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External circumstances & stress.

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  बाह्य परिस्थितियां अपने आप में तनाव उत्पन्न नहीं कर सकती। External circumstances, on their own, can't create stress. कुछ लोगों की यह ग़लत धारणा है कि कुछ बाह्य कारण या कोई अन्य व्यक्ति उनके तनाव का ज़िम्मेदार है और जब तक ये बाह्य परिस्थितियां नहीं बदलती, वे ख़ुश नहीं रह सकते। लेकिन ये तनाव के कारणों के नियम के बारे में ग़लत धारणा है। प्रायः तुम्हारे चारों ओर के लोगों और परिस्थितियों को तुम नहीं बदल सकते, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम जीवन भर तनावग्रस्त रहोगे। जैसा पहले बताया गया है, यह बाह्य परिस्थितियां नहीं, बल्कि उनके प्रति तुम्हारी प्रतिक्रिया है जो तनाव का कारण है। तुम अपनी प्रतिक्रियाओं को इस प्रकार नियंत्रित कर सकते हो, जैसे जो कुछ बाहरी दुनिया में घटित हो रहा है, वह तुम्हें भावनात्मक रूप से कभी प्रभावित नहीं कर सकता, चाहे कुछ भी हो जाए। यह नियंत्रण तुम्हारे मन को बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त करने के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करेगा। इस परिस्थिति में मन एक स्वामी की तरह और बाह्य परिस्थितियां एक दास की तरह व्यवहार करेंगी, ताकि मन बाह्य परिस्थितियों पर नियंत्रण कर सके...

प्यारी बिटिया

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  प्यारी बिटिया सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Presented by Bindu Jain, Delhi एक नन्हीं सी कली, मेरे आँगन में खिली;  उठाया जो मैंने गोद में, वह मुस्काई मन-मोद में; प्यार से जो मैंने सहलाया, चेहरा था उसका दमकाया;  दुलार के जल से सींचा मैंने,  वह बढ़ती गई और खिलती गई; बेटी बनकर मेरे घर में आई, मेरे मन की बगिया महकाई;  न चाहे उसने खेल, न उसका सजने को मन करता है; ”मम्मी मेरा तो केवल, कुछ लिखने को मन करता है“;  नानी ने की भविष्यवाणी, लेखिका बनेगी यह तो इक दिन; जग में नाम कमाएगी, और सबकी शान बढ़ाएगी;  जीवन उसका संगीत बन गया, और संगीत बना जीवन; अपनी मंजिल पाने को वह, तत्पर रहती थी हर पल; कली खिली और फूल बन गई, सारा चमन महका गई;  इक दिन माँ का छोड़ के आँगन, पिया के घर की शोभा बनी; अब मैं....अब मैं घर में रह गई अकेली, जैसे बिछड़ गई हो कोई सहेली; वो हँसती थी बतियाती थी, सब की उलझन सुलझाती थी;  सब के कामों में हाथ बँटा, वह पढ़ती और पढ़ाती थी;  वह हँसी गूँजती कानों में, पर आँखें देख न पाती हैं;  उस की बातों को याद ...

Don’t always misunderstand others.

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 दूसरों को हमेशा ग़लत मत समझो।  Don’t always misunderstand others. कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हमेशा दूसरों को ग़लत समझते हैं। वे हमेशा यह महसूस करते हैं कि अन्य व्यक्तियों के कार्यों का उद्देश्य केवल उन्हें हानि पहुँचाना और उनका अपमान करना ही है। उनके काम के लिए कोई छोटी-सी सलाह देना या टिप्पणी करना, उन्हें व्यक्तिगत अपमान और आलोचना दिखाई देता है। प्रत्येक बातचीत बहस के लिए चुनौती प्रतीत होती है। वास्तव में प्रत्येक अनजान या नई वस्तु को ख़तरे की आशंका से समझना हमारी असामान्य प्रकृति की मौलिक भावनाओं में से एक है। महर्षि पतंजलि ने अपने ‘योग शास्त्र’ में भी कहा है ‘मन का स्वभाव है- संदेह करना।’ लेकिन ठीक ध्यान व उचित ज्ञान के द्वारा इस स्वाभाविक कमज़ोरी पर विजय प्राप्त की जा सकती है और इसे दूर किया जा सकता है। यदि हम इस पर गहराई से चिन्तन करें तो हमें पता चलेगा कि यह सबको ग़लत समझने की भावना दूसरों से अलग हो जाने की भावना के कारण पनपती है। हम महसूस करते हैं कि हम बाकी दुनिया से अलग हैं और इसलिए सारी दुनिया दुश्मन की तरह लगती है और हमें अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए सुनिश्चित होने के ल...

