Posts

इनाम

Image
इनाम सात वर्षीय बेटी दूसरी कक्षा में प्रवेश पा गयी.....  वह क्लास में  हमेशा से अव्वल आती रही है। पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाजार ले गया.... बेटी ने जूते लेने से यह कह कर मना कर दिया कि पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरूरत है। वे अभी इस साल काम दे सकते हैं.....  अपने जूतों की बजाए उसने मुझे अपने दादा की कमज़ोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा...  मैंने सोचा कि बेटी अपने दादा से शायद बहुत प्यार करती है, इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी समझ रही है.... खैर! मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा..... दुकानदार ने बेटी के साइज की सफेद शर्ट निकाली... डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी। फिर भी बेटी ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा.... मैंने बेटी से कहा....आराध्या बेटा.... ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है, तो फिर और लम्बी क्यों? .... बेटी ने कहा .... पापा जी मुझे शर्ट स्कर्ट के अंदर ही डालनी होती है, इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा.....लेकिन यही शर्ट म...

सर्वस्व न्योछावर

Image
  सर्वस्व  न्योछावर    एक थे ग्वारिया बाबा। वृन्दावन में ही रहते थे। बिहारी जी को अपना यार कहते थे। सिर्फ कहते ही नहीं, मानते भी थे। नियम था कि वे बिहारी जी को नित्य सायं शयन करवाने जाते थे।  एक बार शयन आरती करवाने जा रहे थे। बिहारी जी की गली में बढ़िया मोदक बन रहे थे। अच्छी खुशबू आ रही थी। चार मोदक मांग लिए बिहारी जी के लिए ! वृन्दावन के लोग बिहारी जी के भक्तों का बड़ा आदर करते हैं । उन्होंने मना नहीं किया। एक दोने में बांध दिये। बाबा भीतर गए तो बिहारी जी के भोग के पट बंद हो  चुके थे।  ग्वारिया बाबा जी ने वहीं अपना कम्बल बिछाया और उस पर बैठकर अपने मन के भाव में खो गए। वहाँ बिहारी जी की आरती का समय हुआ तो श्री गौसाई जी बड़ा प्रयास कर रहे हैं लेकिन ठाकुर जी के मंदिर का पट नहीं खुल रहा। बड़े हैरान इधर-उधर देख रहे। एक संत कोने में बैठे सब दृश्य आरंभ से देख रहे थे। पुजारी जी ने लाचारी से देखा तो संत बोले, ‘उधर ग्वारिया बाबा बैठे हैं उनसे पूछो वो बता देंगे। गौसाईं जी ने बाबा से कहा - रे बाबा! तेरे यार तो दरवाजा ही नहीं खोल रहियो?’ बाबा हड़बड़ा कर उठे। रोम रोम पुल...

चोरी का दंड

Image
  चोरी का दंड एक समय कांचीपुर नामक गांव में वज्र नाम का एक चोर रहता था। चोर नाम के भांति ही वज्र ह्रदय का था। उसे जिसका जो धन या सामान मिलता, वही चुरा लेता। उसे तनिक भी दया नहीं आती थी कि उस सामान के स्वामी को कितना कष्ट होगा ! वह चुराए हुए धन को सिपाहियों के भय से जंगल में जमीन के अंदर छुपा देता था ! एक रात वीरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली और चोर के जाने के पश्चात जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया और गड्ढे को पहले की भांति ढक दिया। लकड़हारा इतनी चालाकी से सामान निकलता कि चोर को इस चोरी का पता ही नहीं चल पता था। एक दिन लकड़हारा अपनी पत्नी को धन देते हुए बोला  कि तुम रोज धन माँगा करती थी, लो! आज पर्याप्त धन इक्कठा हो गया है। उसकी पत्नी ने कहा - जो धन अपने परिश्रम से उपार्जित न किया गया हो, वह स्थाई नहीं होता है। इसलिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिये। वीरदत्त को भी ये बात जच गयी ! इसलिए उसने इस धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया, जिसका पानी कभी भी नहीं सूखता था, लेकिन इसमें सीढ़ियाँ लगनी रह गयी थी और सारे पैसे समाप्त हो गये थे। तो वह फिर से छिप...

