कर्मों की सजा
कर्मों की सजा एक भिखारी प्रतिदिन एक ही दरवाज़े पर जाकर भीख माँगता था। जैसे ही वह आवाज़ लगाता, घर का मालिक बाहर आता और उसे भला-बुरा कहने लगता—“मर क्यों नहीं जाते? काम क्यों नहीं करते? जीवन भर भीख ही माँगते रहोगे!” कभी-कभी क्रोध में आकर उसे धक्का भी दे देता। किन्तु भिखारी के होंठों पर केवल एक ही वाक्य रहता— “ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें।” एक दिन सेठ अत्यंत क्रोधित था। व्यापार में भारी हानि हुई थी। उसी समय भिखारी भीख माँगने आ पहुँचा। सेठ ने बिना कुछ सोचे एक पत्थर उठाकर उसके सिर पर दे मारा। रक्त बहने लगा, पर भिखारी ने शांत स्वर में फिर वही कहा—“ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें।” यह सुनकर सेठ का क्रोध कुछ शांत हुआ, पर मन में जिज्ञासा जागी—इतना अपमान सहकर भी यह व्यक्ति बद्दुआ क्यों नहीं देता? वह चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दिन भर सेठ ने देखा—कोई उसे तिरस्कार से देखता, कोई गालियाँ देता, कोई दुत्कारता; पर वह हर बार यही कहता—“ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें।” संध्या ढलने पर भिखारी अपनी झोंपड़ी में पहुँचा। वहाँ एक जर्जर खाट पर उसकी वृद्ध पत्नी लेटी थी। उसने कटोरे में झाँका—उसमें आध...