सहनशीलता - सुख का आधार

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दुःख को सुख में बदलने की कला

सहनशीलता - सुख का आधार (प्रेरणात्मक लेख)

Image by Lee_seonghak from Pixabay

एक युवक लोहार की कार्यशाला में गया, जहाँ वह लोहे को तपाकर निहाई पर रख कर घन के प्रहार से उसे मनचाहे आकार में मोड़ रहा था। फालतू लोहे के टुकड़े इधर-उधर बिखरे हुए थे। युवक ने लोहार से पूछा कि आप लोहे पर घन की चोट करते हो, तो वह टुकड़ों में टूट जाता है, लेकिन जिस निहाई पर रख कर घन चलाते हो, वह तो नहीं टूटती। इसका क्या कारण है? लोहार ने कहा कि यह ज़मीन में गड़ी हुई है और स्वयं को डावाँडोल नहीं होने देती। इसने सहन करना सीख लिया है। इसमें बाहर के प्रहार सहन करने की शक्ति आ गई है। यह घन का प्रहार सह कर भी लोहे को सही आकार प्रदान कर सकती है।

हमें घन की तरह प्रहार करने वाला नहीं, निहाई की तरह प्रहार सहने वाला बनना चाहिए। तभी हमारी आत्मा में औरों को सही दिशा दिखाने की ताकत आएगी। समर्थ बनना है तो सहन करो। गर्म लोहा बनोगे तो हथौड़े से पीट-पीट कर टुकड़े कर दिए जाओगे और सहनशील बनोगे तो निहाई की तरह अटूट बने रहोगे।

स्वयं को ऊँचा उठाने के लिए Tolerance Power का होना बहुत आवश्यक है।

आपने एक वृक्ष को देखा होगा, जो अडिग रह कर सर्दी-गर्मी, धूप-बारिश, आंधी-तूफ़ान सब कुछ सहन करता रहता है। स्वयं धूप में खड़ा रहकर सबको छाया देता है, पत्थर खाकर भी सबको फल देता है और उनकी भूख मिटाता है।

हमें कहना आता है, सहना नहीं आता। जीवन में दुःख, दुर्व्यवहार, दुर्वचन और दुःप्रसंग ऐसे ही पत्थर हैं, जो रोज़ हम पर पड़ते हैं।

1. दुःख - यह संसार दुःखों का घर है। सबसे पहले तो जन्म की पीड़ा ही कम दुःखदायक नहीं होती। उसके बाद बीमारीजन्य, विपत्तिजन्य, परिस्थितिजन्य दुःखों का सामना करने में ही सारा जीवन चला जाता है। हम यह तो जानते हैं कि हम चाहें या न चाहें, जीवन में दुःख तो आएंगे ही। इन्हें कोई नहीं टाल सकता।

दुःख आए हैं तो देर-सवेर परिस्थिति बदलने के बाद चले भी जाएंगे। तो क्यों न सहन करने की आदत डाल लें? रोना-धोना करके वे कम नहीं होंगे बल्कि और भी अधिक कष्ट देकर जाएंगे। मन में यह धारणा बिठा लें कि ये हमारे बुरे कर्मों का ही परिणाम है। सामने वाला तो केवल निमित्त बन कर आया है।

‘सुख दुःख दोनों रहते जिसमें, जीवन है वह गांव।

ऊपर वाला पासा फेंके, नीचे चलते दांव।।

कभी धूप, कभी छांव.............’

जब हिसाब-किताब पूरा हो जाएगा, तो अच्छे दिन भी आएंगे।

आपने अभिनेता को देखा होगा। कभी उसे राजा का पार्ट मिलता है और कभी भिखारी का। वह तटस्थ भाव से दोनों का अभिनय करता है। राजा बन कर उसे किसी सुख का अनुभव नहीं होता और भिखारी बन कर कोई दुःख नहीं। क्योंकि वह अपने अन्तर्मन में जानता है कि मैं इनमें से कोई भी नहीं हूँ। हम उसके भिखारी के अभिनय को देखकर भले ही रोने लगें, पर उसे कोई दुःख नहीं होता। 

