जीवन बीमा

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जीवन बीमा

Image by kie-ker from Pixabay

दो मित्र थे। बहुत परिश्रमी और सात्विक। अपने परिश्रम से दोनों एक दिन बड़े सेठ बन गए। दोनों ने बड़ा व्यवसाय खड़ा कर लिया।

पहले सेठ ने अपनी सारी संपत्ति का बीमा करवा लिया। अब वह अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा की ओर से निश्चिन्त हो गया था। उसने अपने मित्र को बार-बार यही परामर्श दिया कि वह भी अपनी सम्पत्ति का बीमा करवा ले। परन्तु दूसरे मित्र ने उसकी बात को अनसुना कर दिया।

दुर्भाग्य से एक दिन उनके गोदाम में आग लग गई। दोनों की सारी संपत्ति जल कर राख हो गई। पहले सेठ ने बीमा करवा रखा था इसलिये उसे सारी संपत्ति की कीमत वापिस मिल गई जबकि दूसरा मित्र निर्धन बन गया। मगर हाथ मलने के अतिरिक्त उसके पास कोई चारा नहीं बचा था।

मनुष्य का यह जन्म भी सेठ की संपत्ति के समान है। हम सभी को मालूम है कि एक दिन इस शरीर को भस्म होना है मगर हम हैं कि जीवन के इस अटल सत्य को जानकर भी अनसुना कर देते हैं। हम इसका कभी बीमा नहीं करवाते।

न सत्कर्म करते हैं, न धर्म के अभ्यास और वैराग्य द्वारा मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करते हैं, न योग मार्ग के पथिक बनते हैं, न ईश्वर का साक्षात्कार करते हैं। इसके विपरीत भोग, दुराचार, पाप, राग-द्वेष, ईर्ष्या, अभिमान, अहंकार, असत्य आदि के चक्कर में अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा देते हैं।

वेद में अनेक मंत्रों के माध्यम से जन्म-मरण और मुक्ति की पवित्र शिक्षा को समझाया गया है -

शरीर रूप बंधन में आकर जीवात्मा जहाँ-तहाँ भटकता है - वेद

शरीर नश्वर है। इसके रहते हुए जो श्रेष्ठ कर्म किया जा सके कर ले। अपने को संभाल कर परमात्मा का स्मरण कर - वेद

जीवात्मा वासना वश ऊँची नीची योनियों में शरीर धारण करता है। शरीर अस्थिर है - वेद

मैं नश्वर कच्चे घर (शरीर) में फिर न आऊं - वेद

हमें नश्वर शरीर की प्राप्ति न हो। सर्वथा अखंड सुख-सम्पत्ति अर्थात् मुक्ति की प्राप्ति हो।

सदैव प्रसन्न रहिए।

जो प्राप्त है - पर्याप्त है!!

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

Comments

  1. आपका लेख अति उत्तम है आ आपका लेख आपका लेख अति उत्तम है आपका लेख अति उत्तम हैका लेख अति उत्तम है केवल

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  2. आपका लेख अति उत्तम है केवल अपने श्रेष्ठ कर्मों द्वारा ही सद्गति को प्राप्त कर सकते हैं

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