यम और नचिकेता

Image
 यम और नचिकेता की कथा:  आत्मज्ञान और समर्पण की अनमोल यात्रा यह कहानी  कठोपनिषद से है, जिसमें ऋषि वाजश्रवा, जो परम ज्ञानी थे, ने  विश्वजीत यज्ञ किया। इस यज्ञ के द्वारा उन्हें जीवन में किसी भी प्रकार के दुःख या विषाद से मुक्ति मिलनी थी, और वे हमेशा आनंदित रहना चाहते थे।  ऋषि वाजश्रवा ने यज्ञ के दौरान अपना सम्पूर्ण धन दान देने का संकल्प लिया था। उनके पास याचकों की लंबी कतार लगी थी, और वह लगातार अपनी संपत्ति दान करते जा रहे थे। पहले तो अच्छी चीज़ें जा रही थीं, लेकिन धीरे-धीरे केवल बूढ़ी गायें बच गईं।  इस समय बालक नचिकेता, जो केवल 6 या 7 साल का था, यह सब देख रहा था। उसने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, ये बूढ़ी गायें तो किसी काम की नहीं हैं, तो आप इन्हें क्यों दान कर रहे हैं?"  ऋषि वाजश्रवा ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने संकल्प लिया है कि मैं सम्पूर्ण धन दान करूंगा, इसलिए मैं इन्हें अपने पास नहीं रख सकता।" हालांकि, ऋषि ने यह नहीं सोचा कि दान हमेशा उपयोगी वस्तुओं का किया जाता है, जो दूसरों के काम आए। अनुपयोगी वस्तु दान करने से तो किसी पर बोझ ही पड़ता है। नचिके...

सच्चा सहयोग

Image
          सच्चा सहयोग  शिवानी, 29 वर्ष की, पेशे से टीचर और दिल से बेहद संवेदनशील महिला। शादी को तीन साल हुए थे। पति राहुल एक कंपनी में सीनियर इंजीनियर थे और अक्सर बाहर प्रोजेक्ट पर रहते थे। शिवानी सातवें महीने की गर्भवती थी, जब डॉक्टर ने कहा — “अब आपको आराम की ज़रूरत है, बेहतर होगा आप मायके चली जाएं। माँ-बाप पंजाब में रहते थे। राहुल उस वक्त चेन्नई में थे। राहुल ने फौरन अपने छोटे भाई आरव से कहा कि वो शिवानी को स्टेशन छोड़ दे। शिवानी भारी बैग और सूजन भरे पाँवों के साथ रेलवे स्टेशन पर पहुँची — लेकिन ट्रेन दो घंटे लेट थी। आरव ने कहा,"भाभी, मैं ज़रा ऑफिस का ज़रूरी मेल कर आता हूँ… लौटता हूँ तब तक आप बैठिए।" वो गया… और फिर लौटकर नहीं आया। शिवानी स्टेशन की बेंच पर बैठी थी। प्यास लगी थी, पीठ दर्द कर रही थी और हर बीतता मिनट उसे असहाय बना रहा था। तभी उसकी नजर एक दुबले-पतले, बूढ़े कुली पर पड़ी। उसकी उम्र 65 से ऊपर रही होगी। सिर पर सफेद टोपी, एक फटी कमीज़, और आँखों में भूख और इज़्ज़त दोनों की झलक। शिवानी ने इशारा किया — “बाबा, सामान रखवाना है ट्रेन में। प्लेटफॉर्म नंबर ...

