कर्मफल का विधान
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कर्मफल का विधान
भगवान ने नारद जी से कहा - आप भ्रमण करते रहते हो कोई ऐसी घटना बताओ जिसने तम्हे असमंजस में डाल दिया हो।
नारद जी ने कहा - प्रभु! अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूँ। वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था। तभी एक चोर उधर से गुजरा। गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका। उलटे उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर उसे सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिल गई।
थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया और उसे चोट लग गयी। भगवन्! बताइए यह कौन-सा न्याय है।
भगवान मुस्कुराए। फिर बोले - नारद यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खज़ाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिली।
वहीं उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय को बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसकी मृत्यु एक छोटी-सी चोट में बदल गई। इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है। अच्छे काम करके मनुष्य अपने बुरे कर्मों के फल को भी सौभाग्य में बदल सकता है और बुरे काम करके अच्छे कर्मों का भी अच्छा फल प्राप्त करने से वंचित रह जाता है।
अब नारद जी कर्मफल का ऐसा विधान जान कर पूर्णतया संतुष्ट थे।
सार - सदा अच्छे कर्म में ही प्रवृत्त रहना चाहिए।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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