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जीवन बदल देने वाली कहानी..

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  जीवन बदल देने वाली कहानी....   रवि एक मध्यम   वर्गीय परिवार का इकलौता बेटा था। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे,और माँ एक घरेलू महिला। जब रवि दस साल का था,उसके पिता की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस दिन से उसके जीवन में अंधेरा उतर आया था। माँ ने सिलाई का काम शुरू किया,और रवि को पढ़ाई में जोड़े रखा। रवि समझ गया था कि अब उसके कंधों पर न केवल अपनी ज़िंदगी, बल्कि माँ की उम्मीदों का भी भार है।  वह बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था। उसने ठान लिया था कि वह बड़ा होकर एक दिन अफसर बनेगा- एक ऐसा बेटा जो माँ के सारे दुःख मिटा सके। स्कूल खत्म हुआ, कॉलेज भी किसी तरह पूरा किया गया, और फिर उसने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। रवि सुबह चार बजे उठता,मंदिर में जाकर दीप जलाता- और फिर किताबों में डूब जाता। उसे केवल एक चीज़ दिखाई देती थी- सफलता। पर पहली बार में असफल हुआ। माँ ने कहा, “कोई बात नहीं बेटा, भगवान पर भरोसा रखो।” वह फिर जुट गया। पर दूसरी बार भी नतीजा वही निकला। अब रिश्तेदारों ने ताने मारना शुरू कर दिए। कोई कहता-“इससे नहीं होगा”, कोई हँसते हुए कहता- “...

भक्त के प्रति वत्सलता

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  भक्त के प्रति वत्सलता  जब तुलसीदास जी काशी (वाराणसी) में रहकर श्री राम चरित मानस लिख रहे थे, तब उसकी लोकप्रियता और बढ़ते प्रभाव को देखकर कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने उस पवित्र ग्रंथ को चुराने या नष्ट करने की योजना बनाई। उन्होंने दो चोरों को रात के समय तुलसीदास जी की कुटिया में चोरी करने के लिए भेजा। पहरेदार और चोरों का हृदय परिवर्तन -अद्भुत पहरेदार:  जब चोर तुलसीदास जी के घर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि कुटिया के बाहर दो अत्यंत सुंदर और तेजस्वी राजकुमार हाथ में धनुष-बाण लिए पहरा दे रहे हैं। उनके तेज को देखकर चोर डर गए और वापस लौट गए। चोरों की जिज्ञासा-  चोरों ने अगली रात फिर प्रयास किया, लेकिन उन्हें फिर से वही दो धनुर्धारी पहरेदार वहां मिले। ऐसा लगातार कई रातों तक हुआ। अंत में चोरों के मन में यह जानने की व्याकुलता हुई कि आखिर ये रक्षक कौन हैं। सत्य का ज्ञान - अगले दिन सुबह वे चोर तुलसी दास जी के पास पहुँचे और उनसे पूछा कि, "बाबा! वे दो सांवले और गोरे रंग के धनुर्धारी युवक कौन हैं जो रात भर आपकी कुटिया के बाहर पहरा देते हैं?" तुलसीदास जी की प्रतिक्रिया -  जब तुलसीदास ...

किसका पलड़ा भारी

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किसका पलड़ा भारी  किसका ठाकुर भारी? श्री राम या श्री कृष्ण? जब ब्रज में सूरदास जी और तुलसीदास जी के बीच छिड़ गई एक प्यारी सी बहस! पढ़िए यह अद्भुत और रसपूर्ण कथा l एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी, सूरदास जी से मिलने ब्रज पहुँचे। दोनों महान संतों ने एक दूसरे की खूब प्रशंसा की और सत्संग किया। थोड़ी देर बाद तुलसीदास जी को हल्की सी शरारत सूझी।   उन्होंने सूरदास जी से कहा - "सूर बाबा! तुम कहाँ कन्हैया के चक्कर में पड़े हो? हमारे ठाकुर जी की शरण में आ जाओ। हमारा ठाकुर बहुत सीधा और वादे का पक्का है, तुम्हारा कन्हैया तो एक बात पर टिकता ही नहीं!"  सूरदास जी को यह बात थोड़ी चुभ गई। दोनों में ठन गई और यह तय हुआ कि आज तराजू पर तौल कर देखा जाएगा कि किसका ठाकुर भारी है! एक पेड़ पर तराजू लटकाया गया एक पलड़े में सूरदास जी अपने श्री कृष्ण की मूर्ति लेकर बैठे और बोले - "हे मेरे गोपाल जी! आज भक्त की लाज रखियो!" दूसरे पलड़े में तुलसीदास जी श्री सीताराम की मूर्ति लेकर बैठे और बोले - "जय हो मेरे श्री सीताराम! भक्त की लाज रखना!"  तराजू थोड़ी देर ऊपर नीचे हुआ और जब रुका  तो आश्चर्य! तु...

