Posts

जीवन का सत्य

Image
जीवन का सत्य    प्रातःकाल शांत वातावरण था। सूर्य की हल्की किरणें बोधिवृक्ष की पत्तियों से छनकर नीचे बैठी भिक्षु सभा पर पड़ रही थीं। भगवान बुद्ध के शिष्य ध्यान मग्न होकर उनके प्रवचन की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही बुद्ध सभा में पहुँचे, शिष्यों की आँखें आश्चर्य से फैल गईं। आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे एक साधारण सी रस्सी। बिना कुछ बोले बुद्ध अपने आसन पर बैठे और पूरी शांति के साथ उस रस्सी में एक के बाद एक तीन गाँठें लगाने लगे।  सभा में सन्नाटा छा गया। हर मन में एक ही प्रश्न था आज यह मौन क्यों, यह रस्सी क्यों? कुछ क्षणों बाद बुद्ध ने शांत स्वर में पूछा, मैंने इस रस्सी में तीन गाँठें लगा दी हैं। बताओ, क्या यह वही रस्सी है जो पहले थी? शिष्य सोच में पड़ गए।  थोड़ी देर बाद एक शिष्य ने विनम्रता से कहा - भगवन्! यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। बाहर से देखें तो रस्सी बदली हुई लगती है क्योंकि इसमें गाँठें लग गई हैं। लेकिन भीतर से, अपने मूल स्वरूप में, यह वही रस्सी है। बुद्ध मुस्कराए - सत्य कहा तुमने फिर उन्होंने रस्सी के दोनों सिरों को पकड़कर जोर से खींचना शुरू कर दि...

हमारा सच्चा साथी

Image
  हमारा सच्चा साथी एक छोटे से गाँव में श्रीधर नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह स्वभाव से थोड़ा कमजोर और डरपोक किस्म का व्यक्ति था! एक बार वह एक महात्मा जी के आश्रम में गया और उन्हें अपनी कमजोरी बताई और उनसे प्रार्थना करने लगा कि हे देव! मुझे कोई ऐसा साथी मिल जाये जो सबसे शक्तिशाली हो और विश्वास पात्र भी। जिस पर मैं आँखें बँद करके विश्वास कर सकूँ। जिससे मैं मित्रता करके अपनी कमजोरी को दूर कर सकूँ! हे देव! भले ही एक ही साथी मिले, पर ऐसा मिले कि वह मेरा साथ कभी न छोड़े! तो महात्मा जी ने कहा - पूर्व दिशा में जाना और तब तक चलते रहना, जब तक तुम्हारी तलाश पूरी न हो जाये। और हाँ! तुम्हें ऐसा साथी अवश्य मिलेगा, जो तुम्हारा साथ कभी नही छोडे़गा, बशर्ते कि तुम उसका साथ न छोड़ो! श्रीधर ने कहा - बस! एक बार वह मुझे मिल जाये, तो फिर मैं उसका साथ कभी न छोडूंगा। पर हे देव! मेरी तलाश तो पूरी होगी न! महात्माजी ने कहा - हे वत्स! यदि तुम सच्चे दिल से उसे पाना चाहते हो तो वह बहुत सुलभता से तुम्हें मिल जायेगा, लेकिन है वह बहुत दुर्लभ!  फिर उसने महात्मा जी को प्रणाम किया, आशीर्वाद लिया और चल पड़ा अपनी राह पर...

देह में रहते विदेही

Image
देह में रहते विदेही  हिदीं शब्दकोष में विदेह का अर्थ होता है बिना देह का ....लेकिन विदेही उसे कहते हैं, जो देह में रह कर भी देह से पूरी तरह अनासक्त (कहीं दूर चले जाना) हो गया हो।  महाराजा जनक के एक मंत्री ने उनसे एक दिन पूछा - महाराज! आप देहधारी होकर भी विदेही क्यों कहे जाते है? महाराज जनक बोले - कुछ दिनों बाद इसका जवाब देंगे।  एक दिन राजा जनक ने दूत को बुलाकर कहा - जाकर शहर में ढिंढोरा पिटवाओ कि मंत्री के हाथों घोर अपराध होने के कारण उन्हें शाम चार बजे सूली पर चढ़ा दिया जाएगा। ढिंढोरे की कार्यवाही होने के बाद राजा ने मंत्री को दोपहर बारह बजे भोजन के लिए आमंत्रित किया। मंत्री नियत समय पर भोजन के लिए पहुंचा। राजा ने भोजन पर अनेकों प्रकार के व्यंजन बनवाए, किंतु भोजन में जहां जरूरत थी, वहां नमक बिल्कुल भी नहीं डलवाया। मंत्री का ध्यान तो सूली की तरफ था। खाने की बिल्कुल भी इच्छा न होने पर भी उन्होंने राजा के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए जैसे तैसे भोजन किया।  भोजन के पश्चात जनक ने पूछा - कैसा लगा भोजन?  मंत्री डरते हुए बोला - महाराज मौत के भय के कारण मुझे भोजन में कुछ ...

माता-पिता

Image
  माता-पिता वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से ऊपर जिसका अन्त नहीं उसे आसमाँ कहते हैं संसार में जिसका अन्त नहीं उसे पिता और माँ कहते हैं करो दिल से सिजदा, इबादत बनेगी  माँ बाप की सेवा, अमानत बनेगी खुलेगा जब तुम्हारे कर्मों का खाता तो माँ बाप की भक्ति, तुम्हारी जमानत बनेगी   माँ सत्य है, पिता विश्वास है इस लिए माता-पिता परमात्मा के खास हैं माँ आग में तपती है, पिता धूप में तपता है, तब जा कर कहीं सन्तान पलती है. वक्त का पता नहीं चलता अपनों के साथ पर अपनों का पता चलता है वक्त के साथ वक्त नहीं बदलता किसी के साथ पर अपने बदल जाते हैं वक्त के साथ. पुजारी कहता है कि भगवान नहीं मिलता मुल्लाँ कहता है कि रहमान नहीं मिलता मैं कहता हूँ कि आज इस इंसानों की दुनिया में ढूंढने पर भी इन्सान नहीं मिलता. सपने वो नहीं होते जो सोने पे आते हैं ,  सपने वो होते है जो सोने नहीं देते .  अपने वो नहीं होते, जो रोने पे आते हैं ,  अपने वो होते हैं जो कभी रोने नहीं देते . सच बोलू तो अपने रूठ जाते हैं ,  झूठ बोलू तो शब्द रूठ जाते हैं .  ईमानदार...