उसे पता है कि यह Role है, Real नहीं।

हमारे जीवन का Director कर्म है और वही हमें सुख-दुःख का Part देता है, Play करने के लिए। जिस दिन संसार के रंगमंच को छोड़कर बाहर जाएंगे, उसी दिन Part बदल जाएगा। इस संसार को एक नाटक की तरह देखो और इसमें ना अटको। अपना सम्बन्ध स्वयं के साथ, निजात्मा के साथ जोड़े रखो।  

2. दुर्व्यवहार - बाहर से आने वाले दुःखों को सहन करने की शक्ति तो फिर भी पैदा की जा सकती है, लेकिन कोई हमारे साथ बुरा व्यवहार करे, तो क्या करें? बुरा व्यवहार न भी करे पर हमारे प्रति उपेक्षा का भाव रखे, तो भी हम सहन नहीं कर पाते। मान लो रास्ते में कोई परिचित मिल जाए और हम उसे देख कर Smile Pass करें लेकिन वह उसका Response न दे तो हम सोचते हैं कि अच्छा! इतना घमंड हो गया कि पहचानता भी नहीं। एक Smile ही दे देता तो क्या हो जाता?

यह भी तो हो सकता है कि उसने देखा ही न हो या वह किसी परेशानी में हो। हमने न जाने ऐसी कितनी स्मृतियां अपने दिमाग़ में इकट्ठी की हुई हैं, जो हमारे दुःखों का कारण बनती हैं। सोचो कि इससे नुकसान होगा तो हमारा ही होगा, उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

यदि हम किसी के दुर्व्यवहार की प्रतिक्रिया स्वरूप ईर्ष्या, विद्वेष के भाव रखते हैं तो समझो कि हम और दुःखों को निमंत्रण दे रहे हैं। जीवन की सफलता टकराव में नहीं, ठहराव में है।

3. दुर्वचन - मनुष्य एक बार बाण के घाव सहन कर सकता है, पर वाणी का घाव जन्म-जन्मांतरों तक भी टीस देता रहता है। यदि कोई बात-बात में विवाद करे, अपशब्द बोले तो समझो कि यह अपने होश में नहीं है, इसलिए ऐसा बोल रहा है। वह हमें गाली दे रहा है लेकिन हम लेंगे ही नहीं तो उसकी उसके पास ही रह जाएंगी। अपने कानों तक पहुँचने ही न दो। आजकल गाली देने वाला उतना तत्पर नहीं होता, जितनी लेने वाले को उतावली होती है। उसका स्वभाव बन चुका है गाली देने का। उसके शब्दों से अपनी सुरक्षा आप को स्वयं ही करनी होगी।

4. दुःप्रसंग - जीवन में हर समय मनचाहा नहीं, अनचाहा ही अधिक होता है। किसी इष्ट का वियोग, दुर्घटना, लाइलाज बीमारी आदि हमारे ही दुष्कर्मों का प्रतिफल है। विचलित होने से हम ऐसे प्रसंगों को टाल नहीं सकते।

बुरे समय में ही Tolerance की परीक्षा होती है। इसके लिए हमें कुछ बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना होगा।

1. कर्म-सिद्धांत पर अटल विश्वास से सहन शीलता बढ़ती है।

2. निज आत्मा के स्वरूप का भान हर समय रखो।

3. हर समस्या के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखो।

4. Ignore करने का अभ्यास बढ़ाओ।

वास्तविकता तो यह है कि आधुनिक सुख-सुविधाओं ने हमारी सहनशक्ति को सबसे अधिक प्रभावित किया है। एक बार मुंबई में बाढ़ आई तो Local Trains भी आगे नहीं जा सकी और सैंकड़ों यात्री उनमें फंस गए। जानते हो, सबसे अधिक कष्ट में A.C. Coach के यात्री थे जिनका बिजली जाने के कारण A.C. बंद हो गया था।

सुख-सुविधाओं पर अत्यधिक निर्भरता भी सहनशीलता में बाधक है।

स्वयं को निहाई की तरह मज़बूत बनाओ और अपने जीवन को सफल बनाओ।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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