निंदा का फल
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निंदा का फल
Image by Pezibear from Pixabay
एक बार की बात है। किसी राजा ने यह फैसला लिया कि वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाया करेगा। एक दिन खीर वाले दूध में सांप ने मुंह डाला और दूध विषाक्त हो गया। उस ज़हरीली खीर को खाकर 100 के 100 अंधे व्यक्ति मर गए।
राजा बहुत परेशान हुआ कि मुझे 100 आदमियों की हत्या का पाप लगेगा।
राजा परेशानी की हालत में अपने राज्य को छोड़कर जंगल में भक्ति करने के लिए चल पड़ा। ताकि इस पाप की माफ़ी मिल सके।
रास्ते में एक गांव आया। राजा ने चौपाल में बैठे लोगों से पूछा कि क्या इस गांव में कोई भक्ति भाव वाला परिवार है ताकि उसके घर रात काटी जा सके?
चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गांव में दो बहन-भाई रहते हैं जो खूब बंदगी करते हैं। राजा उनके घर रात को ठहर गया।
सुबह जब राजा उठा तो लड़की प्रभु-सिमरन के लिए बैठी हुई थी। इससे पहले लड़की का रूटीन था कि वह दिन निकलने से पहले ही भक्ति करके उठ जाती थी और नाश्ता तैयार करती थी। लेकिन उस दिन वह लड़की बहुत देर तक सिमरन पर बैठी रही।
जब लड़की सिमरन से उठी तो उसके भाई ने कहा कि बहन तूने इतनी देर लगा दी। अपने घर मुसाफ़िर आया हुआ है। इसने नाश्ता करके दूर जाना है। तुझे सिमरन से जल्दी उठना चाहिए था।
तो लड़की ने जवाब दिया कि भैया! ऊपर भगवान के पास एक गंभीर मामला उलझा हुआ था। धर्मराज को उस उलझन भरी स्थिति पर कोई फैसला लेना था और मैं वह फैसला सुनने के लिए रुक गयी थी। इसलिए देर तक बैठी रही सिमरन पर।
उसके भाई ने पूछा कि ऐसी क्या बात थी?
तो लड़की ने बताया कि फलां राज्य का राजा अंधे व्यक्तियों को खीर खिलाया करता था। लेकिन सांप के द्वारा दूध में विष डालने से 100 अंधे व्यक्ति मर गए। अब धर्मराज को समझ नहीं आ रहा कि अंधे व्यक्तियों की मौत का पाप राजा को लगे, सांप को लगे या दूध बिना ढके छोड़ने वाले रसोइए को लगे।
राजा भी उनकी बातें सुन रहा था। राजा को अपने से संबंधित बात सुन कर दिलचस्पी हो गई और उसने लड़की से पूछा कि फिर क्या फैसला हुआ?
लड़की ने बताया कि अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया था।
राजा ने पूछा कि क्या मैं आपके घर एक रात के लिए और रुक सकता हूँ?
दोनों बहन-भाई ने खुशी से उसको ‘हां’ कर दी।
राजा अगले दिन के लिए रुक गया। लेकिन चौपाल में बैठे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि कल जो व्यक्ति हमारे गांव में एक रात रुकने के लिए आया था और कोई भक्ति भाव वाला घर पूछ रहा था, उस की भक्ति का नाटक तो सामने आ गया है। रात काटने के बाद भी वह इसलिए नहीं गया क्योंकि जवान लड़की को देखकर उस व्यक्ति की नीयत खोटी हो गई। इसलिए वह उस सुन्दर और जवान लड़की के घर पक्के तौर पर अधिक दिन तक ठहरेगा या फिर लड़की को लेकर भागेगा।
दिन भर चौपाल में उस राजा की निंदा होती रही।
अगली सुबह लड़की फिर सिमरन पर बैठी और रूटीन के टाइम अनुसार सिमरन से उठ गई।
राजा ने पूछा, “बेटी अंधे व्यक्तियों की हत्या का पाप किसको लगा?”
लड़की ने बताया कि “वह पाप तो हमारे गांव के चौपाल में बैठने वाले लोग बांट कर ले गए।”
यह सुनकर राजा के मन का बोझ उतर गया। जो पाप उसने किया ही नहीं, उसका फल उसे कैसे मिलेगा?
वास्तव में निंदा करना कितना घाटे का सौदा है। निंदक हमेशा दूसरों के पाप अपने सिर पर ढोता रहता है और दूसरों के द्वारा किए गए उन पाप-कर्मों के फल को भी भोगता है।
अतः हमें सदैव निंदा से बचना चाहिए।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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