिस कर गया क्योंकि वह उससे भी नहीं खुला। बार-बार पानदान उसी के पास पहुँच जाने के कारण कुन्दनलाल को बहु...

परछाई

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परछाई एक रानी नहाकर अपने महल की छत पर बाल सुखाने के लिए गई। उसके गले में एक हीरों का हार था, जिसे उतार कर वहीं आले पर रख दिया और बाल संवारने लगी। इतने में एक कौवा आया। उसने देखा कि कोई चमकीली चीज है, तो उसे लेकर उड़ गया। एक पेड़ पर बैठ कर उसे खाने की कोशिश की, पर खा न सका। कठोर हीरों पर मारते-मारते चोंच दुखने लगी। अंतत: हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ कर वह उड़ गया। जब रानी के बाल सूख गए तो उसका ध्यान अपने हार पर गया, पर वह तो वहां था ही नहीं। इधर-उधर ढूंढा, परन्तु हार गायब। रोती-धोती वह राजा के पास पहुंची, बोली कि हार चोरी हो गई है, उसका पता लगाइए। राजा ने कहा, "चिंता क्यों करती हो, दूसरा बनवा देंगे।" लेकिन रानी मानी नहीं, उसे उसी हार की रट थी। कहने लगी, "नहीं मुझे तो वही हार चाहिए।" अब सब ढूंढने लगे, पर किसी को हार मिले ही नहीं। राजा ने कोतवाल को कहा, "मुझे वह गायब हुआ हार लाकर दो।" कोतवाल बड़ा परेशान, कहां मिलेगा? सिपाही, प्रजा, कोतवाल- सब खोजने में लग गए। राजा ने ऐलान किया - जो कोई हार लाकर मुझे देगा, उसको मैं आधा राज्य पुरस्कार में दे दूंगा। अब तो होड़ ...

चार रत्न

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चार रत्न               एक वृद्ध संत ने अपने जीवन की अंतिम घड़ीयों को नज़दीक देख अपने बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा: मैं तुम बच्चों को चार कीमती रत्न दे रहा हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि तुम इन्हें सम्भाल कर रखोगे तो पूरी ज़िन्दगी इनकी सहायता से अपना जीवन आनंदमय तथा श्रेष्ठ बना पाओगे। 1~पहला रत्न है: “माफी” :~ हमारे लिए कोई कुछ भी कहे, हमें उसकी बात को कभी अपने मन में नहीं  बिठाना हैं और ना ही उसके लिए कभी किसी प्रतिकार की भावना मन में रखना हैं, बल्कि उसे माफ़ कर देना है। 2~दूसरा रत्न है: “भूल जाना” :~ अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद अपने मन में नहीं रखना। 3~तीसरा रत्न है: “विश्वास” :~ हमें अपनी मेहनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना हैं, क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते.. जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीं लिखा होगा। परमपिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास ही हमें अपने जीवन के हर संकट से बचा पाएगा और सफल करेगा। 4~चौथा रत्न है: “वैराग्य” :~ हमेशा यह याद रखें  ...

भगवान पर भरोसा

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भगवान पर भरोसा  भगवान पर भरोसा रहे तो सही रास्ता मिलता है ======================== एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में माधव नाम का एक साधारण व्यक्ति रहता था। वह भगवान श्रीकृष्ण का बहुत बड़ा भक्त था। हर सुबह सूर्योदय से पहले उठता, स्नान करता, अपने घर के छोटे से मंदिर में दीपक जलाता और पूरे मन से भगवान का स्मरण करता। उसके घर में धन-दौलत बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन उसे विश्वास था कि जब तक श्रीकृष्ण उसके साथ हैं, तब तक उसे किसी चीज की कमी नहीं हो सकती। लेकिन समय के साथ उसके जीवन में एक के बाद एक ऐसी परेशानियां आने लगीं कि उसका विश्वास भी डगमगाने लगा। कभी व्यापार में नुकसान होता, कभी खेत में फसल खराब हो जाती, कभी घर में कोई नई समस्या खड़ी हो जाती। वह हर बार भगवान के सामने सिर झुकाकर कहता कि प्रभु, मैं आपकी पूजा करता हूं, फिर मेरे जीवन में इतनी कठिनाइयां क्यों आती हैं? एक दिन समस्या इतनी बढ़ गई कि माधव का धैर्य पूरी तरह टूट गया। वह सुबह मंदिर में गया, भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने दीपक जलाया और कुछ देर तक चुपचाप खड़ा रहा। उसकी आंखों में आंसू थे और मन में बहुत सारे सवाल।  आखिरकार...