मां

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मां                                                     मुझे अपने बेटे की शादी में जाने में शर्म आ रही थी क्योंकि मेरी साड़ी पुरानी थी, लेकिन जब मेरी बहू ने मेरे शरीर पर वह हरी साड़ी देखी, तो उसकी प्रतिक्रिया ने पूरे हॉल को रुला दिया।......!! मेरा नाम सुमित्रा देवी है, 58 वर्ष की हूँ। मैं एक साधारण माँ हूँ, सब्जी मंडी में सब्जी बेचती हूँ, और अपने बेटे रोहन की अकेली अभिभावक हूँ। रोहन की शादी उस लड़की प्रिया से हो रही थी, जिससे वह बहुत प्यार करता था। प्रिया जो एक बड़े और रईस खानदान से थी और एक सफल डॉक्टर थी।....!! शादी से तीन महीने पहले, मुझे हर दिन घबराहट होने लगती थी। दावत या खर्च की वजह से नहीं, बल्कि एक छोटी सी बात की वजह से: मेरे पास पहनने के लिए कुछ नहीं था।.....!! मेरी जवानी के दिनों में, मेरे पास एक साड़ी थी, जिसे मैं हर खास मौके पर पहनती थी हरे रंग की, जिस पर साधारण सी कढ़ाई थी। समय के साथ उसका रंग फीका पड़ गया था, जैसे उस कपड़े में कोई इतिहास छिप...

ईश्वर स्वयं आते हैं

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ईश्वर स्वयं आते हैं  एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा "बीरबल! मैंने सुना है कि भगवान विष्णु एक हाथी की जान बचाने के लिए खुद आये थे  ।   बीरबल ने कहा  - जी महाराज !!. वो हाथी भगवन विष्णु का भक्त था और नदी से पानी पीते समय उसको मगर ने पकड़ लिया तो हाथी ने भगवान विष्णु को मदद ले लिए पुकारा, तो भगवान् ने स्वयं उस हाथी की रक्षा के लिए मगर का वध किया  ।   अकबर बोले - तो इस बात के लिए भगवान् को खुद आने की क्या जरूरत ? वो तो सब कुछ  बैठे बैठे ही कर सकते थे ।  किसी और को  हुक्म दे दिया होता ।   बीरबल  ने कहा - हुजुर! इसका जवाब आपको कुछ दिन के बाद दूंगा  ।  कुछ समय बाद दरबार के लोगों ने यमुना नदी में नौका विहार करने की योजना बनायी ।  अकबर उनके सेनापति अंगरक्षक और सभी दरबारी अलग अलग नावों में सवार होकर नदी में निकल पड़े ।   तभी एक छपाक की आवाज हुई और कोई चिल्लाया - शहजादे  सलीम नदी  में गिर गए !  अकबर ने तुरंत उस तरफ पानी में छलांग लगा दी और  डूबते हुए शहजादे को पकड़ कर  उठाया,  लेकिन ये क्या ?.व...

पूर्व के 24 महापाप के कारण

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पूर्व के 24 महापाप के कारण विद्यारण्य नाम के एक बहुत बड़े संन्यासी थे। उनका जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। गरीब होने के कारण उनके पास अपने माता-पिता के पोषण के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी।  वह ब्राह्मणत्व में स्थित थे और उन्होंने संतों का संग किया था। धन की व्यवस्था के लिए उन्होंने गायत्री का अनुष्ठान किया।  चौबीस लाख बार गायत्री मंत्र का जप करने से एक पुरश्चरण होता है। उन्होंने ऐसे तेईस पुरश्चरण किए, परंतु उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। .इस समय में उनके माता पिता का भी निधन हो गया। उनकी आयु भी अधिक हो गई और उन्होंने संन्यास ले लिया!  जैसे ही उन्होंने सन्यास लिया, माता गायत्री उनके सामने प्रकट होकर बोलीं, ‘तुम्हें जो भी माँगना हो माँग लो, मैं तुम्हें कुछ भी देने के लिए तत्पर हूँ।’  उन्होंने कहा, ‘अब तो मैं संन्यासी हूँ, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। उन्होंने पूछा आप पहले क्यों नहीं आईं?’  तब माता गायत्री ने कहा, ‘तुम्हारे पूर्व के चौबीस महापाप थे। तुम्हारे तेईस पाप पुरश्चरण से और अंतिम पाप संन्यास लेने से नष्ट हुआ और इसके बाद मैं तुरंत आ गई।’ इस कहानी से हमें यह पता चल...

