पिता का पुण्य
पिता का पुण्य अमित ने जल्दी से बाईक स्टैंड पर लगाई और बारिश से बचते हुए एक टी-स्टाल पर छप्पर के नीचे खड़ा हो गयाथा। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। कई लोग खड़े थे। अमित ने चाय वाले को कहा – ‘‘भैया! एक चाय बना देना।’’ चाय वाले ने उसकी ओर देखा और चाय बनाने लगा। चाय वाले से चाय लेकर अमित चाय की चुस्की लेने लगा। तभी उसे याद आया - एक दिन वह ऐसे ही अपने पिता के साथ स्कूटी पर जाता था। उसके पिता इसी जगह रुक कर चाय पीते थे, और हां! इसी चाय वाले से हंस हंस कर बात किया करत थे। पता नहीं क्या नाम था इसका, चलो, इससे बात करता हूं। अमित चाय वाले के पास पहुंचा – ‘‘भैया! तुम कितने साल से चाय बेच रहे हो।’’ ‘‘क्या हुआ साहब? चाय सही नहीं बनी क्या?मैं दूसरी बना देता हूं।’’ अमित ने हंसते हुए कहा – ‘‘अरे! वो बात नहीं है। चाय बढ़िया थी। तुम्हारी चाय पीते ही मुझे याद आया, जब मैं छोटा था, तब मेरे पापा यहीं आकर चाय पीते थे, वे तुमसे हंस हंस कर बातें किया करते थे।’’ चाय वाला सोच में पड़ गया – ‘‘क्या नाम बताया आपने अपने पापा का?’’ ‘‘जी, रामलखन।’’ ‘‘अरे वो तो हमारे पुराने मित्र थे। तुम जिला लखन पुर के हो न! हम भी...