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चिड़िया से सीख

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   चिड़िया से सीख बहुत पहले आप ने एक चिड़िया की कहानी सुनी होगी..जिसका एक दाना पेड़ के कंदरे में कहीं फंस गया था। चिड़िया ने पेड़ से बहुत अनुरोध किया उस दाने को दे देने के लिए, लेकिन पेड़ उस छोटी सी चिड़िया की बात भला कहां सुनने वाला था।.. चिड़िया गाती हुई उड़ने लगी -  मेरा दाना पेड़ ने रख लिया। पेड़ दाना देवे ना। दाना तो मैं लेऊँगी, पर छोड़ूँ ना। हार कर चिड़िया बढ़ई के पास गई और उसने उससे अनुरोध किया कि तुम उस पेड़ को काट दो, क्योंकि वह उसका दाना नहीं दे रहा...। भला एक दाने के लिए बढ़ई पेड़ कहां काटने वाला था...... चिड़िया गाती हुई उड़ने लगी -  मेरा दाना पेड़ ने रख लिया। पेड़ दाना देवे ना। बढ़ई पेड़ काटे ना। दाना तो मैं लेऊँगी, पर छोड़ूँ ना। फिर चिड़िया राजा के पास गई और उसने राजा से कहा कि तुम बढ़ई को सजा दो, क्योंकि बढ़ई पेड़ नहीं काट रहा और पेड़ दाना नहीं दे रहा...। राजा ने उस नन्हीं चिड़िया को डांट कर भगा दिया कि कहां एक दाने के लिए वो उस तक पहुंच गई है। चिड़िया हार नहीं मानने वाली थी...। चिड़िया गाती हुई उड़ने लगी -  मेरा दाना पेड़ ने रख लिया। पेड़ दाना देवे ना। बढ़ई पेड़ काटे ना। राजा बढ़ई को...

गुरु-दक्षिणा

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गुरु-दक्षिणा  एक बार एक शिष्य ने विनम्रता पूर्वक अपने गुरु जी से पूछा - गुरु जी! कुछ लोग कहते हैं कि  जीवन एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं; इनमें कौन सही है?  गुरु जी ने तत्काल बहुत ही धैर्य पूर्वक उत्तर दिया - पुत्र! जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है, जिन्हें गुरु मिल गया, उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं।  यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था। गुरु जी को इसका आभास हो गया। वे कहने लगे - लो! तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ। ध्यान से सुनोगे, तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे। उन्होंने जो कहानी सुनाई वह इस प्रकार थी। एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में उनसे क्या चाहिए। गुरु जी पहले तो मंद मंद मुस्कुराये और फिर बड़े स्नेह पूर्वक कहने लगे - मु...

संत नामदेव

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संत नामदेव ने सेठ की परीक्षा की? पंढरपुर में एक धनी-मानी सेठ अपने कल्याण के लिए तुलादन का उत्सव किया करता था। वो पलड़े में एक तरफ़ ख़ुद बैठ जाता था और दू सरी तरफ़ सोना चाँदी तौल कर संतों में बाँट देता था।  . एक वैष्णव ने कहा - यदि आपने जीवन में नामदेव जी की सेवा नहीं की तो क्या किया? सेठ ने पहले नौकर को भेजा तो नामदेव जी ने कहा - हमें आवश्यकता नहीं।  . फिर सेठ ने अपने मुनीम को भेजा तो नामदेव जी ने कहा कि ये दूसरे ब्राह्मणों में बाँट दें, हम तो संतुष्ट हैं। फिर वो स्वयं गया और चरणों में प्रणाम किया और दान लेने की प्रार्थना की।  . नामदेव जी ने देखा कि इन्हें धन का बड़ा अभिमान है, तो उन्होंने पूछा कि हम जितना माँगेंगे उतना दे देंगे? सेठ ने कहा - जी बिलकुल!  नामदेव जी अपने साथ एक तुलसी का पत्ता लेकर गये। उन्होंने तुलसी के पत्ते पर "राम" का आधा नाम "रा" लिख दिया। लिख कर कहा - मुझे बस! वजन का सोना दे दो. एक पलडे में तु लसी का पत्ता, जिस पर राम का आधा नाम लिखा था और दूसरे में सोना।  . सेठ ने कहा - इसमें कितना सोना ही आएगा, मेरा मज़ाक़ उड़ा रहे हो क्या? नामदेव जी ने ...

