Take and give help freely.
स्वतंत्रतापूर्वक सहायता दो और लो।Take and give help freely.
किसी से मदद लेने और देने में कोई हिचकिचाहट या संकोच नहीं होना चाहिए। भगवान की दैवीय सन्तान होने के कारण यह प्रत्येक व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है। फिर भी यदि कोई मदद करने से मना कर दे या कोई तुम्हारे द्वारा दी गई सहायता को महत्त्व न दे तो तुम्हारे दिल में कोई द्वेष की भावना नहीं होनी चाहिए।
सहायता दो और लो - लघुकथा
कड़कड़ाती ठंड की रात थी। रोहन अपने दफ्तर से घर लौट रहा था। उसने देखा कि सड़क के किनारे एक बुजुर्ग का स्कूटर खराब हो गया है और वे उसे स्टार्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। राहगीर आ-जा रहे थे, लेकिन कोई रुक नहीं रहा था।
रोहन को दया आ गई। उसने अपनी कार रोकी और बुजुर्ग की मदद के लिए आगे बढ़ा। उसने कहा, “बाबा, आप थक गए होंगे, मुझे स्टार्ट करने दीजिए।” रोहन ने दस मिनट तक कड़ी मेहनत की और स्कूटर चालू हो गया। बुजुर्ग ने मुस्कुराकर रोहन को आशीर्वाद दिया।
अगले दिन, रोहन की गाड़ी शहर के बीचों-बीच खराब हो गई। वह परेशान होकर उसे ठीक करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन नाकाम रहा। अचानक वही बुजुर्ग अपने स्कूटर पर वहां से गुजरे और उन्होंने रोहन को पहचान लिया।
बुजुर्ग ने पास आकर कहा, “बेटा, हिम्मत मत हारो। कल तुमने मेरी मदद की थी, आज मैं तुम्हारी मदद करूँगा।“ उन्होंने अपनी पहचान के एक मैकेनिक को बुलाया और रोहन की गाड़ी ठीक करवा दी। रोहन ने मुस्कुराकर बुजुर्ग को धन्यवाद किया और ज़रूरत पड़ने पर सबकी सहायता करने का विश्वास दिलाया।
सीखः सहायता दो और लो। निःस्वार्थ भाव से की गई मदद कभी व्यर्थ नहीं जाती, वह किसी न किसी रूप में वापस लौटकर जरूर आती है।
दूसरों की मदद करके हम वास्तव में अपने मन को पवित्र करते हैं। हमें दूसरे व्यक्तियों का धन्यवादी होना चाहिए जो हमें यह दैवी कार्य करने का अवसर देते हैं। दूसरों को भौतिक सहायता या ज्ञान व पथ-प्रदर्शन में सहायता देने से तुम्हें किसी प्रकार की कमी नहीं आएगी, बल्कि दैवीय नियम के द्वारा ‘जितना अधिक तुम दोगे, उतना ही तुम्हारे पास आएगा।’ चाहे वह मदद हो, या शुभकामनाएं।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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