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नास्तिक से आस्तिक

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नास्तिक से आस्तिक   उदयराम शहर का एक अत्यंत कुशाग्र बुद्धि वाला तर्कशास्त्री था, जिसकी पहचान एक ऐसे कट्टर नास्तिक के रूप में थी, जो केवल प्रत्यक्ष प्रमाण और वैज्ञानिक आंकड़ों पर ही विश्वास करता था और अक्सर सभाओं में यह चुनौती देता था कि यदि ईश्वर है, तो वह दिखाई क्यों नहीं देता, क्योंकि उसकी दृष्टि में जो अस्तित्वहीन है, वही अदृश्य है। वह जीवन को रसायनों और भौतिक क्रियाओं का एक आकस्मिक मेल मात्र मानता था । जिसमें भावना या प्रार्थना का कोई स्थान नहीं था। परंतु उसके इस कठोर तार्किक संसार को एक ऐसी घटना ने झकझोर दिया, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक बार अपने शोध कार्य के लिए वह हिमालय की उन दुर्गम और निर्जन पहाड़ियों के भ्रमण पर था, जहाँ प्रकृति का सौंदर्य जितना मनमोहक था, उसकी कठोरता उतनी ही जानलेवा थी।  एक शाम जब वह एक संकरी ढलान से गुजर रहा था अचानक तेज़ बारिश और भूस्खलन के कारण उसका पैर फिसला और वह हज़ारों फीट गहरी खाई की ओर लुढ़कने लगा, लेकिन किस्मत से उसकी शर्ट एक मज़बूत झाड़ी के तने में फंस गई और वह हवा में झूलने लगा। नीचे मौत का अंधेरा था और ऊपर बारिश की वजह से फि...

शांतिपूर्ण जीवन

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शांतिपूर्ण  जीवन के लिये प्रेरणात्मक      एक दिन, पत्नी ने सहजता से कहा,  “सुनो, मैं अपनी सहेली के साथ थोड़ी देर के लिए बाहर जा रही हूँ।”   उसका पति, जो फोन देख रहा था, बस नज़र उठाकर बोला, “ठीक है। मज़े करो।”   वह थोड़ा हैरान हुई। आमतौर पर वह कहता था, क्या जाना ज़रूरी है? सच में जाना है? देर मत करना। लेकिन उस दिन — कुछ नहीं। न कोई आह, न कोई सवाल — बस शांत सा, “ठीक है।”   कुछ घंटों बाद, उनका किशोर बेटा रसोई में आया। उसके हाथ में एक कागज़ था, चेहरा पीला पड़ा हुआ।   “पापा,” उसने धीरे से कहा, “मेरे मॉक एग्जाम का रिज़ल्ट आया है... और बहुत खराब है।”   वह सहमा हुआ खड़ा था, हमेशा की तरह डाँट खाने की उम्मीद में। उसके पापा हमेशा पढ़ाई को लेकर परेशान रहते थे, इसलिए वह समय बर्बाद करने और उम्मीदों पर खरा न उतरने वाले लेक्चर के लिए तैयार था।   लेकिन इस बार, उसके पिता ने शांति से कहा,  “ठीक है।”   बेटा आँखें फाड़कर बोला,  “बस... ठीक है?”   “हाँ,” उन्होंने धीरे से कहा।   “अगर तुम...

बद्रीनाथ धाम

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  लीला से जन्मा बद्रीनाथ धाम यह कहानी बद्रीनाथ धाम की उत्पत्ति से जुड़ी एक बहुत ही प्रसिद्ध और रोचक पौराणिक कथा है। यह कथा मुख्य रूप से यह दर्शाती है कि कैसे भगवान विष्णु ने अपनी चतुराई और भगवान शिव ने अपनी उदारता के कारण इस पवित्र स्थान का आदान-प्रदान किया। यहाँ इस कहानी का मूल संदर्भ और सार दिया गया है: कथा का मूल भाव: 'लीला' और 'त्याग' इस कहानी को "बद्रीनाथ का छल" या "विष्णु की बाल लीला" के नाम से भी जाना जाता है।  एक दिन नारायण यानी विष्णु के पास नारद गए और बोले, 'आप मानवता के लिए एक खराब मिसाल हैं। आप हर समय शेषनाग के ऊपर लेटे रहते हैं। आपकी पत्नी लक्ष्मी हमेशा आपकी सेवा में लगी रहती हैं, और आपको लाड़ करती रहती हैं। इस ग्रह के अन्य प्राणियों के लिए आप अच्छी मिसाल नहीं बन पा रहे हैं। आपको सृष्टि के सभी जीवों के लिए कुछ अर्थपूर्ण कार्य करना चाहिए।' इस आलोचना से बचने और साथ ही अपने उत्थान के लिए (भगवान को भी ऐसा करना पड़ता है) विष्णु तप और साधना करने के लिए सही स्थान की तलाश में नीचे हिमालय तक आए। वहां उन्हें मिला बद्रीनाथ, एक अच्छा-सा, छोटा...

