जीवन का सत्य
जीवन का सत्य प्रातःकाल शांत वातावरण था। सूर्य की हल्की किरणें बोधिवृक्ष की पत्तियों से छनकर नीचे बैठी भिक्षु सभा पर पड़ रही थीं। भगवान बुद्ध के शिष्य ध्यान मग्न होकर उनके प्रवचन की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही बुद्ध सभा में पहुँचे, शिष्यों की आँखें आश्चर्य से फैल गईं। आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे एक साधारण सी रस्सी। बिना कुछ बोले बुद्ध अपने आसन पर बैठे और पूरी शांति के साथ उस रस्सी में एक के बाद एक तीन गाँठें लगाने लगे। सभा में सन्नाटा छा गया। हर मन में एक ही प्रश्न था आज यह मौन क्यों, यह रस्सी क्यों? कुछ क्षणों बाद बुद्ध ने शांत स्वर में पूछा, मैंने इस रस्सी में तीन गाँठें लगा दी हैं। बताओ, क्या यह वही रस्सी है जो पहले थी? शिष्य सोच में पड़ गए। थोड़ी देर बाद एक शिष्य ने विनम्रता से कहा - भगवन्! यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। बाहर से देखें तो रस्सी बदली हुई लगती है क्योंकि इसमें गाँठें लग गई हैं। लेकिन भीतर से, अपने मूल स्वरूप में, यह वही रस्सी है। बुद्ध मुस्कराए - सत्य कहा तुमने फिर उन्होंने रस्सी के दोनों सिरों को पकड़कर जोर से खींचना शुरू कर दि...