हनुमान जी की चतुरता की एक अनसुनी कथा

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हनुमान जी की चतुरता की एक अनसुनी कथा

Image by Jo Spargo from Pixabay

मित्रों! ज्ञानियों की जब गणना की जाती है, तब हनुमानजी का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। जैसा कि बाबा तुलसी ने रामचरितमानस में लिखा भी है -

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं,

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

हे अतुल बल के धाम! सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले! दैत्य रूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप! ज्ञानियों में अग्रगण्य! संपूर्ण गुणों के निधान! वानरों के स्वामी! श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवन पुत्र श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

आज हम आपको इन्हीं हनुमान जी की चतुराई की एक कथा बताएंगे।

मित्रों! ऐसी पौराणिक कथा प्रचलित है कि एक समय कपिवर की प्रशंसा के आनन्द में मग्न श्री राम ने सीता जी से कहा - ‘देवी! लंका विजय में यदि हनुमान का सहयोग न मिलता तो आज भी मैं सीता वियोगी ही बना रहता।’

सीता जी ने कहा - ‘आप बार-बार हनुमान की प्रशंसा करते रहते हैं। कभी उनके बल-शौर्य की, कभी उनके ज्ञान की। अतः आज आप एक ऐसा प्रसंग सुनाइये कि जिसमें उनकी चतुराई से लंका विजय में विशेष सहायता मिली हो।’

‘ठीक याद दिलाया तुमने’, श्री राम बोले, ‘युद्ध में रावण थक गया था। उसके अधिकतर वीर सैनिकों का वध हो चुका था। अब युद्ध में विजय प्राप्त करने का उसने अन्तिम उपाय सोचा। वह था देवी को प्रसन्न करने के लिए चण्डी महायज्ञ। यज्ञ आरंभ हो गया, किंतु हमारे हनुमान को चैन कहाँ? यदि यज्ञ पूर्ण हो जाता और रावण देवी से वर प्राप्त करने में सफ़ल हो जाता तो उसकी विजय निश्चित थी। बस! तुरंत उन्होंने ब्राह्मण का रूप धारण किया और यज्ञ में सम्मिलित हुए ब्राह्मणों की सेवा करना प्रारंभ कर दिया। ऐसी निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मण अति प्रसन्न हुए। उन्होंने हनुमान से वर मांगने के लिए कहा।

पहले तो हनुमान ने कुछ भी मांगने से इनकार कर दिया। किंतु सेवा से संतुष्ट ब्राह्मणों का आग्रह देखकर उन्होंने एक वरदान मांग लिया।’

‘वरदान में क्या मांगा हनुमान ने?’ सीता जी के प्रश्न में उत्सुकता थी।

‘उनकी इसी याचना में तो चतुराई झलकती है’ श्री राम बोले, ‘जिस मंत्र को बार-बार बोला जा रहा था, उसी मंत्र के एक अक्षर का परिवर्तन हनुमान ने वरदान में मांग लिया और बेचारे भोले ब्राह्मणों ने ‘तथास्तु’ कह दिया। उसी के कारण मंत्र का अर्थ बदल गया जिससे रावण का घोर विनाश हुआ।’

‘एक ही अक्षर से अर्थ में इतना परिवर्तन!’ सीता जी ने प्रश्न किया, ‘कौन सा मंत्र था वह?’

श्री राम ने मंत्र बताया -

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।

जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते।। (अर्गलास्तोत्र - 2)

इस श्लोक में ‘भूतार्तिहारिणि’ में ‘ह’ के स्थान पर ‘क’ का उच्चारण करने का हनुमान ने वर मांगा।

‘भूतार्तिहारिणि’ का अर्थ है - ‘संपूर्ण प्रणियों की पीड़ा हरने वाली और ‘भूतार्तिकारिणि’ का अर्थ है प्राणियों को पीड़ित करने वाली।’ इस प्रकार सिर्फ एक अक्षर बदलने से रावण का विनाश हो गया।

ऐसे चतुर शिरोमणि हैं हमारे हनुमान!’ - श्रीराम ने प्रसंग को पूर्ण किया। सीताजी इस प्रसंग को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई।

मित्रों! आज के युग में हमें हनुमान की आवश्यकता है। ऐसे हनुमान की जो देशभक्त हो, ज्ञानी हो, त्यागी हो, चरित्र सम्पन्न हो और जिसमें चतुरशीलता हो।

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥

भावार्थ - श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर को तर जाएँगे।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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