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भक्त और भगवान

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    भक्त और भगवान           भक्त करमानन्द जी अपने गायन से प्रभु की सेवा किया करते थे। इनका गायन इतना भावपूर्ण होता था कि पत्थर-हृदय भी पिघल जाता था। ज्यादा दिनों तक इनको गृहस्थी रास नहीं आयी और ये सब कुछ छोड़कर निकल पड़े। इनके पास केवल दो चीजें ही थीं एक छड़ी और दूसरा ठाकुर बटुआ जिसे ये गले में टाँग कर चलते थे।   ये जहाँ विश्राम करने के लिये ठहरते, वहाँ छड़ी को गाड़ देते और उस पर ठाकुर बटुआ लटका देते थे। इससे ठाकुर जी को झूला झूलने का आनन्द मिलता था।  एक दिन ये सुबह सुबह ठाकुर जी की पूजा करके श्री ठाकुर बटुआ को गले में लटका कर चल दिए। उस समय ये भगवन्नाम में इतने डूबे हुए थे कि छड़ी को लेना भूल गए।  अब जब दूसरी जगह ये विश्राम करने के लिये रुके तो इन्हें छड़ी की याद आयी। अब समस्या थी कि ठाकुर जी को कैसे और कहाँ पधरावें। श्री ठाकुरजी में प्रेम की अधिकता के कारण इन्हें उन पर प्रणय-रोष हो आया।  ये गुस्सा करते हुए बोले कि ठाकुर हम तो जीव हैं, हम कितना याद रखें। हम छड़ी भूल गए थे, तो आपको याद दिलाना चाहिए था। अब दूसरी छड़ी कहाँ से लाएँ ? ...

लालच बुरी बला है

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  लालच बुरी बला है एक शहर में एक आदमी रहता था। वह बहुत ही लालची था। उसने सुन रखा था कि अगर संतों और साधुओं की सेवा करें तो बहुत ज्यादा धन प्राप्त होता है। यह सोच कर उसने साधु-संतों की सेवा करनी प्रारम्भ कर दी। एक बार उसके घर बड़े ही चमत्कारी संत आये। उन्होंने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसे चार दीये दिए और कहा,”इनमें  से एक दीया जला लेना और पूरब दिशा की ओर चले जाना। जहाँ यह दीया बुझ जाये, वहाँ की जमीन को खोद लेना, वहाँ तुम्हें काफी धन मिल जायेगा। अगर फिर तुम्हें धन की आवश्यकता पड़े,  तो दूसरा दीया जला लेना और पक्षिम दिशा की ओर चले जाना, जहाँ यह दीया बुझ जाये, वहाँ की जमीन खोद लेना। तुम्हें मन चाही माया मिलेगी। फिर भी संतुष्टि न हो तो तीसरा दीया जला लेना और दक्षिण दिशा की ओर चले जाना। उसी प्रकार दीया बुझने पर जब तुम वहाँ की जमीन खोदोगे, तो तुम्हें  बेअन्त धन मिलेगा। तब तुम्हारे पास केवल एक दीया बच जायेगा और एक ही दिशा रह जायेगी। तुम्हें यह दीया न ही जलाना है और न ही इसे उत्तर दिशा की ओर ले जाना है।” यह कह कर संत चले गए। लालची आदमी उसी वक्त पहला दीया जला कर पूरब दिशा की ओर...