खत्म कर दिए हैं मैंने

Image
  खत्म कर दिए हैं मैंने वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से खत्म कर दिए हैं मैंने गिले-शिकवे सफाईयों के सिलसिले, तुम भी थक गए होंगे हमें बुरा समझते समझते. जो तुमने समझा वो हम थे ही नहीं, जो हम थे वो तुमने समझा ही नहीं. जायज है गिला तुम्हारा, क्या किया है हमारे लिए, जो कुछ भी तुम्हारे पास है, हमने तो कुछ दिया ही नहीं जो हम से बन पड़ा, तुम से तो कुछ लिया ही नहीं. जो भी किया हमने, वो हमारा फर्ज था, अहसान नहीं किसी पर, हम पे तुम्हारा कर्ज था. अब मेरी तुम्हारी कोई अनबन या उलझन नहीं, मैं इतना आगे निकल और थक चुका हूँ सुधार रहा हूँ, तुम्हारे साथ चल नहीं सकता अब मेरा वो मन नहीं. माफ तो वो तुम्हें कर गई, तुम्हारी सेवा पर कुर्बान थी, मगर मैं विश्वास कर नहीं सकता, तुम्हारी कोई जुबान नहीं. तुम सब खुश रहो आबाद रहो मेरे प्यारों, मुझे अब किसी से भी कुछ भी चाहिए ही नहीं और दरकार भी नहीं. (वेद गावड़ी) द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने ...

One Rupee इडली ट्रस्ट

Image
  वन रूपी(One Rupee) इडली ट्रस्ट सुबह के 3 बजे थे. _Chennai Central railway station._ प्लेटफॉर्म पर चारों तरफ लोग सोए हुए थे. बीच में एक बुजुर्ग बैठे थे—उम्र 78 साल. सफेद धोती और शर्ट. हाथ में बाँस की टोकरी. टोकरी में गरमागरम इडली भरी हुई.   "इडली... गरम इडली... एक रुपया... सिर्फ एक रुपया..."   कोई ले नहीं रहा था. साल 2026. एक रुपये में टॉफी भी नहीं मिलती—और इडली? लोग उन्हें पागल समझकर हँस रहे थे. मेरा नाम अरविंद है. मैं Infosys जैसी एक IT कंपनी में काम करता हूँ. रात की शिफ्ट खत्म करके घर जा रहा था. AC गाड़ी, अच्छी नौकरी... पर भूख लगी थी. स्टेशन के स्टॉल पर इडली ₹50 की मिल रही थी. उन दादाजी पर नज़र गई. टोकरी में करीब 100 इडलियाँ. एक भी ग्राहक नहीं. उनकी आँखों में पानी था. मैं नीचे उतरा. "दादाजी, एक रुपये में इडली? घाटा नहीं होता क्या?"   वे हँसे.  "बेटा, ये घाटा नहीं. ये मुनाफा है."   "कैसे दादाजी? चावल, गैस, सबके दाम बढ़े हैं. एक इडली कम से कम ₹5 की पड़ती है. आप ₹1 में बेचते हो?"   वे टोकरी बंद करके बोले,   "एक कहानी...

अहंकार से बचें

Image
अहंकार से बचें  जो लोग घमंड करते हैं उनका सारा ज्ञान व्यर्थ है, इस बुराई की वजह से सब कुछ खत्म हो सकता है। रामकृष्ण परमहंस से जुड़ी एक प्रेरक कथा प्रचलित है।  एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी संत के साथ बैठे हुए थे। ठंड के दिन थे। शाम हो गई थी। तब संत ने ठंड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां  इकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों संत धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे। इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे भी ठंड लगी तो उसने भी कुछ लकड़ियां इकट्ठा कर लीं। अब लकड़ी जलाने के लिए उसे आग की जरूरत थी। वह तुरंत ही दोनों संतों के पास पहुंचा और धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया। एक व्यक्ति ने संत द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया तो संत गुस्सा हो गए। वे उसे मारने लगे। संत ने कहा कि तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई? तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया।  रामकृष्ण परमहंस ये सब देखकर मुस्कुराने लगे। जब संत ने परमहंसजी को प्रसन्न देखा तो उन्हें और गुस्सा आ गया। उन्होंने परमहंसजी से कहा, ‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं? ये व्यक्ति अपवित्र ह...

