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क्षमा का दीप जलाएं

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 क्षमा का दीप जलाएं Image by Couleur from Pixabay एक दिन स्कूल की शिक्षिका ने अपने क्लास में बच्चों के साथ एक प्रयोग करने का निश्चय किया। शिक्षिका ने अपने बच्चों को कहा कि वे अपने साथ एक प्लास्टिक की थैली में कुछ आलू लेकर आएं और हर एक आलू पर उस इंसान का नाम लिखें जिससे वे नफरत करते हैं। दूसरे दिन हर एक बच्चा, वे जितने लोगों से नफरत करते थे, उतने आलू प्लास्टिक की थैली में डालकर अपने साथ स्कूल में ले आए। कुछ बच्चे अपनी थैली में दो, तीन या कुछ पांच आलू लाए। शिक्षिका ने बच्चों से कहा कि दस दिन तक वे आलू से भरी थैली पूरी तरह से बंद करके हर वक्त, हर जगह अपने साथ रखें। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, बच्चों ने सड़े हुए आलू की दुर्गंध की शिकायत करनी शुरू कर दी। जिन बच्चों के पास पांच आलू थे, उन्हें उसे उठाने की मशक्कत करनी पड़ रही थी। दस दिन बाद जब प्रयोग समाप्त हुआ तब बच्चों ने राहत की सांस ली। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा कि आपको इन आलुओं को संभाल कर रखना कैसा लगा? बच्चों ने शिकायत करते हुए कहा - हमें बदबूदार थैली अपने साथ हर जगह ले जाने में काफी तकलीफ हुई। तब शिक्षिका ने प्रयोग में...

ज्ञान पिपासु

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 ज्ञान पिपासु Image by Ralph from Pixabay एक गुरु के दो शिष्य थे। एक पढ़ाई में बहुत तेज और विद्वान था और दूसरा फिसड्डी। पहले शिष्य की हर जगह प्रशंसा और सम्मान होता था, जबकि दूसरे शिष्य की लोग उपेक्षा करते थे। एक दिन रोष में दूसरा शिष्य गुरु जी के पास जाकर बोला, “गुरुजी! मैं उससे पहले से आपके पास विद्याध्ययन कर रहा हूँ। फिर भी आपने उसे मुझसे अधिक शिक्षा दी।” गुरु जी थोड़ी देर मौन रहने के बाद बोले, “पहले तुम एक कहानी सुनो।” एक यात्री कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे प्यास लगी। थोड़ी दूर पर उसे एक कुआं मिला। कुँए पर बाल्टी तो थी लेकिन रस्सी नहीं थी, इसलिए वह आगे बढ़ गया। थोड़ी देर बाद एक दूसरा यात्री उस कुँए के पास आया। कुँए पर रस्सी न देखकर उसने इधर-उधर देखा। पास में ही बड़ी-बड़ी घास उगी थी। उसने घास उखाड़कर रस्सी बटना प्रारम्भ किया। थोड़ी देर में एक लंबी रस्सी तैयार हो गयी, जिसकी सहायता से उसने कुँए से पानी निकाला और अपनी प्यास बुझा ली। गुरु जी ने उस शिष्य से पूछा, “अब तुम मुझे यह बताओ कि प्यास किस यात्री को ज्यादा लगी थी?” शिष्य ने तुरंत उत्तर दिया कि दूसरे यात्री को। गुरु जी...

क्रोध में हार की झलक

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 क्रोध में हार की झलक Image by Uwe Jacobs from Pixabay बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ की निर्णायक थी मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाकी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया, लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनों ही विद्वानों के गले में एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, ‘ये दोनों मालाएं मेरी अनुपस्थिति में आपकी हार और जीत का फैसला करेंगी।’ यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। शास्त्रार्थ की प्रक्रिया आगे चलती रही। कुछ देर बाद देवी भारती अपना कार्य पूरा करके लौट आई। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी-बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी। सभी लोग ये देखकर हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की - हे देवी!...

