चोरी का दंड
चोरी का दंड एक समय कांचीपुर नामक गांव में वज्र नाम का एक चोर रहता था। चोर नाम के भांति ही वज्र ह्रदय का था। उसे जिसका जो धन या सामान मिलता, वही चुरा लेता। उसे तनिक भी दया नहीं आती थी कि उस सामान के स्वामी को कितना कष्ट होगा ! वह चुराए हुए धन को सिपाहियों के भय से जंगल में जमीन के अंदर छुपा देता था ! एक रात वीरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली और चोर के जाने के पश्चात जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया और गड्ढे को पहले की भांति ढक दिया। लकड़हारा इतनी चालाकी से सामान निकलता कि चोर को इस चोरी का पता ही नहीं चल पता था। एक दिन लकड़हारा अपनी पत्नी को धन देते हुए बोला कि तुम रोज धन माँगा करती थी, लो! आज पर्याप्त धन इक्कठा हो गया है। उसकी पत्नी ने कहा - जो धन अपने परिश्रम से उपार्जित न किया गया हो, वह स्थाई नहीं होता है। इसलिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिये। वीरदत्त को भी ये बात जच गयी ! इसलिए उसने इस धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया, जिसका पानी कभी भी नहीं सूखता था, लेकिन इसमें सीढ़ियाँ लगनी रह गयी थी और सारे पैसे समाप्त हो गये थे। तो वह फिर से छिप...