ईश्वर की कृपा

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 ईश्वर की कृपा   गंगा किनारे बसे एक छोटे से गाँव में माधव नाम का युवक रहता था। उसका मन भला था, पर आदतें बिगड़ी हुई थीं। क्रोध आलस्य और कभी कभी ईर्ष्या ये सब उसके स्वभाव में घर कर चुके थे। गाँव के लोग उसे अक्सर ताने देते, इससे तो कुछ होगा नहीं,  इसमें तो अवगुण ही अवगुण हैं। माधव का मन इन बातों से टूट सा गया था। एक दिन निराश होकर वह गाँव के पुराने हनुमान मंदिर में जा पहुँचा। मंदिर शांत था, दीपक की लौ हल्के हल्के काँप रही थी। दीवार पर लिखी एक चौपाई उसकी आँखों में ठहर गई जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥ माधव की आँखों से आँसू बह निकले। वह बुद बुदाया - हे प्रभु! मुझमें सचमुच बहुत अवगुण हैं, पर क्या दास होने के नाते आप मुझे ठुकरा देंगे? वह रोज़ मंदिर आने लगा। कोई बड़ा व्रत नहीं, कोई कठिन तप नहीं, बस! सच्चे मन से एक ही बात कहता, नाथ! मैं आपका हूँ, जैसा भी हूँ। कुछ दिनों बाद गाँव में बाढ़ आ गई। लोग घबरा गए। मंदिर के पास रहने वाला माधव बिना सोचे समझे मदद में जुट गया। किसी को कंधा दिया, किसी का सामान निकाला, किसी बच्चे को गोद में उठा कर सुरक्षित स्थान तक पह...

चरणों की धूल

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चरणों  की धूल एक सेठ नदी पर आत्महत्या करने जा रहा था। संयोग से एक लंगोटीधारी संत भी वहाँ थे। संत ने उसे रोक कर, कारण पूछा, तो सेठ ने बताया कि उसे व्यापार में बड़ी हानि हो गई है। संत ने मुस्कुराते हुए कहा- बस इतनी सी बात है? चलो मेरे साथ, मैं अपने तपोबल से लक्ष्मी जी को तुम्हारे सामने बुला दूंगा। फिर उनसे जो चाहे माँग लेना। सेठ उनके साथ चल पड़ा। कुटिया में पहुँच कर, संत ने लक्ष्मी जी को साक्षात प्रकट कर दिया। वे इतनी सुंदर, इतनी सुंदर थीं कि सेठ अवाक रह गया और धन माँगना भूल गया। देखते- देखते सेठ की दृष्टि उनके चरणों पर पड़ी। उनके चरण मैल से सने थे। सेठ ने हैरानी से पूछा- माँ! आपके चरणों में यह मैल कैसी? माँ- पुत्र! जो लोग भगवान को नहीं चाहते, मुझे ही चाहते हैं, वे पापी मेरे चरणों में अपना पाप से भरा माथा रगड़ते हैं। उनके माथे की मैल मेरे चरणों पर चढ़ जाती है। ऐसा कहकर लक्ष्मी जी अंतर्ध्यान हो गईं। अब सेठ धन न माँगने की अपनी भूल पर पछताया, और संत चरणों में गिर कर, एकबार फिर उन्हें बुलाने का आग्रह करने लगा। संत ने लक्ष्मी जी को पुनः बुला दिया। इस बार लक्ष्मी जी के चरण तो चमक रहे थे, प...

जो चाहोगे सो पाओगे

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  जो चाहोगे सो पाओगे   एक साधु था वह प्रतिदिन घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था जो चाहोगे सो पाओगे  जो चाहोगे सो पाओगे। बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नहीं देता था और सब उसे एक पागल साधु समझते थे। एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी जो चाहोगे सो पाओगे जो चाहोगे सो पाओगे। और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा - महाराज! आप बोल रहे थे कि जो चाहोगे सो पाओगे, तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैं चाहता हूँ? साधु उसकी बात को सुनकर बोला  - हाँ बेटा! तुम जो कुछ भी चाहता है मैं उसे अवश्य दूंगा। बस तुम्हें मेरी बात माननी होगी। किन्तु पहले ये तो बताओ कि तुम्हें आखिर चाहिये क्या?  युवक बोला - मेरी एक ही इच्छा है कि मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। साधु बोला - कोई बात नहीं। मैं तुम्हें एक हीरा और एक मोती देता हूँ। उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!  और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ युवक की हथेली पर रखते हुए कहा - पुत्र! मैं तुम्हें दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं...

क्षमा

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  क्षमा एक साधक ने अपने दामाद को तीन लाख रुपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया लेकिन उसने रुपये ससुर जी को नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया। झगड़ा इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। साधक हर समय हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा, निरादर व आलोचना करने लगे। उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें दामाद का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा कह सुनायी। संतश्री ने कहाः- 'बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, "बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।" साधक ने कहाः "महाराज ! मैंने ही उनकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगू !" संतश्री ने उत्तर दियाः- "परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चा...