अभागा राजा

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  अभागा राजा और भाग्यशाली दास एक बार एक गुरुदेव अपने शिष्य को अहंकार पर एक शिक्षाप्रद कहानी सुना रहे थे।  एक विशाल नदी जो कि सदाबहार थी, उसके दोनों तरफ दो सुन्दर नगर बसे हुये थे! नदी के उस पार महान और विशाल देव मन्दिर बना हुआ था! नदी के इधर एक राजा था। राजा को बहुत अहंकार था। कुछ भी करता तो अहंकार का प्रदर्शन करता। वहाँ एक दास भी था, बहुत ही विनम्र और सज्जन! एक बार राजा और दास दोनों नदी के पास गये। राजा ने उस पार बने देव मंदिर को देखने की ईच्छा व्यक्त की। दो नावें थीं। रात का समय था। एक नाव में राजा सवार हुआ और दुसरी में दास सवार हुआ। दोनों नावों के बीच मे बड़ी दूरी थी! राजा रात भर चप्पू चलाता रहा, पर नदी के उस पार न पहुँच पाया। सूर्योदय हो गया, तो राजा ने देखा कि दास नदी के उस पार से इधर आ रहा है! दास आया और देव मन्दिर का गुणगान करने लगा। तो राजा ने कहा - तुम रातभर मन्दिर मे थे! दास ने कहा - हाँ और राजाजी! क्या मनोहर देव प्रतिमा थी, पर आप क्यों नही आये! अरे मैंने तो रात भर चप्पू चलाया पर ..... गुरुदेव ने शिष्य से पूछा - वत्स! बताओ कि राजा रातभर चप्पू चलाता रहा, पर फिर भी उस पा...

विश्वास की शक्ति - हरिनाम

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  विश्वास की शक्ति - हरिनाम  एक गांव में एक नौजवान को सत्संग सुनने की बड़ी लगन थी . किसी से पता चला कि गांव के बाहर नदी के उस पार परम संत तुलसी दास जी ने डेरा लगाया हुआ है और आज उनका संध्या को  सत्संग का आयोजन है l वह नौका के द्वारा नदी पार करके  सत्संग में पहुंच गया ! प्रेमी था, बड़े प्यार से सत्संग सुना और बड़ा आनंद आया! जब जाने लगा तो थोड़ा अंधेरा हो गया ! देखा कि तूफान बहुत ज्यादा था और बारिश के कारण नदी बड़े तूफान पर चल रही थी ! अब जितनी नौका वाले मल्लाह थें सब डेरे में रुक गए कोई नौका से आने जाने का साधन नहीं है !  संत तुलसी दास जी के पास पहुंचा और बोला - महाराज! मेरी नई नई शादी हुई है, मेरी पत्नी भी इस गांव में अनजान है और घर में मेरे कोई नहीं है। मेरे पास गहना वगैरा बहुत है, नकदी भी है और हमारे गांव में चोर लुटेरे भी बहुत हैं तो किसी भी हालत में मुझे वहां जाना ही पड़ेगा, नहीं तो पता नहीं क्या हो जाएगा.  संत तुलसी दास जी ने एक कागज पर कलम से कुछ लिखा और बिना बताए उस कागज को मोड़कर और उसके हाथ में पकड़ा दिया और कहा - इसको खोलकर मत देखना कि इसमें क्या ...

भगवान के भक्त निर्धन क्यों?

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  भगवान के भक्त निर्धन क्यों?           भगवान कृष्ण के भक्त निर्धन जबकि अन्य देवी-देवताओं के धनवान, ऐसा क्यों? भगवान, जिनकी सेवा स्वयं लक्ष्मी जी करती हैं और जो स्वयं लक्ष्मी पति कहलाते हैं, फिर उनके भक्त निर्धन जबकि अन्य देवी-देवताओं के धनवान, यह कैसे हो सकता है? शास्त्रों के द्वारा हम जान सकते हैं कि शिवजी कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, जिनके पास स्वयं रहने के लिए कोई भवन नहीं, पर रावण ने अपनी भक्ति से प्रसन्न कर उनसे सोने की लंका मांग ली। दूसरी ओर भगवान स्वयं पांडवों  के साथ थे, पर पांडवों को 13 वर्ष वन में रहना पड़ा जबकि भगवान के पास ऐसे अन्य कितने लोक हैं, जो पांडवो को दे सकते थे। पर अंत समय में हम सभी जानते हैं कि रावण का क्या हुआ और पांडवों की भगवान ने किस प्रकार रक्षा की । इस प्रश्न को महाराज परीक्षित सुखदेव गोस्वामी से पूछते हैं  कि भगवान ऐसा क्यों करते हैं ? सुखदेव गोस्वामी बताते हैं कि भगवान स्वयं कहते है - यदि मैं किसी पर विशेष कृपा करता हूँ तो उसका लोभ, लालच, मोह आदि सब अवगुण  छीन लेता हूँ।      ...

