क्षमा का दीप जलाएं

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क्षमा का दीप जलाएं

Image by Couleur from Pixabay

एक दिन स्कूल की शिक्षिका ने अपने क्लास में बच्चों के साथ एक प्रयोग करने का निश्चय किया। शिक्षिका ने अपने बच्चों को कहा कि वे अपने साथ एक प्लास्टिक की थैली में कुछ आलू लेकर आएं और हर एक आलू पर उस इंसान का नाम लिखें जिससे वे नफरत करते हैं।

दूसरे दिन हर एक बच्चा, वे जितने लोगों से नफरत करते थे, उतने आलू प्लास्टिक की थैली में डालकर अपने साथ स्कूल में ले आए।

कुछ बच्चे अपनी थैली में दो, तीन या कुछ पांच आलू लाए।

शिक्षिका ने बच्चों से कहा कि दस दिन तक वे आलू से भरी थैली पूरी तरह से बंद करके हर वक्त, हर जगह अपने साथ रखें।

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, बच्चों ने सड़े हुए आलू की दुर्गंध की शिकायत करनी शुरू कर दी। जिन बच्चों के पास पांच आलू थे, उन्हें उसे उठाने की मशक्कत करनी पड़ रही थी।

दस दिन बाद जब प्रयोग समाप्त हुआ तब बच्चों ने राहत की सांस ली।

शिक्षिका ने बच्चों से पूछा कि आपको इन आलुओं को संभाल कर रखना कैसा लगा?

बच्चों ने शिकायत करते हुए कहा - हमें बदबूदार थैली अपने साथ हर जगह ले जाने में काफी तकलीफ हुई।

तब शिक्षिका ने प्रयोग में छिपे हुए राज से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि यही आप के मन-मस्तिष्क की अवस्था होती है, जब आप अपने दिल में किसी के प्रति नफरत लेकर जीते हैं। बदबूदार दुर्गंध जैसी नफरत आपके हृदय को दूषित करती है। आप दस दिन तक भी इस दुर्गंध को नहीं झेल पाए, तो सोचिए किसी से नफरत, क्रोध भरी बदबू को अपने हृदय में कई दिनों तक कैसे रख पाते हैं? इसलिए दूसरों को क्षमा करने में ही समझदारी है।

यह कहानी दर्शाती है कि इंसान भी अपने मन में लोगों के प्रति नफरत लेकर घूमते हैं, जिसे वे उम्र भर अपने साथ रखते हैं, जबकि उसे अपने अंदर क्षमा मांगने और करने का गुण विकसित करना चाहिए। क्षमा करना यानी सामने वाले से गलती होने पर भी उसे उसकी गलती की सजा न देते हुए, उसके साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार को जारी रखना। जब किसी को क्षमा नहीं कर पाते, तो अंदर दिन भर नफरत के ही विचार चलते रहते हैं, जो हमारी प्रसन्नता को छीन लेते हैं। इसलिए प्रसन्नता प्राप्त करने का एक ही उपाय है कि अपने मन से नफरत के विचारों को साफ करें और क्षमा का भाव धारण करें।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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