विश्वास की ज्योति

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  विश्वास की ज्योति   उदय राम शहर का एक अत्यंत कुशाग्र बुद्धि वाला तर्क शास्त्री था, जिसकी पहचान एक ऐसे कट्टर नास्तिक के रूप में थी, जो केवल प्रत्यक्ष प्रमाण और वैज्ञानिक आंकड़ों पर ही विश्वास करता था और अक्सर सभाओं में यह चुनौती देता था कि यदि ईश्वर है तो वह दिखाई क्यों नहीं देता, क्योंकि उसकी दृष्टि में जो अस्तित्वहीन है वही अदृश्य है।  वह जीवन को रसायनों और भौतिक क्रियाओं का एक आकस्मिक मेल मात्र मानता था, जिसमें भावना या प्रार्थना का कोई स्थान नहीं था, परंतु उसके इस कठोर तार्किक संसार को एक ऐसी घटना ने झकझोर दिया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक बार अपने शोध कार्य के लिए वह हिमालय की उन दुर्गम और निर्जन पहाड़ियों के भ्रमण पर था, जहाँ प्रकृति का सौंदर्य जितना मनमोहक था, उसकी कठोरता उतनी ही जानलेवा थी।  एक शाम जब वह एक संकरी ढलान से गुजर रहा था, अचानक तेज़ बारिश और भूस्खलन के कारण उसका पैर फिसला और वह हज़ारों फीट गहरी खाई की ओर लुढ़कने लगा। लेकिन किस्मत से उसकी शर्ट एक मज़बूत झाड़ी के तने में फंस गई और वह हवा में झूलने लगा। नीचे मौत का अंधेरा था और ऊपर बारिश ...

समर्पित भाव

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  समर्पित भाव    दो साधु थे। वह दोनों वर्षा काल के लिए अपने झोपड़े पर वापस लौट रहे थे। आठ महीने घूमते रहे, भटकते रहे। गांव-गांव उस परमात्मा का गीत गाते रहेे। हर वर्ष की भांति वर्षा काल में अपने झोपड़े पर लौट आए। गुरू बूढ़ा था, शिष्य जवान था। जैसे ही वे करीब पहुंच,े झील के किनारे अपने झोपड़े को देखा, छप्पर जमीन पर पड़ा है। जोर की आंधी आयी थी रात। आधा छप्पर उड़ गया था। छोटा-सा झोपड़ा है, उसका भी आधा छप्पर उड़ गया।  वर्षा सिर पर है। अब कुछ करना भी मुश्किल होगा। दूर जंगल में यह निवास है। युवा संन्यासी शिष्य ने कहा देखो हम प्रार्थना कर कर के मरे जाते हैं हम उसकी याद कर कर के मरे जाते हैं, उसकी तरफ से यह फल। इसलिए तो मैं कहता हूं कि कुछ सार नहीं है भक्ति में। प्रार्थना पूजा से मिलता क्या हैं? दुष्टों के महल साबित हैं, हम गरीब साधुओं की झोपड़ी गिर गयी आधी और यह आंधी भी तो उसी की है।  जब वह क्रोध से यह बातें कर रहा था, तो उसने देखा कि उसका गुरु घुटने टेक कर बड़े आनंद भाव से आकाश की तरफ हाथ जोड़े बैठा था। उसकी आंखों से परम संतोष के आंसू बह रहे हैं और वह गुनगुना कर कह रहा है कि परमा...