भोगे बिना छुटकारा नहीं

Image
  भोगे बिना छुटकारा नहीं शंख और लिखित दो सगे भाई थे। दोनों ने साथ में  गुरु और माता पिता के द्वारा शिक्षा पाई थी। पूजनीय आचार्यों से प्रोत्साहन पाया था, मित्रों द्वारा सलाह पाई थी। उन्होंने कई वर्षों के अध्ययन, चिंतन, अन्वेषण, मनन के पश्चात् जाना था कि दुनिया में सबसे बड़ा काम, जो मनुष्य के करने का है, वह यह है कि अपनी आत्मा का उद्धार करे।  वे दोनों भाई शंख और लिखित इस तत्व को भली प्रकार जान लेने के बाद तपस्या करने लगे। पास-पास ही दोनों के कुटीर थे। मधुर फलों के वृक्षों से वह स्थान और भी सुंदर और सुविधा जनक बन गया था। दोनों भाई अपनी अपनी तपो भूमि में तप करते और यथा अवसर आपस में मिलते जुलते।  एक दिन लिखित भूखे थे। भाई के आश्रम में गए और वहां से कुछ फल तोड़ लाए। उन्हें खा ही रहे थे कि शंख वहां आ पहुंचे। उन्होंने पूछा - यह फल तुम कहां से लाए? लिखित ने उन्हें हंसकर उत्तर दिया - तुम्हारे कुटीर से। शंख यह सुनकर बड़े दुःखी हुए। फल कोई बहुत मूल्यवान वस्तु नहीं थी। दोनों भाई आपस में फल लेते देते भी रहते थे, किंतु चोरी से या बिना पूछे नहीं। शंख ने कहा - भाई! यह तुमने बु...

मुक्ति

Image
 मुक्ति   एक दिन एक राजा ने राज पंडित को बुलाया और उसे बहुत सख्ती से आदेश दिया कि राजा परीक्षित ने सुखदेव से श्री मद्भागवत सुन कर मोक्ष प्राप्त किया था। उन्हें केवल सात दिन लगे। मैं आपको सभी बंधनों से मुझे मुक्त कराने के लिए एक महीने का समय दे रहा हूँ ताकि मैं मोक्ष प्राप्त कर सकूँ।  यदि आप ऐसा नहीं कर पाए तो, मैं आपकी सारी संपत्ति जब्त कर लूँगा, और आप को मृत्यु दण्ड दूँगा। इस आदेश ने राज पंडित को अत्यधिक चिंतित कर दिया और वह इस चिंता में अब न तो खा सकता था और न ही सो सकता था। उसका तनाव दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा था।  एक दिन संयोग से जब वह अपने परिवार के साथ भोजन कर रहा था, तो उसका बेटा, जो आमतौर पर अपना भोजन अलग से करता था और जो अपने पिता से यदा कदा ही मिलता था, एक दिन उस बेटे ने गौर किया कि उसके पिता बहुत उदास दिख रहे थे। उसने अपने पिता से उदासी का कारण पूछा। राज पंडित उत्तर देने के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि उन्होंने अपने बेटे से कुछ उम्मीद नहीं थी। हालांकि उसकी माँ ने उसे परेशानी का पूरा कारण बता दिया। पुत्र बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ और उसने शांति से अपने पिता ...

जागृति

Image
जागृति   *संत ने चोर को कहा कि तू चोरी कर लेकिन...फिर... क्या हुआ...?* नागार्जुन से एक चोर ने कहा था कि तुम ही एक आदमी हो जो शायद मुझे बचा सको। यूं तो मैं बहुत महात्‍माओं के पास गया, लेकिन मैं जाहिर चोर हूं, मैं बड़ा प्रसिद्ध चोर हूं, और मेरी प्रसिद्धि यह है कि मैं आज तक पकड़ा नहीं गया हूं, मेरी प्रसिद्धि इतनी हो गई है कि जिनके घर चोरी भी नहीं कि वह भी लोगों से कहते है कि उसने हमारे घर चोरी की। क्‍योंकि मैं उसी के घर चोरी करता हूं जो सच में ही धनवान है। हर किसी ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे के घर चोरी नहीं करता। सम्राटों पर ही मेरी नजर होती है और कोई मुझे पकड़ नहीं पाया है। लेकिन तुमसे मैं पूछता हूं और महात्‍माओं से पूछता हूं तो वे कहते हैं: पहले चोरी छोड़ो। और उस चोर ने कहा, आप समझ सकते हैं कि यह तो मैं नहीं छोड़ सकता। यह छोड़ सकता तो इन महात्‍माओं के पास ही क्‍यों जाता? खुद ही छोड़ देता। कोई ऐसा तरकीब बता सकते हो कि मुझे चोरी छोड़ना न पड़े और छूट जाए। क्‍योंकि छोड़ना पड़े तो मुझसे न छूट सकेगा। यह मैं कर-कर के देख चुका हूं। बहुत नियम संयम बहुत दफे कसमें खा लीं। सब कसमें टूट गई और हर बा...

सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र

Image
 सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र   राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे, जो सत्यव्रत के पुत्र थे। इन्हीं के कुल में भगवान श्री राम का जन्म हुआ और रघुकुल की रीत चली - प्राण जाए पर वचन न जाए......।  एक समय की बात है कि इनके कुलगुरु वशिष्ठ जी, विश्वामित्र जी एवं सभी सेवी देवताओं की एक सभा हुई। सभा में सभी देवता ऋषि मुनि इत्यादि चर्चा कर रहे थे कि पृथ्वी पर सबसे सत्यनिष्ठ व दानवीर राजा कौन है? तभी गुरु वशिष्ठ ने राजा हरिश्चंद्र का नाम लिया और बताया कि पूरी पृथ्वी पर इस समय उनसे बड़ा सत्यनिष्ठ धर्मात्मा दानवीर राजा कोई नहीं है। उनके सत्य के तेज (प्रकाश) के आगे सूर्य का प्रकाश भी फीका लगता है। कई बार उनके सत्य की परीक्षा ली गयी, किन्तु कोई भी उनके सत्य को डिगा नहीं पाया। वह अपने सत्य सिद्धांत धर्म पर अडिग रहे।  विश्वामित्र जी ने कहा कि आचार्य! मेरी नजर में पृथ्वी पर सबसे बड़ा दानवीर होना अब संभव नहीं है और ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी के सत्य धर्म को डिगाया ही न जा सके। मूक भाषा में सभी देवताओं ने भी हामी भरी, किन्तु आचार्य वशिष्ठ ने कहा - यही सत्य है। अगर कोई भी चा...

जीवन का सत्य

Image
जीवन का सत्य    प्रातःकाल शांत वातावरण था। सूर्य की हल्की किरणें बोधिवृक्ष की पत्तियों से छनकर नीचे बैठी भिक्षु सभा पर पड़ रही थीं। भगवान बुद्ध के शिष्य ध्यान मग्न होकर उनके प्रवचन की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही बुद्ध सभा में पहुँचे, शिष्यों की आँखें आश्चर्य से फैल गईं। आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे एक साधारण सी रस्सी। बिना कुछ बोले बुद्ध अपने आसन पर बैठे और पूरी शांति के साथ उस रस्सी में एक के बाद एक तीन गाँठें लगाने लगे।  सभा में सन्नाटा छा गया। हर मन में एक ही प्रश्न था आज यह मौन क्यों, यह रस्सी क्यों? कुछ क्षणों बाद बुद्ध ने शांत स्वर में पूछा, मैंने इस रस्सी में तीन गाँठें लगा दी हैं। बताओ, क्या यह वही रस्सी है जो पहले थी? शिष्य सोच में पड़ गए।  थोड़ी देर बाद एक शिष्य ने विनम्रता से कहा - भगवन्! यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। बाहर से देखें तो रस्सी बदली हुई लगती है क्योंकि इसमें गाँठें लग गई हैं। लेकिन भीतर से, अपने मूल स्वरूप में, यह वही रस्सी है। बुद्ध मुस्कराए - सत्य कहा तुमने फिर उन्होंने रस्सी के दोनों सिरों को पकड़कर जोर से खींचना शुरू कर दि...