अनुकरणीय शिक्षण का संदेश

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अनुकरणीय शिक्षण का संदेश

Image by For commercial use, some photos need attention. from Pixabay

एक बार एक व्यक्ति की उसके बचपन के टीचर से मुलाकात होती है। वह उनके चरण स्पर्श करके अपना परिचय देता है। वे बड़े प्यार से पूछती हैं - ‘अरे वाह! आप मेरे विद्यार्थी रहे हैं। अभी क्या करते हो। क्या बन गए हो?’

‘मैं भी एक टीचर बन गया हूँ,’ वह व्यक्ति बोला, ‘और इसकी प्रेरणा मुझे आपसे ही मिली थी, जब मैं 7 वर्ष का था।’ उस टीचर को बहुत आश्चर्य हुआ। वे बोली कि, ‘मुझे तो आपकी शक्ल भी याद नहीं आ रही है। उस उम्र में मुझसे कैसी प्रेरणा मिली थी?’

वह व्यक्ति कहने लगा - ‘यदि आपको याद हो तो जब मैं चौथी क्लास में पढ़ता था, तब एक दिन सुबह-सुबह मेरे सहपाठी ने उस दिन उसकी महंगी घड़ी चोरी होने की आपसे शिकायत की थी। आपने क्लास का दरवाज़ा बन्द करवाया और सभी बच्चों को क्लास में पीछे एक साथ लाइन में खड़ा होने को कहा था। फिर आपने सभी बच्चों की जेबें टटोली थी। मेरी जेब से आपको घड़ी मिल गई थी जो मैंने चुराई थी। पर चूंकि आपने सभी बच्चों को अपनी आंखें बंद रखने को कहा था तो किसी को पता नहीं चला कि घड़ी मैंने चुराई थी।

टीचर जी! उस दिन आपने मुझे लज्जा व शर्म से बचा लिया था और इस घटना के बाद कभी भी आपने अपने व्यवहार से मुझे यह नहीं लगने दिया कि मैंने एक ग़लत कार्य किया था। आपने बगैर कुछ कहे मुझे क्षमा भी कर दिया और दूसरे बच्चे मुझे चोर कहते इससे भी बचा लिया था।’

यह सुनकर टीचर बोली, ‘मुझे भी नहीं पता था बेटा कि वह घड़ी किसने चुराई थी।’

वह व्यक्ति बोला, ‘नहीं टीचर। यह कैसे संभव है? आपने स्वयं अपने हाथों से चोरी की गई घड़ी मेरे जेब से निकाली थी।’

टीचर बोली, ‘बेटा! मैं जब सबके पॉकेट चेक कर रही थी, उस समय मैंने कहा था कि सब अपनी आंखें बंद रखेंगे और वही मैंने भी किया। मैंने स्वयं भी अपनी आंखें बंद रखी थी।’

कितनी अनुकरणीय है आदर्श शिक्षक की प्रेरणादायक सोच! किसी को उसकी ऐसी शर्मनाक परिस्थिति से बचाने का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है? अध्यापक की इस प्रेरणा से पढ़कर अध्यापक बना वह बच्चा अपनी ग़ल्तियों के प्रति केवल दूसरे के द्वारा आँखें बंद करने का आधा संस्कार लेकर यदि जीवन में इतना बदलाव कर सकता है तो विचार कीजिये कि अनुकरणीय संदेश (आप स्वयं भी अपनी आंख दूसरे की ग़ल्तियों के प्रति बंद कर ले जिससे तुलनात्मक/आलोचनात्मक सोच आप में भी न आए) का अनुकरण कर के जीवन में कितना सृजनात्मक बदलाव किया जा सकता है।

आइए! प्रण करें कि यदि हमें किसी की कमज़ोरी मालूम भी पड़ जाए तो उसका दोहन करना तो दूर, उस व्यक्ति को ये आभास भी नहीं होने देना चाहिए कि आपको इसकी जानकारी भी है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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