जहाँ प्रेम वहीं ईश्वर

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  जहाँ प्रेम वहीं ईश्वर वृंदावन में एक ग्वाला कृष्ण के प्रति बहुत प्रेम रखता था। उसका नाम माधव था। माधव बहुत साधारण व्यक्ति था, पर उसका हृदय श्रीकृष्ण के लिए अपार भक्ति से भरा हुआ था। माधव रोज सुबह उठकर सबसे पहले भगवान का स्मरण करता और कहता, “हे गोपाल! आज दिन भर तुम मेरे संग रहना।” वह मंदिर जाने या पूजा-पाठ के नियम नहीं जानता था, पर अपने काम-धंधे के बीच भी बार-बार कृष्ण का नाम लेता रहता। एक दिन गाँव में बहुत बड़ी विपत्ति आ गई। मूसलाधार बारिश ने नदी का जलस्तर इतना बढ़ा दिया कि लोग अपने-अपने घरों में कैद हो गए। माधव के मन में एक ही चिंता थी कि मंदिर में ठाकुर जी को भोग कौन लगाएगा? उसने सोचा, “अगर ठाकुर जी को भोजन न मिला, तो वे भूखे रह जाएंगे।” उसने टोकरी में कुछ रोटियाँ, दूध और मक्खन रखा और तेज पानी के बहाव की परवाह किए बिना मंदिर की ओर चल पड़ा। रास्ते में पानी इतना बढ़ चुका था कि माधव का संतुलन बिगड़ गया। वह नदी में गिर पड़ा और बहने लगा। वह बस श्रीकृष्ण को पुकार रहा था  “है गोविंदा! रक्ष माम्! अचानक उसे लगा जैसे किसी ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया हो। उसने आँखें खोलीं तो देखा एक सुंदर नील...

समर्पण भाव होना चाहिए

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                    समर्पण भाव होना चाहिए                                                 एक बार किसी गांव में महात्मा बुद्ध का आगमन हुआ। सब इस होड़ में लग गये कि क्या भेंट करें। इधर गाँव में एक गरीब मोची था। उसने देखा कि मेरे घर के बाहर के तालाब में बेमौसम का एक कमल खिला है। उसकी इच्छा हुई कि, आज नगर में महात्मा आए हैं, सब लोग तो उधर ही गए हैं, आज हमारा काम चलेगा नहीं, आज यह फूल बेचकर ही गुज़ारा कर लें। वह तालाब के अंदर कीचड़ में घुस गया। कमल के फूल को लेकर आया। केले के पत्ते का दोना बनाया और उसके अंदर कमल का फूल रख दिया। पानी की कुछ बूंदें कमल पर पड़ी हुई हैं और वह बहुत सुंदर दिखाई दे रहा है।  इतनी देर में एक सेठ पास आया और आते ही कहा - क्यों फूल बेचने की इच्छा है? आज हम आपको इसके दो चांदी के रूपए दे सकते हैं।  अब उसने सोचा ... कि एक-दो आने का फूल! इस के दो रुपए दिए जा रहे हैं। वह आश्चर्य में पड़ गया।  इतनी...

संगठन में शक्ति

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  संगठन में शक्ति   एक बार हाथ की पाँचों उंगलियों में आपस में झगड़ा हो गया। वे पाँचों खुद को एक दूसरे से बड़ा सिद्ध करने की कोशिश में लगे थे। अंगूठा बोला कि मैं सबसे बड़ा हूँ, उसके पास वाली उंगली बोली - मैं सबसे बड़ी हूँ। इसी तरह सारे खुद को बड़ा सिद्ध करने में लगे थे, जब निर्णय नहीं हो पाया तो वे सब अदालत में गये। न्यायाधीश ने सारा माजरा सुना और उन पाँचों से कहाा कि आप लोग सिद्ध करो कि कैसे तुम सबसे बड़े हो? अंगूठा बोला - मैं सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा हूँ, क्योंकि लोग मुझे हस्ताक्षर के स्थान पर प्रयोग करते हैं। पास वाली उंगली बोली कि लोग मुझे किसी इंसान की पहचान के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। उसके पास वाली उंगली ने कहा कि आप लोगों ने मुझे नापा नहीं, अन्यथा मैं ही सबसे बड़ी हूँ। उसके पास वाली उंगली बोली - मैं सबसे ज्यादा अमीर हूँ क्योंकि लोग हीरे और जवाहरात और अंगूठी मुझी में पहनते हैं। इसी तरह सभी ने अपनी अलग अलग प्रशंशा की। सबसे छोटी उंगली बोली - मुझ से ही हाथ की शोभा पूर्ण होती है। न्यायाधीश ने अब एक रसगुल्ला मँगाया और अंगूठे से कहा कि इसे उठाओ, अंगूठे ने भरपूर जोर लगाया लेकिन रसगुल्ले ...

