राजा मोरध्वज
राजा मोरध्वज हमारे देश में एक से एक महादानी हुए हैं किन्तु आज हम जिस व्यक्ति की बात करने वाले हैं उसने दानवीरता की सारी सीमाओं को पार कर लिया। ये कथा है महाराज मोरध्वज की। कथा महाभारत की है किन्तु मूल महाभारत का भाग नहीं है। भारतीय दंत कथाओं में इसकी बड़ी प्रसिद्धि है। विशेषकर छत्तीसगढ़ में इसे बड़े चाव से सुना और सुनाया जाता है। कथा महाभारत युद्ध के बाद की है। युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ किया। सहस्त्रों ब्राह्मणों को इतना दान दिया गया, जिसकी कोई उपमा नहीं थी। इसी कारण अर्जुन के मन में अभिमान आ गया। एक दिन उसने बात ही बात में श्रीकृष्ण से कहा कि हे माधव! मैं भी कितना भाग्यशाली हूँ जो मुझे आपका सबसे बड़ा भक्त बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बल में भी मेरी समता कोई और नहीं कर सकता और मेरे भ्राता युधिष्ठिर सा दानवीर भी कोई और नहीं है। श्रीकृष्ण समझ गए कि उसके सखा को अभिमान ने छू लिया है और उसका उद्धार करना आवश्यक है। उस समय उन्होंने कुछ नहीं कहा और थोड़े दिन के बाद अर्जुन अश्वमेघ यज्ञ के दिग्विजय के लिए निकल गया। कई दिनों तक चलने के बाद वो घोडा रतनपुर राज्य की सीमा मे...