भोगे बिना छुटकारा नहीं
भोगे बिना छुटकारा नहीं शंख और लिखित दो सगे भाई थे। दोनों ने साथ में गुरु और माता पिता के द्वारा शिक्षा पाई थी। पूजनीय आचार्यों से प्रोत्साहन पाया था, मित्रों द्वारा सलाह पाई थी। उन्होंने कई वर्षों के अध्ययन, चिंतन, अन्वेषण, मनन के पश्चात् जाना था कि दुनिया में सबसे बड़ा काम, जो मनुष्य के करने का है, वह यह है कि अपनी आत्मा का उद्धार करे। वे दोनों भाई शंख और लिखित इस तत्व को भली प्रकार जान लेने के बाद तपस्या करने लगे। पास-पास ही दोनों के कुटीर थे। मधुर फलों के वृक्षों से वह स्थान और भी सुंदर और सुविधा जनक बन गया था। दोनों भाई अपनी अपनी तपो भूमि में तप करते और यथा अवसर आपस में मिलते जुलते। एक दिन लिखित भूखे थे। भाई के आश्रम में गए और वहां से कुछ फल तोड़ लाए। उन्हें खा ही रहे थे कि शंख वहां आ पहुंचे। उन्होंने पूछा - यह फल तुम कहां से लाए? लिखित ने उन्हें हंसकर उत्तर दिया - तुम्हारे कुटीर से। शंख यह सुनकर बड़े दुःखी हुए। फल कोई बहुत मूल्यवान वस्तु नहीं थी। दोनों भाई आपस में फल लेते देते भी रहते थे, किंतु चोरी से या बिना पूछे नहीं। शंख ने कहा - भाई! यह तुमने बु...