Let power come to you

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  काम को पूरा करने की शक्ति को अपने आप तुम्हारे पास आने दो।   Let power come to you on its own. बहुत से लोग, यद्यपि उनमें पर्याप्त शक्ति होती है, फिर भी अपने जीवन में उचित रूप से कोई कार्य आरम्भ नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें शिकायत रहती है कि उन्हें ऐसे कामों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक शक्ति, अवसर, संसाधन और सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं। इस संबंध में कृपया याद रखें कि महानता प्राप्त करने के लिए, कोई भी यह कहता हुआ अपने हाथ जोड़ कर तुम्हारे पास नहीं आएगा कि श्रीमान् जी, महान बनने के लिए जिन चीज़ों की तुम्हें आवश्यकता है, वे ये रहीं। इसलिए कृपया इन्हें स्वीकार करो। वास्तव में विधि इससे विपरीत है। जैसे ही तुम अपनी महानता दिखाते हो या सिद्ध करते हो, एक जादुई दैविक विधि से सभी आवष्यक वस्तुएं अपने आप ही तुम्हारी ओर आने लगती हैं और तुम अपने ज्ञान के बल पर अपना लक्ष्य सिद्ध कर लेते हो। इसलिए कहा गया है ‘तुम काम प्रारम्भ करो, तुम्हें शक्ति स्वयमेव प्राप्त हो जाएगी।’ स्वयं का विश्वास (लघुकथा) एक शहर में आर्यन नाम का एक युवा कलाकार रहता था। वह चित्रकारी में बहुत निपुण था, लेकिन उसे हमेशा ल...

दुनिया एक नाटक है

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  दुनिया एक नाटक है  ( 11-4-2026) सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Sung by- Bindu Jain, Delhi धुन - तेरी याद में जल कर देख लिया, अब आग में जल कर देखेंगे..... ये दुनिया तो इक नाटक है, यह भूल गया तो क्या होगा, हंसते-रोते जीवन बीता, तो इस नर भव का क्या होगा? नाटक में अटक गया गर तू, फिर कुछ भी न कर पाएगा। यूँ सुबह हुई और शाम हुई, फिर रात का आलम क्या होगा? ये दुनिया तो...... दर्शक दीर्घा में बैठा है, और मंच पे नाटक चलता है। सुखान्त हुआ तो हंसने लगा, दुःखान्त हुआ तो क्या होगा? धीरे-धीरे परदा उठता, इक प्यारा-सा बच्चा दिखता। माँ-बाप का वही सहारा था, वह टूट गया तो क्या होगा? ये दुनिया तो...... नाटक में वर्षा होने लगी, तेरा तन-मन भी भीग गया, पर तेज धूप ने जला दिया, ऐसी वर्षा से क्या होगा? नाटक में बच्चा बड़ा हुआ, पत्नी संग जीवन चलने लगा, पति बीच भँवर में छोड़ गया, परिवार के दुःख का क्या होगा? ये दुनिया तो...... माँ-बाप रहे न जीवन-भर, सबकी यादों में रोती रही,  तुम भी संग-संग में रोने लगे, अब उसकी गुज़र का क्या होगा? इक घर उसने भी बनाया था, इक घर तुमने ...