एक नियम

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एक नियम रात के ढाई बजे था, एक सेठ को नींद नहीं आ रही थी । वह घर में चक्कर पर चक्कर लगाये जा रहा था। पर चैन नहीं पड़ रहा था । आखिर थक कर नीचे उतर आया और कार निकाली । शहर की सड़कों पर निकल गया। रास्ते में एक मंदिर दिखा । सोचा कि थोड़ी देर इस मंदिर में जाकर भगवान के पास बैठता हूँ। प्रार्थना करता हूं तो शायद शांति मिल जाये। वह सेठ मंदिर के अंदर गया तो देखा, एक दूसरा आदमी पहले से ही भगवान की मूर्ति के सामने बैठा था । मगर उसका उदास चेहरा, आंखों में करुणा दिख रही थी। सेठ ने पूछा, "क्यों भाई! इतनी रात को मन्दिर में क्या कर रहे हो ?" आदमी ने कहा, "मेरी पत्नी अस्पताल में है, सुबह यदि उसका आपरेशन नहीं हुआ, तो वह मर जायेगी और मेरे पास आपरेशन के लिए पैसा नहीं है। उसकी बात सुनकर सेठ ने जेब में जितने रुपए थे,  वे उस आदमी को दे दिए। अब गरीब आदमी के चहरे पर चमक आ गईं थी। सेठ ने अपना कार्ड दिया, और कहा - इसमें फोन नम्बर और पता भी है और जरूरत हो तो निसंकोच बताना। उस गरीब आदमी ने कार्ड वापिस दे दिया और कहा - मेरे पास उसका पता है । इस पते की जरूरत नहीं है, सेठजी आश्चर्य से सेठ ने कहा - किस...

पिता का पुण्य

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पिता का पुण्य अमित ने जल्दी से बाईक स्टैंड पर लगाई और बारिश से बचते हुए एक टी-स्टाल पर छप्पर के नीचे खड़ा हो गयाथा। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। कई लोग खड़े थे। अमित ने चाय वाले को कहा – ‘‘भैया! एक चाय बना देना।’’ चाय वाले ने उसकी ओर देखा और चाय बनाने लगा। चाय वाले से चाय लेकर अमित चाय की चुस्की लेने लगा। तभी उसे याद आया - एक दिन वह ऐसे ही अपने पिता के साथ स्कूटी पर जाता था। उसके पिता इसी जगह रुक कर चाय पीते थे, और हां! इसी चाय वाले से हंस हंस कर बात किया करत थे। पता नहीं क्या नाम था इसका, चलो, इससे बात करता हूं। अमित चाय वाले के पास पहुंचा – ‘‘भैया! तुम कितने साल से चाय बेच रहे हो।’’ ‘‘क्या हुआ साहब? चाय सही नहीं बनी क्या?मैं दूसरी बना देता हूं।’’ अमित ने हंसते हुए कहा – ‘‘अरे! वो बात नहीं है। चाय बढ़िया थी। तुम्हारी चाय पीते ही मुझे याद आया, जब मैं छोटा था, तब मेरे पापा यहीं आकर चाय पीते थे, वे तुमसे हंस हंस कर बातें किया करते थे।’’ चाय वाला सोच में पड़ गया – ‘‘क्या नाम बताया आपने अपने पापा का?’’ ‘‘जी, रामलखन।’’ ‘‘अरे वो तो हमारे पुराने मित्र थे। तुम जिला लखन पुर के हो न! हम भी...