परिश्रम का महत्व

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 परिश्रम का महत्व Image by Tatjana from Pixabay एक गांव में एक धनी मनुष्य रहता था। उसका नाम भैरोमल था। भैरोमल के पास बहुत खेत थे। उसने बहुत से नौकर और मज़दूर रख छोड़े थे। भैरोमल बहुत सुस्त और आलसी था। वह कभी अपने खेतों को देखने नहीं जाता था। अपने मज़दूर और नौकरों को भेजकर ही वह काम कराता था। उसके मज़दूर और नौकर मनमाना काम करते थे। वे लोग खेत पर तो थोड़ी देर काम करते थे, बाकी घर बैठे रहते थे। इधर-उधर घूमते या गप्पे लड़ाया करते थे। खेत न तो सही समय पर जोते जाते थे, न सींचे जाते थे और न उनमें ठीक से खाद पड़ती थी। खेतों में बीज भी समय पर नहीं पड़ते थे और उनकी घास (खरपतवार) तो कोई निकालता ही नहीं था। इसका नतीजा यह हुआ कि उपज धीरे-धीरे घटने लगी। थोड़े दिनों में भैरोमल गरीब होने लगा। उसी गांव में रामप्रसाद नामक एक दूसरा किसान था। उसके पास खेत नहीं थे। वह भैरोमल के ही कुछ खेत लेकर खेती करता था, किंतु था वह बहुत परिश्रमी। अपने मज़दूरों के साथ वह खेत पर जाता था और डटकर परिश्रम करता था। उसके खेत भली प्रकार जोते और सींचे जाते थे। अच्छी खाद पड़ती थी, फालतू घास निकाली जाती थी और बीज भी समय...

सत्संग

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 सत्संग Image by Couleur from Pixabay मुझे रोज सत्संग की क्या जरूरत है? एक बार एक युवक संत के पास आया और कहने लगा, ‘गुरु महाराज! मैंने अपनी शिक्षा से पर्याप्त ज्ञान ग्रहण कर लिया है। मैं विवेकशील हूँ और अपना अच्छा-बुरा भली-भांति समझता हूँ, किंतु फिर भी मेरे माता-पिता मुझे निरंतर सत्संग की सलाह देते रहते हैं। जब मैं इतना ज्ञानवान और विवेकयुक्त हूँ, तो मुझे रोज सत्संग की क्या जरूरत है?’ संत ने उसके प्रश्न का मौखिक उत्तर न देते हुए एक हथौड़ी उठाई और पास ही जमीन पर गड़े एक खूंटे पर मार दी। युवक अनमने भाव से चला गया। अगले दिन वह फिर संत के पास आया और बोला, ‘मैंने आपसे कल एक प्रश्न पूछा था, किंतु आपने उत्तर नहीं दिया। क्या आज आप उत्तर देंगे?’ संत ने पुनः खूंटे के ऊपर हथौड़ी मार दी, किंतु बोले कुछ नहीं। युवक ने सोचा कि संत हैं, शायद आज भी मौन में हैं। वह तीसरे दिन फिर आया और अपना प्रश्न दोहराया। संत ने फिर से खूंटे पर हथौड़ी चलाई। अब युवक परेशान होकर बोला, ‘आखिर आप मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? मैं तीन दिन से आपसे प्रश्न पूछ रहा हूँ।’ तब संत बोले, ‘मैं तो तुम्हें रो...

आज की प्रेरक कहानी

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 आज की प्रेरक कहानी Image by Couleur from Pixabay भगवान बुद्ध की एक भिक्षुणी शिष्या थी। उसका नाम था पटाचारा। त्रिपिटक ग्रंथ में उसकी कथा आती है। पटाचारा कुंवारी थी। किसी युवान से उसका मन लग गया। माँ-बाप के न चाहने पर भी उसने उसके साथ शादी कर ली। श्रावस्ती नगरी से बहुत दूर देश में वह अपने पति के साथ रहने लगी। कालचक्र घूमता गया। वह दो बच्चों की माता हुई। काफी वर्ष गुजरने पर पटाचारा के मन में हुआ कि कुछ भी हो, आखिर माँ-बाप बूढ़े हो गये होंगे, अब मैं अपने परिवारजनों से मिलूँ। उन माँ-बाप को रिझा लूँ, मना लूँ। पटाचारा अपने पति और दो बेटों के साथ चली श्रावस्ती नगरी की ओर। आज से 2500 साल पहले की बात है। उस समय गाड़ी-मोटरों की सुविधा न थी। लोग पैदल चलते थे। यात्रा करते-करते ये लोग घने जंगल से गुजर रहे थे। रात्रि में पति ने शयन किया और साँप ने उसे काट लिया। उसका पति मर गया। पटाचारा के सिर पर मानो एक दुःख का पहाड़ गिर पड़ा। इतना ही नहीं, रात्रि को तो पति की मृत्यु देख रही है और प्रभात में पुत्र को किसी हिंसक प्राणी ने झपट लिया। वह मौत के घाट उतर गया। अब वह इकलौते बेटे को देख कर ...