स्वयं को टटोलें

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                   स्वयं को टटोलें           एक बार अलग अलग दो आदमी यात्रा पर निकले! रास्ते में दोनों की मुलाकात हुई, दोनों का गन्तव्य एक थाए तो दोनों यात्रा में साथ हो लिए। सात दिन बाद दोनों के जुदा होने का समय आया, तो एक ने कहा - भाई साहब! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे। क्या आपने मुझे पहचाना? दूसरे ने कहा - नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना। पहला यात्री बोला - महोदय! मैं एक नामी ठग हूँ, परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरु निकले। दूसरा यात्री बोला - कैसे? पहला यात्री - कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली, परंतु मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतने दिन साथ रहने के बाद मुझे यह पता चल चुका है कि आप बहुत धनी व्यक्ति हैं और इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके पास कुछ भी नहीं है? लेकिन आप बिल्कुल खाली हाथ हैं! दूसरा यात्री - मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी-सी रजत मुद्राएं भी हैं। पहला यात्री बोला - तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं? दूसरा यात्री - मैं जब...

समस्या का सामना

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  समस्या का सामना ही समाधान एक बार बनारस में स्वामी विवेकनन्द जी मां दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे कि तभी वहां मौजूद बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया। वे उनसे प्रसाद छीनने लगे। वे उनके नजदीक आने लगे और डराने भी लगे। स्वामी जी बहुत भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे। वे बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए और वे भी उनके पीछे पीछे दौड़ने लगे। पास खड़े एक वृद्ध संन्यासी यह सब देख रहे थे। उन्होनें स्वामी जी को रोका और कहा, “रुको! डरो मत, उनका सामना करो।” वृद्ध संन्यासी की यह बात सुनकर स्वामी जी तुरंत पलटे और बंदरों के तरफ बढने लगे। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उनके ऐसा करते ही सभी बन्दर तुरंत भाग गए। उन्होनें वृद्ध संन्यासी को इस सलाह के लिए बहुत धन्यवाद किया। शिक्षा - इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक सम्बोधन में इसका जिक्र भी किया और कहा, “यदि तुम कभी किसी समस्या से भयभीत हो, तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो।” वाकई, यदि हम भी अपने जीवन में आई समस्याओं का सामना करें और उनसे भागें नहीं, तो बहुत.सी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। सद...

भक्त की रक्षा

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  भक्त की रक्षा   एक गांव में कृष्णा बाई नाम की बुढ़िया रहती थी। वह भगवान श्री कृष्ण की परम भक्त थी। वह एक झोपड़ी में रहती थी। कृष्णा बाई का वास्तविक नाम सुखिया था पर कृष्ण भक्ति के कारण इनका नाम गांव वालों ने कृष्णा बाई रख दिया। घर-घर में झाड़ू, पोछा, बर्तन और खाना बनाना ही इनका काम था। कृष्णा बाई रोज फूलों की माला बनाकर दोनों समय श्री कृष्ण जी को पहनाती थी और घण्टों कान्हा से बात करती थी। गांव के लोग यहीं सोचते थे कि बुढ़िया पागल है। एक रात श्री कृष्ण जी ने अपनी भक्त कृष्णा बाई से कहा - ‘कल बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है तुम यह गांव छोड़ कर दूसरे गांव चली जाओ।’ अब क्या था मालिक का आदेश था। कृष्णा बाई ने अपना सामान इकट्ठा करना शुरू किया और गांव वालों को बताया कि कल सपने में कान्हा आए थे और कह रहे थे कि बहुत प्रलय होगा, पास के गांव में चली जा। लोग कहाँ उस बूढ़ी पागल का बात मानने वाले थे। जो सुनता वही जोर-जोर ठहाके लगाता। इतने में बाई ने एक बैलगाड़ी मंगाई और अपने कान्हा की मूर्ति ली और सामान की गठरी बांध कर गाड़ी में बैठ गई। और लोग उसकी मूर्खता पर हंसते रहे। बाई जाने लगी बिल्कुल अपने गांव ...