सकारात्मक दृष्टिकोण

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स का रात्मक दृष्टिकोण एक गरीब व्यक्ति बड़ी मेहनत से एक-एक रुपया जोड़ कर मकान बनवाता है। उस मकान को बनवाने के लिए वह पिछले 20 वर्षों से एक-एक पैसा बचत करता है, ताकि उसका परिवार छोटे से झोपड़े से निकलकर पक्के मकान में सुख से रह सके। आखिरकार एक दिन मकान बन कर तैयार हो जाता है। तत्पश्चात पंडित से पूछ कर गृह प्रवेश के लिए शुभ तिथि निश्चित की जाती है लेकिन गृहप्रवेश के दो दिन पहले ही शार्ट सर्किट के कारण मकान मे आग लग जाती है, और उसका मकान पूरी तरह जल जाता है। यह सूचना जब उस व्यक्ति को पता चलती है, तो वह दौड़ा-दौड़ा बाजार जाता है और मिठाई खरीद कर ले आता है। मिठाई लेकर वह घटनास्थल पर पहुंचता है, जहां पर काफी लोग इकट्ठे होकर उसके मकान जलने पर संवेदना व्यक्त कर रहे थे। ओह! बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ, कितनी मुश्किल से एक एक पैसा जोड़कर मकान बनवाया था। इसी प्रकार लोग आपस में तरह तरह की बातें कर रहे थे। वह व्यक्ति वहाँ पहुंचता है और झोले से मिठाई निकाल कर सबको बाँटने लगता है। यह देखकर सभी लोग चकित हो जाते हैं। तभी उसका एक मित्र उससे कहता है, कहीं तुम पागल तो नहीं हो गए हो, घर जल गया, तुम्हारी जी...

भाग्य और कर्म

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    भाग्य और कर्म एक बार की बात है कि देवर्षि नारद वैकुंठ धाम गए। वहां उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और श्रीहरि विष्णु भगवन से कहा, ‘‘ हे प्रभु! पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म की राह पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा और जो पाप कर रहे हैं उनका सब भला हो रहा है। उनके मजे ही मजे हैं। ’’ तब श्रीहरि विष्णु भगवान् ने कहा, ‘‘ ऐसा नहीं है ‘नारद’ । जो भी हो रहा है सब नियति के कारण हो रहा है। ’’ नारद बोले, ‘‘प्रभु! मैं तो यह सब पृथ्वी लोक देख कर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।’’ श्री विष्णु भगवान ने कहा, ‘‘नारद कोई ऐसी घटना बताओ जो तुमने देखा हो। ’’ तब..नारद जी ने कहा: अभी मैं पृथ्वी लोक के एक जंगल से आ रहा हूँ। मैंने देखा कि वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।  तभी एक चोर उधर से गुजर रहा था। वह चोर गाय को फंसा हुआ देखकर भी रुका नहीं, बल्कि वह उसपर पैर रखकर दलदल लांघ कर आगे निकल गया। “आश्चर्य तो तब हुआ जब आगे जाकर उस चोर को सोने की मोहरों स...

बच्चों की सही परवरिश

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बच्चों की सही परवरिश शहर से कुछ दूरी पर बसे एक मोहल्ले में रुचिका अपने हस्बैंड के साथ रहती थी. उसके ठीक बगल में एक बुजर्ग व्यक्ति अकेले ही रहा करते थे, जिन्हें सभी “दादा जी” कह कर बुलाते थे। एक बार मोहल्ले में एक पौधे वाला आया. उसके पास कई किस्म के खूबसूरत, हरे-भरे पौधे थे। रुचिका और दादाजी ने बिलकुल एक तरह का पौधा खरीदा और अपनी-अपनी क्यारी में लगा दिया. रुचिका पौधे का बहुत ध्यान रखती थी. दिन में तीन बार पानी डालना, समय-समय पर खाद देना और हर तरह के कीटनाशक का प्रयोग कर वह कोशश करती की उसका पौधा ही सबसे अच्छा ढंग से बड़ा हो। दूसरी तरफ दादा जी भी अपने पौधे का ख़याल रख रहे थे, पर रुचिका के तुलना में वे थोड़े बेपरवाह थे… दिन में बस एक या दो बार ही पानी डालते, खाद डालने और कीटनाशक के प्रयोग में भी वे ढीले थे। समय बीता. दोनों पौधे बड़े हुए। रुचिका का पौधा हरा-भरा और बेहद खूबसूरत था. दूसरी तरफ दादा जी का पौधा अभी भी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में नहीं आ पाया था। यह देखकर रुचिका मन ही मन पौधों के विषय में अपनी जानकारी और देखभाल करने की लगन को लेकर गर्व महसूस करती थी। फिर एक रात अचानक ही मौसम बिगड़ गया. ह...