भाग्य में लिखा मिट नहीं सकता

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 भाग्य में लिखा मिट नहीं सकता  चंदन नगर का राजा चंदन सिंह बहुत ही पराक्रमी एवं शक्तिशाली था । उसका राज्य भी धन-धान्य से पूर्ण था । राजा की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। एक बार चंदन नगर में एक ज्योतिषी पधारे। उनका नाम था भद्रशील। उनके बारे में विख्यात था कि वह बहुत ही पहुंचे हुए ज्यातिषी हैं और किसी के भी भविष्य के बारे में सही-सही बता सकते हैं। वह नगर के बाहर एक छोटी कुटिया में ठहरे थे। उनकी इच्छा हुई कि वह भी राजा के दर्शन करें। उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा व्यक्त की और राजा से मिलने की अनुमति उन्हें सहर्ष मिल गई।  राज दरबार में राजा ने उनका हार्दिक स्वागत किया। चलते समय राजा ने ज्योतिषी को कुछ हीरे-जवाहरात देकर विदा करना चाहा, परंतु ज्योतिषी ने यह कह कर मना कर दिया कि वह सिर्फ अपने भाग्य का खाते हैं। राजा की दी हुई दौलत से वह अमीर नहीं बन सकते।  राजा ने पूछा - ‘इससे क्या तात्पर्य है आपका गुरुदेव?’ ‘कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत और मेहनत से गरीब या अमीर होता है। यदि राजा भी किसी को अमीर बनाना चाहे तो नहीं बना सकता। राजा की दौलत भी उसके हाथ से निकल जाएगी।’  यह सुनक...

मैल और धूल

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मैल और धूल  एक सेठ नदी पर आत्महत्या करने जा रहा था। संयोग से एक लंगोटीधारी संत भी वहाँ थे। संत ने उसे रोक कर कारण पूछा, तो सेठ ने बताया कि उसे व्यापार में बड़ी हानि हो गई है।  संत ने मुस्कुराते हुए कहा- बस इतनी सी बात है? चलो मेरे साथ, मैं अपने तपोबल से लक्ष्मी जी को तुम्हारे सामने बुला दूंगा। फिर उनसे जो चाहे माँग लेना। सेठ उनके साथ चल पड़ा। कुटिया में पहुँच कर, संत ने लक्ष्मी जी को साक्षात् प्रकट कर दिया। वे इतनी सुंदर, इतनी अधिक सुंदर थीं कि सेठ अवाक् रह गया और धन माँगना भूल गया। देखते देखते सेठ की दृष्टि उनके चरणों पर पड़ी। उनके चरण मैल से सने थे।  सेठ ने हैरानी से पूछा- माँ! आपके चरणों में यह मैल कैसी?  माँ- पुत्र! जो लोग भगवान को नहीं चाहते, मुझे ही चाहते हैं, वे पापी मेरे चरणों में अपना पाप से भरा माथा रगड़ते हैं। उनके माथे की मैल मेरे चरणों पर चढ़ जाती है। ऐसा कहकर लक्ष्मी जी अंतर्ध्यान हो गईं।  अब सेठ धन न माँगने की अपनी भूल पर पछताया, और संत चरणों में गिर कर, एकबार फिर उन्हें बुलाने का आग्रह करने लगा। संत ने लक्ष्मी जी को पुनः बुला दिया। इस बार लक्ष्मी जी क...