कर्मों की सजा

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कर्मों की सजा एक भिखारी प्रतिदिन एक ही दरवाज़े पर जाकर भीख माँगता था। जैसे ही वह आवाज़ लगाता, घर का मालिक बाहर आता और उसे भला-बुरा कहने लगता—“मर क्यों नहीं जाते? काम क्यों नहीं करते? जीवन भर भीख ही माँगते रहोगे!” कभी-कभी क्रोध में आकर उसे धक्का भी दे देता। किन्तु भिखारी के होंठों पर केवल एक ही वाक्य रहता— “ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें।” एक दिन सेठ अत्यंत क्रोधित था। व्यापार में भारी हानि हुई थी। उसी समय भिखारी भीख माँगने आ पहुँचा। सेठ ने बिना कुछ सोचे एक पत्थर उठाकर उसके सिर पर दे मारा। रक्त बहने लगा, पर भिखारी ने शांत स्वर में फिर वही कहा—“ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें।” यह सुनकर सेठ का क्रोध कुछ शांत हुआ, पर मन में जिज्ञासा जागी—इतना अपमान सहकर भी यह व्यक्ति बद्दुआ क्यों नहीं देता? वह चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दिन भर सेठ ने देखा—कोई उसे तिरस्कार से देखता, कोई गालियाँ देता, कोई दुत्कारता; पर वह हर बार यही कहता—“ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें।” संध्या ढलने पर भिखारी अपनी झोंपड़ी में पहुँचा। वहाँ एक जर्जर खाट पर उसकी वृद्ध पत्नी लेटी थी। उसने कटोरे में झाँका—उसमें आध...

खुशकिस्मत

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खुशकिस्मत चालीस पार मोहन ने आखिर अपने आफिस की सहकर्मी सुधा से शादी कर ही ली....सुधा जहां एक अनाथ लडकी थी अपने चाचा चाची के पास पली बडी, व हीं  दूसरी ओर मोहन की केवल माताजी है ।  पिताजी का स्वर्गवास उसके छोटी उम्र मे ही हो गया था .... सुधा ने आते ही घर का सारा काम बहुत अच्छे से संभाल लिया ....वह अपनी बीमार सासूमां का अच्छे से ख्याल रखती..... लेकिन शादी के बीते एक साल बाद उसने एक आदत बना ली थी ।  वो अब अपनी सासूमां के पास बैठकर कुछ नहीं खाती थी ।  पहले तो दोनों सास-बहू साथ में ही खाना खाती थी.... सुधा की सास सुषमा जी पहले रसोई के काम में हाथ भी बंटवाती थी, इसलिए उनको सब पता होता था कि रसोई में किस डब्बे में क्या रखा है लेकिन अब बीमारी के कारण वो रसोई में भी न हीं  जा पाती थी.... मां जी.... ये लीजिए चाय-बिस्किट.... शाम को हाल में अपनी सास सुषमा जी को चाय-बिस्किट पकड़ाकर सुधा खुद थोड़ा दूर अपनी चाय लेकर पीने बैठ गई.... वो एक लाल रंग के डब्बे में से निकालकर खुद भी कुछ खा रही थी ।  सुधा को कुछ खाता देख उसकी सास सोंच रही थी.... पता नही ....ये सुधा बहू मुझे बि...