Be humble

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  जितने बड़े बनते जाओ उतने ही विनम्र बनते जाओ।  Be humble as you rise more and more. एक कहावत है कि महान व्यक्ति वह होता है जो सबका सेवक होता है। एक महान व्यक्ति तब और अधिक विनम्र होता जाता है, जब वह और अधिक धन, ताकत, पदवी और सम्मान प्राप्त करता जाता है। नाम, प्रसिद्धि, धन और ताकत पाने पर घमंड करना अहंकारी दिमाग़ के लक्षण हैं। तुम्हें भौतिक वस्तुएं जैसे नाम, प्रसिद्धि, धन और ताकत का दूसरों के सामने प्रदर्शन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। केवल उनको भगवान को समर्पित कर दो। ये सब वस्तुएं भगवान की ओर से प्रदान की गई हैं, तुम्हारी नहीं है। घमंड और अहंकार निश्चित रूप से मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। यह एक दैवीय नियम है और किसी को ऐसे पतन से छूट नहीं मिलती। वृक्ष और विनम्रता एक नदी के किनारे एक बहुत विशाल और मजबूत सागौन का पेड़ था। उसे अपनी मजबूती और ऊँचाई पर बहुत घमंड था। वह हमेशा छोटे पौधों, झाड़ियों और लताओं को नीची नज़र से देखता था और अक्सर कहता, “तुम सब कितने कमज़ोर हो, हवा के एक झोंके में झुक जाते हो। मुझे देखो, मैं कभी नहीं झुकता।”  छोटे पौधे चुपचाप उसकी बातें सुनते और अपनी...

मंगल आशीर्वाद

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 मंगल आशीर्वाद 13 अप्रैल 2026 को श्रीमती अमृत मनोचा एवं श्री नरेंद्र मनोचा के वैवाहिक महोत्सव की ५०वीं स्वर्ण वर्षगांठ की मंगल शुभकामना और आशीर्वाद वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से दीप शिखाओं की तरह, जीवन हो रोशन आपका, अच्छा बीता है भूत, वर्तमान; चमकता रहे भविष्य भी आपका। अभिनन्दन है कर रहा, यह जनसमूह विशाल, मनोचा कुल के चिराग हो, हो उम्र हज़ारों साल। नरेंद्र जी संग अमृत जी ने बांधी जीवन डोर, कर रहे परिवार का दोनों, जग में ऊँचा भाल।। आपके चेहरे पर कुदरत का नूर नज़र आता है, आपका दामन ख़ुशियों से भरपूर नज़र आता है। वैवाहिक जीवन के किए पूरे बेमिसाल पचास साल, आपका भविष्य भी आनन्द से सराबोर नज़र आता है।।  सनातन वैवाहिक परम्परा में जीवन कमाल है, गृहस्थी में दो आत्माओं का मिलन बेमिसाल है। यह बंधन 100-50 सालों का नहीं, सात जन्मों का विधान है, इसलिए इस में सर्वश्रेष्ठ रिश्तों का प्रावधान है।। गृहस्थाश्रम केवल एक भूमिका नहीं, यह बड़ा परिवार है, इस परिवार में होता, अनेक रिश्तों का विस्तार है।। सुखी परिवार ही जीवन, समाज व राष्ट्र का आधार है, यह सृष्टि की रचना...

माँ की ममता

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 माँ की ममता (24.8.2013) सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Sung By - Bindu Jain, Delhi धुन- चांदी की दीवार न तोड़ी............ माँ ने पीड़ा बहुत सही, तब तूने जीवन पाया है, पर तूने इस जीवन में, माँ को क्या सुख पहुँचाया है।  माँ ने.... जब तू घुटनों के बल रेंगा, माँ ने तुझको खड़ा किया, और पिता ने प्यार से तुझको, पाल-पोस कर बड़ा किया। लोरी सुना-सुना कर तुझको, मीठी नीद सुलाया है।  माँ ने....... तेरी एक कराह को सुनकर, माँ ने अश्रु बहाए हैं, तेरी इक मुस्कान पे माँ ने, लाखों मोती लुटाए हैं। तूने मीठी बातों से, माँ बाप का मन बहलाया है।  माँ ने....... जब तू पढ़ने जाता था तब, माँ ही तुझे जगाती थी, ‘राजा बेटा’ कह कर तुझको, सारे पाठ पढ़ाती थी। सिखा-सिखा अच्छी बातें, जीवन का मार्ग दिखाया है।  माँ ने.. जब तक तू पढ़कर न आता, राह देखती रहती थी, मेरा बेटा रहे सलामत, यही दुआएं करती थी। घड़ी-घड़ी वह घड़ी को देखे, ज्यों-त्यों समय बिताया है।  माँ ने....... जीवन में तू सफल बने, बस यही कामना करती थी, दुःख तो तेरे पास न फटके, सारे गम खुद सहती थी। ‘मेरा नाम क...