तेरी बंसी की धुन सुन कर

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तेरी बंसी की धुन  सुन कर   धुन - मुझे तेरी मुहब्बत  का ..... तेरी बंसी की धुन  सुन कर, मैं बरसाने से आई हूँ। मेरे रसिया, ओ मनबसिया, मैं मुरली साथ लाई हूँ। (1)  सुना है मेरे मनमोहन, तुम माखन भी चुराते हो। मेरे रसिया, ओ मनबसिया, मैं माखन साथ लाई हूँ। तेरी.... (2)   सुना है मेरे मनमोहन, तुम गैया भी चराते हो। मेरे रसिया, ओ मनबसिया, मैं ग्वाले साथ लाई हूँ। तेरी.... (3) सुना है मेरे मनमोहन, तुम रास भी रचाते हो। मेरे रसिया, ओ मनबसिया, मैं सखियां साथ लाई हूँ। तेरी.... (4)   सुना है मेरे मनमोहन, तुम गीता भी सुनाते हो। मेरे रसिया, ओ मनबसिया, मैं अर्जुन बन के आई हूँ। तेरी.... (5)   सुना है मेरे मनमोहन, तुम अपना भी बनाते हो। मेरे रसिया, ओ मनबसिया, मैं तेरी बनने आई हूँ। तेरी.... (6)   सुना है मेरे मनमोहन, तुम सत्संग भी सुनाते हो। मेरे रसिया, ओ मनबसिया, मैं संगत साथ लाई हूँ। तेरी.... द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचार...

गुलाब का घमंड

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  गुलाब का घमंड     (एक शिक्षाप्रद कहानी)  वसंत ऋतु थी। जंगल के बीचों-बीच एक गुलाब का पौधा खिला हुआ था। उसके फूल बेहद सुंदर थे और वह अपनी सुंदरता पर इतराता रहता था। पास ही कुछ लंबे-चैड़े चीड़ के पेड़ खड़े थे। वे आपस में बातचीत कर रहे थे। एक चीड़ ने गुलाब की ओर देखकर कहा, “गुलाब के फूल कितने सुंदर होते हैं। काश! मैं भी इतना सुंदर होता।” दूसरे चीड़ ने उसे समझाया, “मित्र, हर किसी के पास सब कुछ नहीं हो सकता। तुम्हारे पास मजबूती है, ऊँचाई है, छाया है और वह भी कम सुंदर नहीं है।” गुलाब ने यह बात सुन ली और अपने सौंदर्य पर और अधिक घमंड कर बैठा। उसने गर्व से कहा, “इस जंगल में सबसे सुंदर मैं ही हूँ!” तभी पास ही खिला सूरजमुखी का फूल बोला, “गुलाब, ऐसा कैसे कह सकते हो? इस जंगल में बहुत सारे सुंदर फूल हैं और तुम बस उनमें से एक हो।” गुलाब हँस पड़ा, “लेकिन सब मेरी ही तारीफ करते हैं और देखो उस नागफनी को - कितना कुरूप है! उस पर तो कांटे ही कांटे हैं। कोई उसे देखना भी नहीं चाहता।” चीड़ के पेड़ ने टोका, “गुलाब, तुम खुद भी कांटों से भरे हो, फिर भी तुम सुंदर हो। हो सकता है, नागफनी में भी कोई अच्छाई...

प्रायश्चित

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  प्रायश्चित एक कस्बे में एक गरीब महिला जिसे आँखों से कम दिखता था, भिक्षा माँगकर किसी तरह अपना जीवन यापन कर रही थी। एक दिन वह बीमार हो गई, किसी दयावान व्यक्ति ने उसे इलाज के लिये 500रु का नोट देकर कहा कि माई! इससे दवा खरीद कर खा लेना। वह भी उसे आशीर्वाद देती हई अपने घर की ओर बढ़ गई। अंधेरा घिरने लगा था, रास्ते में एक सुनसान स्थान पर दो लड़के शराब पीकर ऊधम मचा रहे थे।  वहाँ पहुँचने पर उन लड़कों ने भिक्षापात्र में 500रु का नोट देखकर शरारतवश वह पैसा अपने जेब में डाल लिया, महिला को आभास तो हो गया था, पर वह कुछ बोली नहीं और चुपचाप अपने घर की ओर चली गई। सुबह दोनों शरारती लड़कों का नशा उतर जाने पर वे अपनी इस हरकत के लिये शर्मिंदा महसूस कर रहे थे।  वे शाम को उस भिखारिन को रुपये वापस करने के लिये इंतजार कर रहे थे। जब वह नियत समय पर नहीं आयी, तो वे पता पूछकर उसके घर पहुँचे, जहाँ उन्हें पता चला कि रात्रि में उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गयी और दवा न खरीद पाने के कारण वृद्धा की मृत्यु हो गई थी। यह सुनकर वे स्तब्ध रह गये कि उनकी एक शरारत ने किसी की जान ले ली थी।  इससे उनके मन में स्वयं के प...