रिश्तों में बदलाव

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 रिश्तों में बदलाव आज सुबह से ही मानो घर में त्यौहार-सा माहौल लग रहा है। मम्मी जी के चेहरे की चमक और रसोई से आती पकवानों की महक दोनों की वजह एक ही है, ‘आज दोपहर को खाने (लंच) पर उनकी एक सहेली आने वाली हैं; आज घर को पूरी तरह से सजाया जा रहा है।’ कल शाम को बातों-बातों में उन्होंने बताया कि कल मेरी सहेली खाने पर आ रही है, तो उन्हीं के लिए उपहार खरीदने हम बाज़ार निकल गए। उन्होंने बाज़ार से बड़ी महंगी-सी साड़ी खरीदी अपनी सहेली के लिए। आज तो हद ही हो गई, मम्मी जी खुशी के मारे सुबह जल्दी उठकर मुझसे भी पहले रसोई में घुस गई और बड़े प्यार और जतन के साथ खुद से तैयार की हुई पकवानों की लिस्ट में से एक के बाद एक पकवान बनाना भी शुरू कर दिया। मम्मी जी तो खूब खुश नजर आ रही हैं पर मैं बेमन, बनावटी मुस्कान चेहरे पर सजाए काम में उनका हाथ बंटा रही हूँ। मायके में मेरी माँ का आज जन्मदिन है। शादी के बाद यह माँ का पहला ऐसा जन्मदिन होगा, जब कोई भी उनके साथ नहीं होगा। अब मैं यहाँ, पापा ऑफिस टूर पर और भाई तो है ही परदेस में। कल मन को बड़ा मजबूत करके मायके जाने के लिए खुद को तैयार किया था। मम्मी जी से ...

वास्तविक कला

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 वास्तविक कला Image by Hans from Pixabay गिद्धों का एक झुण्ड खाने की तलाश में भटक रहा था। उड़ते-उड़ते वे एक टापू पर पहुँच गए। वह जगह उनके लिए स्वर्ग के समान थी। हर तरफ खाने के लिए मेंढक, मछलियाँ और समुद्री जीव मौजूद थे और इससे भी बड़ी बात यह थी कि वहाँ इन गिद्धों का शिकार करने वाला कोई जंगली जानवर नहीं था और वे बिना किसी भय के वहाँ रह सकते थे। युवा गिद्ध कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे। उनमें से एक बोला, “वाह! मजा आ गया। अब तो मैं यहाँ से कहीं नहीं जाने वाला। यहाँ तो बिना किसी मेहनत के ही हमें बैठे-बैठे खाने को मिल रहा है।” बाकी गिद्ध भी उसकी हाँ में हाँ मिला ख़ुशी से झूमने लगे। सबके दिन मौज-मस्ती में बीत रहे थे लेकिन झुण्ड का सबसे बूढ़ा गिद्ध इससे खुश नहीं था। एक दिन अपनी चिंता जाहिर करते हुए वह बोला, “भाइयों! हम गिद्ध हैं, हमें हमारी ऊँची उड़ान और अचूक वार करने की ताकत के लिए जाना जाता है। पर जबसे हम यहाँ आये हैं, हर कोई आराम तलब हो गया है। ऊँची उड़ान तो दूर, ज्यादातर गिद्ध तो कई महीनों से उड़े तक नहीं हैं और आसानी से मिलने वाले भोजन की वजह से अब हम सब शिकार करना भी भूल रहे ह...