आशा की शक्ति

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आशा की शक्ति   कोई दो सौ वर्ष पहले जापान में दो राज्यों में युद्ध छिड़ गया था। छोटा राज्य भयभीत था; हार जाना उसका निश्चित था। उसके पास सैनिकों की संख्या कम थी। थोड़ी कम नहीं थी, बहुत कम थी। दुश्मन के पास दस सैनिक थे, तो उसके पास एक सैनिक था। उस राज्य के सेनापतियों ने युद्ध पर जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह तो सीधी मूढ़ता होगी; हम अपने आदमियों को व्यर्थ ही कटवाने ले जाएं। हार तो निश्चित है , तो हम अपना मुंह पराजय की कालिख से पोतने को तैयार नहीं; और अपने सैनिकों को भी व्यर्थ कटवाने के लिए हमारी मर्जी नहीं। मरने की बजाय हार जाना उचित है। मर कर भी हारना है, जीत की तो कोई संभावना ही नहीं है।  सम्राट भी कुछ नहीं कह सकता था, बात सत्य थी, आंकड़े सही थे। तब सम्राट ने गांव में बसे एक फकीर से जाकर प्रार्थना की कि क्या आप मेरी फौजों के सेनापति बन कर जा सकते हैं?  यह बात उसके सेनापति को समझ में ही नहीं आई । सेनापति जब इनकार करते हों, तो एक फकीर को, जिसे युद्ध का कोई अनुभव नहीं, जो कभी युद्ध पर गया नहीं, जिसने कभी कोई युद्ध किया नहीं, जिसने कभी युद्ध की कोई बात नहीं की, यह बिलकु...

सब दिन न होत एक समान

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सब दिन न होत एक समान  कहते हैं समय की धारा कभी एक सी नहीं बहती। जैसे नदी का पानी हर पल बदलता है, वैसे ही जीवन भी हर क्षण नया रूप लेता है। पेड़ पर लगे पत्ते एक जैसे नहीं होते, मौसम हर महीने बदलता है, और आकाश में हर दिन नया रंग घुल जाता है। यही परिवर्तन जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। एक छोटे से गाँव में करण नाम का युवक रहता था। वह स्वभाव से थोड़ा अधीर था। जब उसके जीवन में कठिनाइयाँ आईं, खेती में नुकसान हुआ, मित्र दूर हो गए और परिवार में बीमारी ने दस्तक दी तो वह अक्सर आकाश की ओर देखकर शिकायत करता, मेरे साथ ही ऐसा क्यों? क्या मेरा समय कभी नहीं बदलेगा? गाँव के बाहर एक विशाल पीपल का पेड़ था। करण रोज़ उसके नीचे बैठता और अपने दुःखों को सोचता रहता। एक दिन वहाँ से गुजरते हुए एक वृद्ध साधु ने उसे उदास देखा। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, “बेटा, क्यों इतने चिंतित हो?” करण ने कहा, “मेरा समय खराब चल रहा है। सब कुछ उल्टा हो रहा है। लगता है जीवन ऐसा ही रहेगा।  साधु ने पीपल के पेड़ की ओर इशारा करते हुए पूछा, “क्या तुमने कभी इस पेड़ को ध्यान से देखा है?  करण ने कहा, “हाँ, यह तो हमेशा ऐसा ही रहता है...

तानसेन का घमण्ड

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तानसेन का घमण्ड तानसेन को कला का घमण्ड हो गया था। एक बार तानसेन की भेंट वल्लभ सम्प्रदाय के विठ्ठलनाथजी से हुई। तानसेन उन्हें अपनी प्रशंसा और मुगल दरबार में अपनी पकड़ का अहसास कराने लगे। विठ्ठलनाथजी ने तानसेन को गीत सुनाने को कहा। तानसेन ने वह गीत सुनाया जो अकबर को बहुत पसन्द था। खुश होकर विठ्ठलनाथ ने तानसेन को एक हजार रूपए और दो कौड़ियां ईनाम के तौर पर दीं।  विठ्ठलनाथ ने कहा- दरबार के मुख्य गायक के पद को ध्यान में रखकर हजार रूपए का ईनाम और ये दौ कौड़ियां मेरी ओर से आपकी गायन कला की सच्ची कीमत है।           दो कौड़ी का गायक बताए जाने से तानसेन आगबबूला हो गए। विठ्ठलनाथजी ने धैर्य रखने को कहा और गोविन्दस्वामी को गाने का इशारा किया। गोविन्दस्वामी ने भजन छेड़ा। भक्ति में विभोर हो गए, पीछे-पीछे तानसेन समेत सभी झूमने लगे। गीत समाप्त हुआ तो तानसेन की तंद्रा टूटी। विठ्ठलस्वामी से व्यवहार के लिए क्षमा मांगते हुए कहा - आपने मेरी सच्ची कीमत लगाई थी। मैं तो दो कौड़ी का ही हूँ।           विठ्ठलस्वामी बोले - ऐसा नहीं है। तानसेन, तुम उच्च कोटि के ग...