Don't get upset

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  किसी के द्वारा आलोचना किए जाने पर व्याकुल न हों। Don't get upset over rejection and disapproval. कुछ लोग बहुत बेचैन हो जाते हैं, जब वे या उनका काम या उनके विचार किसी के द्वारा अस्वीकार और नापसंद कर दिये जाते हैं। वे महसूस करने लगते हैं कि वे अयोग्य हैं और अन्य लोगों की तुलना में हीन हैं और इस कारण वे हताश और निराश हो जाते हैं। यदि तुम ऐसा करते हो तो तुम एक बहुत ही झूठी कल्पना बना रहे हो कि जो व्यक्ति तुम्हें अस्वीकार कर रहा है, वह हमेशा ठीक होता है और तुम हमेशा ग़लत होते हो। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे हमेशा ठीक नहीं होते। जो व्यक्ति तुम्हें नकार रहा है, वह हो सकता है कि तकनीकी रूप से तुम्हारा मूल्यांकन करने के लिए सही न हो या वह तुम्हारे विरुद्ध  ईर्ष्या या पक्षपात करने वाला व्यक्ति हो। इसलिए तुम इसे कैसे ठीक कह सकते हो। तुम्हें अपने बारे में अन्य व्यक्तियों की राय सुननी चाहिए, पर केवल उस व्यक्ति की राय के अनुसार यदि तुम्हारे विचार अन्य लोगों के साथ नहीं मिलते, तो बेचैन होने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में जब कोई व्यक्ति तुम्हारे बारे में कोई राय देता है, तो वह तुम्हारी बजा...

सच्चा शृंगार

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सच्चा शृंगार  भारत माता का सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Sung by- Bindu Jain, Delhi धुनः क्या मिलिए ऐसे लोगों से या मैं आँख में अंजन भर लूँ, या सबके दुःख भंजन कर लूँ। या मैं सबको खुशी बांट दूँ,या सबका अभिनन्दन कर लूँ।।  या सबको सत्पथ दिखला दूँ,या धर लूँ माथे पर बिंदिया,  या मैं उनका मर्दन कर दूँ, जिसने उड़ा दी मेरी निंदिया। झूठ और रिश्वतखोरी की, जड़ें जम गई हैं गहरी, ऐसी सरकार सुनेगी क्या, जो जन्मजात होती बहरी। या सबके दुःख-दर्द मिटा दूँ, या पहनूँ पैरों में पायल , या मैं सबक सिखा दूँ जिसने, किया है मेरे दिल को घायल। बेईमानी का पाठ सीख गए, बिना पढ़े ही ये बच्चे, अब मैं कैसे कह दूँ कि, ये बच्चे हैं मन के सच्चे। ये बच्चे ही कल को मेरा, प्यारा देश संभालेंगे, न जाने किस रंग-रूप में इस जननी को ढालेंगे। या बच्चों को समझ सिखादूँ, या मैं डालूँ गले में माला, या पूछूँ नेताओं से, क्या हाल देश का कर डाला? भ्रष्टाचार औ’ अनाचार ने, किया खोखला देश को,  हे भगवन्! अब तुम ही आकर, इसे नया परिवेश दो। धर्म की राह दिखा दूँ सबको, या सिंदूरी मांग सजा दूँ, भ...

Learn to appreciate others.

