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दान या सौदा

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 दान या सौदा Photo by Karolina Grabowska from Pexels एक बार भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। तभी बातों-बातों में अर्जुन ने कृष्ण से कहा कि क्यों कर्ण को दानवीर कहा जाता है और उन्हें नहीं ? जबकि दान हम भी बहुत करते हैं। यह सुन कर कृष्ण ने दो पर्वतों को सोने में बदल दिया और अर्जुन से कहा कि वे उनका सारा सोना गाँव वालों के बीच बाँट दें। तब अर्जुन गाँव गए और सारे लोगों से कहा कि वे पर्वत के पास जमा हो जाएं क्योंकि वे सोना बांटने जा रहे हैं। यह सुन गाँव वालों ने अर्जुन की जय-जयकार करनी शुरू कर दी और अर्जुन छाती चौड़ी कर पर्वत की तरफ चल दिए। दो दिनों और दो रातों तक अर्जुन ने सोने के पर्वतों को खोदा और सोना गाँव वालों में बांटा। पर पर्वत पर कोई असर नहीं हुआ। इसी बीच बहुत से गाँव वाले फिर से कतार में खड़े होकर अपनी बारी आने का इंतज़ार करने लगे। अर्जुन अब थक चुके थे लेकिन अपने अहंकार को नहीं छोड़ रहे थे। उन्होंने कृष्ण से कहा कि अब वे थोड़ा आराम करना चाहते हैं और इसके बिना वे खुदाई नहीं कर सकेंगे। तब कृष्ण ने कर्ण को बुलाया और कहा कि सोने के पर्वतों को इन गाँव वा...

राजा और भिखारी

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 राजा और भिखारी एक राजा का जन्मदिन था। सुबह जब वह घूमने निकला तो उसने तय किया कि वह रास्ते में मिलने वाले सबसे पहले व्यक्ति को आज पूरी तरह से खुश व सन्तुष्ट करेगा। उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने राजा से भीख मांगी तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया। सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी नाली में हाथ डालकर तांबे का सिक्का ढूंढने लगा। राजा ने उसे बुलाकर दूसरा तांबे का सिक्का दे दिया। भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापिस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढने लगा। राजा को लगा कि भिखारी बहुत गरीब है। उसने भिखारी को फिर बुलाया और चांदी का एक सिक्का दिया। भिखारी ने राजा की जय-जयकार करते हुए चांदी का सिक्का रख लिया और फिर नाली में तांबे वाला सिक्का ढूंढने लगा। राजा ने उसे फिर बुलाया और अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी खुशी से झूम उठा और वापिस भागकर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा। राजा को बहुत बुरा लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि “पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।” उसने भिखारी को फि...

कर्मफल का विधान

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 कर्मफल का विधान भगवान ने नारद जी से कहा - आप भ्रमण करते रहते हो कोई ऐसी घटना बताओ जिसने तम्हे असमंजस में डाल दिया हो। नारद जी ने कहा - प्रभु! अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूँ। वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था। तभी एक चोर उधर से गुजरा। गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका। उलटे उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर उसे सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिल गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया और उसे चोट लग गयी। भगवन्! बताइए यह कौन-सा न्याय है। भगवान मुस्कुराए। फिर बोले - नारद यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खज़ाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिली। वहीं उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय को बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसकी मृत्यु एक छोटी-सी चोट म...

परिश्रम व भाग्य

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 परिश्रम व भाग्य ​​एक मन्दिर में एक सरल सहज पुजारी थे। जब भी दर्शनार्थ मन्दिर जाओ तो ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहे हों। हर आध्यात्मिक विषय पर बात करने में उन्हें बहुत मज़ा आता। कई बार उन्हें कहा कि महाराज! देर हो जाती है। जल्दी चरणामृत दे दिया करें। पर उनकी बातें ख़त्म ही नहीं होती। एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई। तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो, आज उनके ज्ञान व अनुभव का ही लाभ उठा लेते हैं। मैंने विनम्रता से एक सवाल कर दिया। मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से ? और उनके ज़वाब से मेरे दिमाग़ के सारे द्वन्द्व ही दूर हो गए। कहने लगे कि आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा न ? उसकी चाबियां ही इस सवाल का जवाब है। हर लॉकर की दो चाबियां होती हैं। एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास। आप के पास जो चाबी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली है भाग्य। जब तक दोनों चाबियां नहीं लगती, लॉकर का ताला नहीं खुल सकता। आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान का रूप। आप को अपनी चाबी हर समय लगाए रखना चाहिये। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी च...

नियम का महत्व

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 नियम का महत्व ​​एक संत थे। वे एक दिन एक व्यक्ति के घर गए। उस ने उनकी बहुत सेवा की। संत ने उसे कहा कि रोजाना भगवान का नाम-जप करने का कुछ नियम ले लो। व्यक्ति ने कहा - बाबा! हमारे को वक्त नहीं मिलता। संत ने कहा कि अच्छा! रोजाना ठाकुर जी की मूर्ति के दर्शन कर आया करो। व्यक्ति ने कहा - मैं तो खेत में रहता हूँ और ठाकुर जी की मूर्ति गांव के मंदिर में है। कैसे करूँ ? संत ने उसे कई साधन बताये कि वह कुछ-न-कुछ नियम ले ले। पर वह यही कहता रहा कि मेरे से यह बनेगा नहीं। मैं खेत में काम करूँ या माला लेकर जप करूँ। इतना समय मेरे पास कहाँ है ? बाल-बच्चों का पालन पोषण करना है। आपके जैसा बाबा जी थोड़े ही हूँ कि बैठकर भजन करूँ। संत ने कहा कि अच्छा तू क्या कर सकता है ? व्यक्ति बोला कि पड़ोस में एक कुम्हार रहता है। उसके साथ मेरी मित्रता है। उसके और मेरे खेत भी पास-पास हैं और घर भी पास-पास है। रोज़ाना एक बार उसको देख लिया करूँगा। सन्त ने कहा कि ठीक है। उसको देखे बिना भोजन मत करना। व्यक्ति ने स्वीकार कर लिया। जब उसकी पत्नी कहती कि भोजन कर लो तो वह झट बाड़ पर चढ़कर कुम्हार को देख लेता और भो...

