परिश्रम व भाग्य
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परिश्रम व भाग्य
एक मन्दिर में एक सरल सहज पुजारी थे। जब भी दर्शनार्थ मन्दिर जाओ तो ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहे हों। हर आध्यात्मिक विषय पर बात करने में उन्हें बहुत मज़ा आता। कई बार उन्हें कहा कि महाराज! देर हो जाती है। जल्दी चरणामृत दे दिया करें। पर उनकी बातें ख़त्म ही नहीं होती।
एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई। तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो, आज उनके ज्ञान व अनुभव का ही लाभ उठा लेते हैं। मैंने विनम्रता से एक सवाल कर दिया।
मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?
और उनके ज़वाब से मेरे दिमाग़ के सारे द्वन्द्व ही दूर हो गए। कहने लगे कि आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा न? उसकी चाबियां ही इस सवाल का जवाब है। हर लॉकर की दो चाबियां होती हैं। एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास।
आप के पास जो चाबी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली है भाग्य। जब तक दोनों चाबियां नहीं लगती, लॉकर का ताला नहीं खुल सकता। आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान का रूप।
आप को अपनी चाबी हर समय लगाए रखना चाहिये। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे और हम लॉकर को खोल सकें। कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्य वाली चाबी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाबी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये।
उस दिन के बाद हमारे सारे भ्रम दूर हो गए। यदि परिश्रम के बाद भी सफ़लता नहीं मिलती, तो समझो कि हमारी भाग्य वाली चाबी लगने का समय नहीं आया और हमने परिश्रम की चाबी लगाई ही नहीं, तो केवल भाग्य से भी किस्मत का ताला खुलने वाला नहीं है।
सच है भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए परिश्रम के अतिरिक्त कोई अन्य शॉर्टकट रास्ता नहीं है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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