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दूसरों की प्रशंसा करना सीखो।  Learn to appreciate others. अच्छी बातों के लिए और दूसरों के द्वारा किये गये अच्छे कामों के लिए उन की प्रशंसा करना सीखो। यह उन्हें उत्साहित करेगा और चारों ओर स्वस्थ वातावरण का निर्माण होगा। दूसरों में कुछ अच्छाई देखने से तुम मानसिक रूप से सकारात्मक और प्रसन्न रहोगे। चाहे कोई व्यक्ति कितना भी बुरा क्यों न हो, लेकिन हरेक में कुछ न कुछ ‘अच्छा’ होता है। दूसरों की प्रशंसा करना सीखो (लघुकथा) एक बार एक बहुत ही प्रसिद्ध चित्रकार ने एक अद्भुत तस्वीर बनाई और उसे शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर टांग दिया। तस्वीर के नीचे लिखा था, “जिस किसी को भी इसमें कोई कमी दिखे, वह वहां निशान लगा दे।” शाम को जब चित्रकार ने तस्वीर देखी, तो वह हैरान रह गया। पूरी तस्वीर पर निशानों की भरमार थी, और एक भी कोना ऐसा नहीं था, जहां किसी ने कोई गलती न निकाली हो। चित्रकार बहुत उदास हो गया। उसे उदास देखकर, उसके एक समझदार मित्र ने कहा, “अगले दिन तुम एक नई तस्वीर बनाओ और उसे वहीं टांगना, लेकिन इस बार निर्देश अलग लिखना।” अगले दिन, चित्रकार ने वैसी ही खूबसूरत तस्वीर बनाई, लेकिन इस बार उसने लिखाः “ज...

Be independent.

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  स्वतंत्र बनो, अपने निर्णय ख़ुद लो। Be independent. Take your own decisions. कुछ लोगों को अपने लिए निर्णय लेने के लिए दूसरों की ओर देखने की आदत होती है। यह एक कमज़ोर दिमाग़ व आत्म-विश्वास के अभाव के लक्षण हैं। तुम्हें अधिकतर अपनी समस्याएं खुद ही हल करने की कोशिश करनी चाहिए और अपने निर्णय खुद लेने चाहिएं। अपना फैसला, अपनी उड़ान राजीव एक होनहार युवा था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह थी कि वह अपने जीवन का हर छोटा-बड़ा फैसला दूसरों से पूछकर लेता था। करियर चुनना हो, कपड़े खरीदने हों या दोस्तों के साथ घूमने जाना हो- वह हमेशा उलझन में रहता था कि “लोग क्या कहेंगे“ या “पापा क्या कहेंगे“। उसके पिता एक समझदार व्यक्ति थे। उन्होंने राजीव की इस आदत को भांप लिया था। एक दिन, राजीव को एक बड़ी कंपनी से अच्छी नौकरी का ऑफर आया, लेकिन वह नौकरी दूसरे शहर में थी। राजीव डर गया और उसने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से सलाह लेना शुरू कर दिया। कोई कहता, “बाहर मत जाओ, यहीं नौकरी ढूंढो,” तो कोई कहता, “इतनी अच्छी अपॉर्चुनिटी मत छोड़ो।” राजीव की उलझन और बढ़ गई। उसने फिर अपने पिता से पूछा। पिता ने मुस्कुराकर कहा, “राजीव, स...

‘माटी का दीया’

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  ‘माटी का दीया’ सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Presented by Bindu Jain , Delhi एक माटी का दीया, जिसके उर में स्नेह भरा। जीवन की बाती को आकण्ठ, चिर स्नेह में भिगो कर, घर की मुंडेर पर बैठा,  तिल-तिल कर, रात भर जलता रहा। निष्ठुर सनम की राह तकता रहा। मन में यह आस लिए, पथ आलोकित करता रहा। मेरे साजन आएंगे। मुझे दोनों हाथों में उठा कर, घर के भीतर ले जाएंगे। आंगन के ऊंचे आले में, सहेज कर टिका देंगे। मैं भी वहाँ तेज़ हवा से बचता हुआ,  चैन की सांस लेता हुआ, सारे घर को आलोकित करूँगा, आजन्म उनके जीवन को, खुशियों के प्रकाश से भरूँगा। पर ‘हाय’................ रात बीती, सुबह होने को आई,  पक्षियों ने भी ली अंगड़ाई। सूरज की लालिमा भी पूर्व दिशा में नज़र आई, स्नेह (तेल) भी चुक गया, जीवन भी रुक गया। बाती ने शनैः शनैः घर की मुंडेर पर बैठे-बैठे, अपना जीवन खो दिया। और दीया............  सदा के लिए, मौत की नींद में सो गया। सनम ने न जाने क्यों अपना मुख मोड़ लिया। सारे सपने हो गए चकनाचूर,  दिल के अरमां हो गए रोने को मज़बूर। मेरे साजन ने राह बदल ली,...