प्रेम और समर्पण

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प्रेम और समर्पण द्वारका नगरी में उस दिन एक भव्य महोत्सव की तैयारी चल रही थी। राजमहल दीपों फूलों और सुगंधित पुष्प मालाओं से सजा हुआ था। चारों ओर उत्सव का वातावरण था और महल की विशाल रसोई में तरह तरह के पकवान बनाए जा रहे थे। सोने-चांदी की थालियों में मोदक, लड्डू और अनेक प्रकार के मिष्ठान सजाकर रखे गए थे। किसी को क्या पता था कि कुछ ही क्षणों में स्वयं पवनपुत्र हनुमान की बाल सुलभ लीला इस पूरे राजमहल में हलचल मचाने वाली है। उसी समय हनुमान जी आकाश मार्ग से द्वारिका के ऊपर से गुजर रहे थे। समुद्र की लहरों के बीच बसी सुंदर नगरी को देखकर उनके मन में बाल सुलभ उत्सुकता जागी। अचानक उन्हें राजमहल की ओर से आती मिष्ठान की अद्भुत सुगंध महसूस हुई। हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, "अरे वाह! यह कैसी सुगंध है? ऐसा लगता है जैसे माता सीता के हाथों से बना हुआ प्रसाद हो। उत्सुकता में वे अपनी दिव्य शक्ति से स्वयं को अदृश्य करके राजमहल के भीतर प्रवेश कर गए। हनुमान जी धीरे-धीरे रसोई तक पहुंचे। जैसे ही उन्होंने सामने रखे मोदक और लड्डुओं को देखा उनकी आंखों में बालक जैसी चमक आ गई। उन्होंने एक लड्डू उठाया और प्रेम स...

सब कुछ है

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मनुष्य के पास सब कुछ है  फिर दु:खी, रोगी, अशांत क्यों? कहते हैं एक बार माता पार्वती ने कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव से पूछा, "हे प्रभु! मनुष्य को आपने बुद्धि दी, परिश्रम करने की शक्ति दी, अवसर दिए, फिर भी अनेक लोग जीवन भर गरीबी, अभाव और दुख में क्यों जीते हैं? आखिर वह कौन सा रहस्य है, जिसे जान लेने के बाद मनुष्य कभी निर्धन नहीं रहता?"  माता पार्वती के इस प्रश्न को सुनकर महादेव मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, "देवी!  गरीबी केवल धन की कमी का नाम नहीं है। वास्तविक गरीबी मनुष्य के विचारों, साहस और निर्णयों में होती है। आज मैं तुम्हें एक ऐसी कथा सुनाता हूं जिसमें जीवन को बदल देने वाले पांच रहस्य छिपे हैं।" बहुत समय पहले एक नगर में एक अत्यंत गरीब स्त्री रहती थी। उसके छह पुत्र थे और उसका जीवन अभावों से भरा हुआ था। वह प्रतिदिन अपने पुत्रों के साथ एक साहूकार के यहां मजदूरी करती थी। दिन भर कठोर परिश्रम करने के बदले उसे केवल थोड़े से जौ मिलते थे। उन्हीं जौ को पीसकर वह अपने परिवार के लिए भोजन बनाती थी, लेकिन भोजन इतना कम होता कि किसी का पेट ठीक से नहीं भरता था। गरीबी इतनी थी कि...