धारणा

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धारणा !! किसी के बारे में धारणा बनाने से पहले सच्चाई जाने !! एक बार ट्रेन से पिता-पुत्र यात्रा कर रहे थे, पुत्र की उम्र करीब 24 साल की थी, पुत्र ने खिड़की के पास बैठने की ज़िद की, क्योंकि पिता खिड़की की सीट पर बैठे थे। पिता ने ख़ुशी ख़ुशी खिड़की की सीट पुत्र को दे दी, और खुद बगल में बैठ गये। ट्रेन में आस पास और भी यात्री बैठे थे, ट्रेन चली तो पुत्र बड़ी उत्सुकता से चिल्लाने लगा, “देखो पिता जी! नदी, पुल, पेड़ पीछे जा रहे है, बादल भी पीछे छूट रहे है। पिता भी उसकी हाँ में हाँ मिला रहे थे। उसकी ऐसी हरकतों को देखकर वहां बैठे यात्रियों को लगा कि शायद इस लड़के को कोई दिमागी समस्या है, जिसके कारण यह ऐसी हरकत कर रहा है। पुत्र बहुत देर तक ऐसी अजीबोगरीब हरकत करता रहा। तभी पास बैठे एक यात्री ने पिता से पूछा कि- आप अपने पुत्र को किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नही दिखाते? क्योंकि उसकी हरकत सामान्य नहीं है, हो सकता है कि कोई दिमागी बीमारी हो।  उस यात्री की बात सुनकर पिता ने कहा- हम अभी डॉक्टर के पास से ही आ रहे हैं। पिता की सुनकर यात्री को आश्चर्य हुआ। पिता ने बताया कि- मेरा पुत्र जन्म से ही अंध...

सच्ची मदद

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सच्ची मदद   एक नन्हा परिंदा अपने परिवार-जनों से बिछड़ कर अपने आशियाने से बहुत दूर आ गया था । उस नन्हे परिंदे को अभी उड़ान भरने अच्छे से नहीं आता था… उसने उड़ना सीखना अभी शुरू ही किया था ! उधर नन्हे परिंदे के परिवार वाले बहुत परेशान थे और उसके आने की राह देख रहे थे । इधर नन्हा परिंदा भी समझ नहीं पा रहा था कि वह अपने आशियाने तक कैसे पहुंचे? वह उड़ान भरने की काफी कोशिश कर रहा था, पर बार-बार कुछ ऊपर उठ कर गिर जाता। कुछ दूर से एक अनजान परिंदा अपने मित्र के साथ ये सब दृश्य बड़े गौर से देख रहा था। कुछ देर देखने के बाद वो दोनों परिंदे उस नन्हे परिंदे के करीब आ पहुंचे। नन्हा परिंदा उन्हें देख कर पहले घबरा गया, फिर उसने सोचा - शायद ये उसकी मदद करें और उसे घर तक पहुंचा दें। अनजान परिंदा – क्या हुआ, नन्हे परिंदे? काफी परेशान हो ? नन्हा परिंदा – मैं रास्ता भटक गया हूँ और मुझे शाम होने से पहले अपने घर लौटना है। मुझे उड़ान भरना अभी अच्छे से नहीं आता। मेरे घर वाले बहुत परेशान हो रहे होंगे। आप मुझे उड़ान भरना सीखा सकते है? मैं काफी देर से कोशिश कर रहा हूँ, पर कामयाबी नहीं मिल पा रही है। अनजान पर...