चालाकी का परिणाम

 चालाकी का परिणाम

एक गाँव में एक कंजूस बूढ़ी महिला रहती थी। उसके पास धन-दौलत तो बहुत थी, लेकिन उसके स्वभाव के कारण कोई उसे पसंद नहीं करता था। घर में उसकी कई नौकरानियाँ थीं, जिन पर वह दिन-रात हुकूमत चलाती थी।

महिला की आदत थी कि जैसे ही सुबह उसके घर का मुर्गा बाँग देता, वह उसी समय जाग जाती। मुर्गे की बाँग सुनते ही वह नौकरानियों को जोर-जोर से आवाज़ देती और तुरंत काम में जुटा देती। चाहे अँधेरा हो या ठंडी सुबह, नौकरानियों को बर्तन माँजने, आँगन साफ़ करने और अन्य काम करने के लिए दौड़ाया जाता।

नौकरानियों को यह आदत बिल्कुल पसंद नहीं थी। वे चाहती थीं कि सुबह देर तक सो सकें, लेकिन मुर्गे की बाँग और मालकिन की आवाज़ से उनकी नींद हर दिन टूट जाती। धीरे-धीरे उनके मन में मुर्गे के प्रति चिढ़ और गुस्सा बढ़ता गया।

एक दिन उन्होंने आपस में सलाह की - “अगर यह मुर्गा नहीं रहेगा, तो हमारी मुसीबत आधी हो जाएगी। बूढ़ी मालकिन देर तक सोती रहेगी और हमें भी चैन से सोने का मौका मिलेगा।“ सभी इस बात से सहमत हो गईं।

रात को जब सब सो गए, नौकरानियों ने चुपके से मुर्गे को पकड़कर मार डाला और सोचने लगीं कि अब सुबह का झंझट खत्म हो जाएगा।

लेकिन अगले ही दिन उनकी समझ में आ गया कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती कर दी है। सुबह मुर्गे की बाँग नहीं सुनाई दी तो बूढ़ी महिला घबरा गई। उसने सोचा - “अब मुर्गा नहीं रहा, तो कहीं मैं देर तक सोती न रहूँ।“

यही सोचकर उसने और सतर्क रहना शुरू कर दिया। वह रात के किसी भी समय उठ जाती और नौकरानियों को काम में लगा देती। कभी आधी रात को झाड़ू लगवाती, तो कभी अँधेरे में ही बर्तन मँजवाती।

अब नौकरानियों की नींद और भी बुरी तरह खराब होने लगी। पहले तो उन्हें सिर्फ सुबह जल्दी उठना पड़ता था, लेकिन अब तो दिन-रात का चैन ही नहीं बचा।

कुछ दिनों बाद उन्हें अपने कर्म पर पछतावा हुआ। वे सोचने लगीं - “हमने चालाकी दिखाकर मुर्गे को मार तो दिया, लेकिन इससे हमारी मुसीबत कम होने के बजाय और बढ़ गई।“

इस घटना से उन्हें एक बड़ी सीख मिली कि चालाकी और स्वार्थ में किया गया काम हमेशा लाभकारी नहीं होता। कई बार छोटी-सी चालाकी भी बड़े नुकसान का कारण बन जाती है।

नीतिः

बहुत अधिक चालाकी दिखाने पर हानि ही होती है, लाभ नहीं।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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