मदद

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 मदद शनिवार की रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे जय कार्यालय से घर लौट रहा था। कुछ दूर जाने पर उसे सड़क किनारे एक युवती दिखाई दी, जो हाथ देकर किसी वाहन को रोकने का प्रयास कर रही थी। जय ने समझा कि वह उससे सहायता माँग रही है, इसलिए उसने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी। तभी एक तिपहिया वाहन वहाँ से निकल गया। युवती क्रोधित होकर बोली, “मैंने उस वाहन को रोका था। बड़ी मुश्किल से वह आया था, लेकिन आपकी वजह से वह भी निकल गया!” जय को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने तुरंत क्षमा माँगी और उसे घर तक छोड़ने की बात कही, लेकिन युवती ने मना कर दिया। रात गहराती जा रही थी। सड़क सुनसान थी और आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था। जय चाहता तो वहाँ से चला जाता, लेकिन उसका मन उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रहा था। उसने सोचा, “यदि इस समय इस युवती के साथ कोई अनहोनी हो गई, तो क्या मैं स्वयं को कभी क्षमा कर पाऊँगा?” वह लगभग आधे घंटे तक वहीं खड़ा रहा। फिर उसने युवती से कहा, “मेरे घर में भी तुम्हारे जैसी एक छोटी बहन है। मैं तुम्हें उसी की तरह समझकर सहायता करना चाहता हूँ। कृपया मेरी बात मान लो।” युवती कुछ शांत हुई, लेकिन फिर भी झिझक रही थी। ...

पारस पत्थर

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पारस पत्थर बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक किसान रहता था, जिसके पास सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन थी। किसान अब बूढ़ा हो चला था। उसका एक ही बेटा था—दिनेश। वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद किसान ने इतनी बड़ी जमीन बनाई थी, परंतु उसका बेटा मेहनत से दूर भागता था। उसे खेती-बाड़ी में बिल्कुल रुचि नहीं थी। वह चाहता था कि बिना मेहनत किए जल्द से जल्द बहुत अमीर बन जाए। इसी बीच एक दिन किसान की मृत्यु हो गई। अब सारी ज़मीन की जिम्मेदारी दिनेश पर आ गई। पर दिनेश के मन में केवल एक ही लालच घर कर चुका था—किसी भी तरह पारस पत्थर प्राप्त कर लेना। लोगों से उसने सुना था कि पारस पत्थर को किसी भी धातु से स्पर्श करा दो, वह सोना बन जाती है। यह सुनकर दिनेश की आँखों में सपनों की चमक भर गई। दिनेश पारस पत्थर की खोज में यहाँ–वहाँ भटकने लगा। उसने कई लोगों से पूछा, कई जगह गया, लेकिन पत्थर कहीं नहीं मिला। उसकी बेचैनी देखकर आसपास के ठगों की आँखों में चमक आ गई। वे दिनेश को नकली पारस पत्थर दिखाकर उससे लाखों रुपये ठग ले गए। ठगों के बाद दिनेश ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फँस गया। वे भी उसे लालच देकर उसका खूब पैसा ऐंठते रहे। पारस पत्थर क...

किस्मत

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किस्मत किस्मत में जो लिखा है वह बार बार आप के पास लौट कर आ जाता है और आप को गरीब से राजा बना देता है 🌹 कुन्दनलाल सारा दिन धूप में इधर-उधर घूम-फिर कर टूटा-फूटा सामान और कबाड़ जमा करता और फिर शाम को उसे बड़े कबाड़ी की दुकान पर बेचकर पेट भरने लायक कमा लेता था। एक दिन वह एक घर से पुराना सामान खरीद रहा था। घर के मालिक ने उसे एक पुराना पानदान भी दिया, जो उसने मोल -भाव करके एक रुपये में खरीद लिया। कुछ आगे बढ़ने पर एक और घर ने उसे कुछ कबाड़ बेचा, लेकिन घर के मालिक को वह पानदान पसन्द आ गया और उसने पांच रुपये में उसे खरीद लिया। लेकिन जब काफी कोशिश के बाद भी वह पानदान उससे नहीं खुला तो अगले दिन उसने उसे कुन्दनलाल को वापस करके अपने पांच रुपये ले लिए। शाम को बड़े कबाड़ी ने भी वह पानदान न खुलने के कारण उससे नहीं खरीदा। अगले दिन रविवार था। रविवार को बाजार के चौंक पर कुन्दनलाल पुराना सामान बेचता था। वहाँ उससे कोई ग्राहक पांच रुपये देकर वह पानदान ले गया। लेकिन अगले रविवार को वह ग्राहक वह पानदान उसे वापिस कर गया क्योंकि वह उससे भी नहीं खुला। बार-बार पानदान उसी के पास पहुँच जाने के कारण कुन्दनलाल को बहु...