मालिक कौन

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 मालिक कौन ​​एक आदमी एक गाय को घर की ओर ले जा रहा था। गाय जाना नहीं चाहती थी। वह आदमी लाख प्रयास कर रहा था, पर गाय टस से मस नहीं हो रही थी। ऐसे ही बहुत समय बीत गया। एक संत यह सारा माजरा देख रहे थे। अब संत तो संत हैं। उनकी दृष्टि अलग ही होती है। तभी तो दुनिया वाले उनकी बातें सुन कर उसका अर्थ ही खोजते रह जाते हैं। संत अचानक ही ठहाका लगाकर हंस पड़े। वह आदमी कुछ तो पहले ही खीज रहा था। संत की हंसी उसे तीर की तरह लगी। वह बोला - “तुम्हें बहुत हंसी आ रही है ? ” संत ने कहा - “भाई! मैं तुम पर नहीं हंस रहा। अपने ऊपर हंस रहा हूँ।” अपना झोला हाथ में उठा कर संत ने कहा - “मैं यह सोच रहा हूँ कि मैं इस झोले का मालिक हूँ या यह झोला मेरा मालिक है ? ” वह आदमी बोला - “इसमें सोचने की क्या बात है ? झोला तुम्हारा है। तो तुम इसके मालिक हो। जैसे यह गाय मेरी है। मैं इसका मालिक हूँ।” संत ने कहा - “नहीं भाई! ये झोला मेरा मालिक है। मैं तो इसका गुलाम हूँ। इसे मेरी ज़रूरत नहीं है। मुझे इसकी ज़रूरत है। तुम गाय की रस्सी छोड़ दो। तब मालूम पड़ेगा कि कौन किसका मालिक है ? जो जिसके पीछे गया, वह उसका गुला...

मां का त्याग

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 मां का त्याग ​​एक गरीब परिवार में एक सुंदर सी बेटी ने जन्म लिया। बाप दुखी हो गया। बेटा पैदा होता तो कम से कम काम में तो हाथ बटाता। उसने बेटी को पाला तो ज़रूर, मगर दिल से नहीं। वह पढ़ने जाती थी तो न ही स्कूल की फीस टाइम से जमा करता और न ही कॉपी-किताबों पर ध्यान देता था। अक्सर दारू पीकर घर में कोहराम मचाता था। उस लड़की की मां बहुत अच्छी व बहुत भोली-भाली थी। वह अपनी बेटी को बहुत लाड़-प्यार से रखती थी। वह पति से छुपा-छुपा कर बेटी की फीस जमा करती और कापी किताबों का खर्चा देती थी। अपना पेट काटकर फटे-पुराने कपड़े पहनकर गुजारा कर लेती थी। मगर बेटी का पूरा ख्याल रखती थी। पति अक्सर घर से कई दिनों के लिए गायब हो जाता था। जितना कमाता था दारू में फूंक देता था। वक्त का पहिया घूमता गया। बेटी धीरे-धीरे समझदार हो गई। दसवीं कक्षा में उसका एडमिशन होना था। मां के पास इतने पैसे नहीं थे जो बेटी का स्कूल में दाखिला करा पाती। बेटी डरते-डरते हुए पापा से बोली - पापा! मैं पढ़ना चाहती हूँ। मेरा हाई-स्कूल में एडमिशन करा दीजिए। मम्मी के पास पैसे नहीं हैं। बेटी की बात सुनते ही बाप आग-बबूला हो गया ...

कर्म भोगे बिना छुटकारा नहीं

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 कर्म भोगे बिना छुटकारा नहीं ​​वे दोनों सगे भाई थे; शंख और लिखित। उन्होंने गुरु और माता-पिता के द्वारा शिक्षा पाई थी, पूजनीय आचार्यों से प्रोत्साहन पाया था, मित्रों द्वारा सलाह पाई थी। उन्होंने वर्षों के अध्ययन, चिन्तन और अन्वेषण के पश्चात जाना था कि दुनिया में सबसे बड़ा काम जो मनुष्य के करने का है, वह यह है कि अपनी आत्मा का उद्धार करे। मूर्ख इसे नहीं जानते। वे पत्ते-पत्ते को सींचते फिरते हैं फिर भी पेड़ मुरझाता ही चला जाता है। संसार की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक सभी प्रकार की समस्याओं का हल इसी एक बात पर निर्भर है कि आदमी ईमानदार बने, सदाचारी हो, आत्म-कल्याण करे। वे दोनों भाई शंख और लिखित इस तत्व को भली प्रकार जान लेने के बाद तपस्या करने लगे। पास-पास ही दोनों के कुटीर थे। मधुर फलों के वृक्षों से वे स्थान और भी सुन्दर एवं सुविधाजनक बन गए। ये दोनों भाई अपनी-अपनी तपोभूमि में तप करते और यथा अवसर आपस में मिलते-जुलते थे। एक दिन लिखित भूखे थे। वे भाई के आश्रम में गये और वहाँ से कुछ फल तोड़ लाये। उन्हें खा रहे थे कि शंख भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने पूछा ये फल तुम कहाँ ...