राम वनवास
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रामायण के प्रसंगः आज के सन्दर्भ में
राम वनवास
सारी अयोध्या में उत्सव का माहौल था। कल रामचंद्र जी का राजतिलक होगा।
अरे! राम-राज्य हो जाएगा अयोध्या में, इससे बढ़कर खुशी की बात क्या हो सकती है?
सब नाच रहे थे, गा रहे थे। हर तरफ बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के मन में उल्लास था।
लेकिन विधि के विधान का किसी को ज्ञान नहीं था। रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने पूर्व इच्छित वरदान के बदले अपने बेटे भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था।
पर दूसरे वरदान ने तो सब के अरमानों को धराशायी कर दिया।
‘रानी! तुम यह क्या मांग रही हो? राम के लिए 14 वर्ष का वनवास! अपन जिगर के टुकड़े को राजमहल से निष्कासित कर दूँ? और वह भी 14 वर्ष के लिए?’
रानी अपने वरदानों की पूर्ति कराने के लिए पूर्णतया कटिबद्ध थी। राजा दशरथ के समझाने का उस पर कोई प्रभाव नहीं हुआ और वह काले अध्याय को लिखने के लिए काले वस्त्र पहन कर कोप भवन में जा कर बैठ गई।
अंततः राजा को अपनी स्वीकृति देनी पड़ी लेकिन हाय! वही स्वीकृति उसका काल बन गई।
राजा के महल से केवल राम का ही वनवास नहीं हुआ, राजा के तन से उसके प्राणों को भी देह छोड़ कर जाना पड़ा।
हाहाकार मच गया अयोध्या में!
राम सीता व लक्ष्मण के साथ वन के लिए गमन कर गए।
माता कौशल्या चित्रकूट में राम से मिलने गई। म्लान मुख, श्वेत साढ़ी का परिधान सब के चित्त को उद्वेलित कर रहा था।
माता ने जैसे ही राम को देखा तो अपने मन की सारी शिकायतें उसके सामने उड़ेल दीं।
‘राम! तुम तो जगत के पालनहार माने जाते हो। भगवान हो न तुम तो!
तुम्हें तो मालूम होगा कि तुम्हारे वन गमन की पीड़ा को तुम्हारे पिता सहन नहीं कर पाएंगे!
फिर तुम उन्हें इस अवस्था में रोते हुए छोड़ कर कैसे चले आए?
तुम तो तीन लोक के ज्ञाता हो न! तुम्हें तो ज्ञात ही होगा कि तुम्हारी माताएँ वैधव्य का जीवन कैसे जी पाएंगी!
जब वे श्वेत परिधान में तुम्हारे सामने आएंगी तो क्या तुम स्वयं को माफ कर पाओगे?
तुम्हारी स्वीकृति के बिना तो दुनिया में पत्ता भी नहीं हिल सकता। यमराज भी तुम्हारे पिता के प्राण लेने से पहले तुम्हारी रजामंदी लेने आया होगा न! तुमने उसके कागज़ पर हस्ताक्षर कैसे कर दिए?
भगवान की माता होने के बाद भी हमें तुमसे क्या सुख मिला?
ऐसे जगत-पूज्य की माता बनने के बाद भी हम पति-विहीना का जीवन जीने के लिए विवश हो गए।
क्यों? क्यों?? क्यों???’
राम का हृदय इन हृदय-विदारक शब्दों को सुनकर अपनी भावनाओं के उद्रेक को रोकने में असमर्थ हो रहा था, पर वे शांत स्वरों में माता को सान्त्वना देते हुए कहने लगे -
‘कर्म की गति टारे नहीं टरे।’
माता! शायद आपको याद होगा कि एक बार पिताजी शिकार खेलने जंगल में गए थे। उन्हें शब्द-भेदी बाण चलाने में महारत हासिल थी। तभी एक तालाब पर उन्हें किसी पशु के पानी पीने के समान आवाज़ सुनाई दी और उन्होंने बिना एक पल गंवाए बाण चला दिया।
प्रत्युत्तर में उन्हें किसी मानव के कराहने की आवाज़ सुनाई दी। वे तुरंत उस आवाज़ की दिशा में दौड़े।
वहाँ एक युवक पानी का कलश भरने की कोशिश में उनके बाण से घायल होकर कराह रहा था।
पिताजी ने उससे परिचय पूछा तो उसने कहा कि मेरा नाम श्रवण कुमार है।
मैं अपने दृष्टिविहीन माता-पिता को चारों धाम की यात्रा करवाने के लिए भ्रमण कर रहा था। अब मेरा बचना मुश्किल है। कृपया आप मेरे माता-पिता को पानी अवश्य पिला दें ताकि उनकी प्यास बुझ सके।
पिताजी को अपने कृत्य पर बहुत पश्चाताप हुआ पर अब तो तीर कमान से निकल चुका था।
जब वे श्रवण कुमार के माता-पिता के पास पानी का कलश लेकर गए तो उसके पिता ने पदचाप से पहचान लिया कि यह पानी लाने वाला उनका बेटा नहीं है।
उनके बार-बार पूछने पर राजा दशरथ ने अपना मुख खोला और भारी मन से सारी घटना का हाल कह सुनाया।
श्रवण कुमार के पिता ने उस असहनीय दुःख व क्रोध से वशीभूत होकर पिताजी को श्राप दिया था कि जिस प्रकार मैं अपने पुत्र के वियोग में दुःखी हृदय से अपने प्राण त्याग रहा हूँ, उसी प्रकार तुम भी एक दिन पुत्र-वियोग में मृत्यु को प्राप्त करोगे।
माता! पिताजी का अन्त काल पहले से ही अभिशप्त हो चुका था और उस कर्म-फल को बदलने की शक्ति तो स्वयं भगवान में भी नहीं हो सकती।
अतः उसे विधि का विधान समझ कर सहन करना ही श्रेयस्कर होगा।
आज के सन्दर्भ में -
हम सभी को आज भी यह घटना अक्षरशः याद है।
ज़रा अपनी ओर देखो और स्वयं से कुछ प्रश्न पूछो।
क्या हम भगवान राम जैसे पुत्र की माता हैं, जिन्होंने सबको मर्यादा में रहना सिखाया था?
क्या हम राम-लक्ष्मण जैसे पुत्रों के पिता हैं, जिनके लिए पिता का आदेश ही नहीं, उनके द्वारा दिए गए वचन की लाज रखना भी आदेश से कम नहीं था?
फिर आज हम छोटी-छोटी बातों को लेकर अपने ही परिवार के सदस्यों पर कोर्ट में मुकदमा करने क्यों चल पड़ते हैं?
हमें खुश रहने के लिए सहनशील बनना ही होगा।
अपने कर्म अच्छे होंगे तो उसका फल भी अच्छा ही मिलेगा।
कर्म-फल को भोगने के लिए तो स्वयं भगवान भी विवश थे, तो हम उसका कारण दूसरे को क्यों समझते हैं?
स्वयं को सुधारने से सारे काम सुधर जाएंगे, इस नियम पर दृढ़ विश्वास करेंगे, तभी हम सब सच्ची खुशी प्राप्त कर सकेंगे।
राम-राज्य की कल्पना करना आसान है, राम-राज्य लाना बहुत मुश्किल है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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