हीरे का मूल्य

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हीरे का मूल्य

Image by Hans Braxmeier from Pixabay

एक कुम्हार अपनी मटकियां बेच कर अपने गधे को लेकर बाजार से लौट रहा था। उसे रास्ते पर चलते समय बड़ा हीरा पड़ा मिल गया। उसने हीरा उठा लिया, यह सोच कर कि चमकदार पत्थर है, बच्चे खेलेंगे तो ख़ुश हो जाएंगे। फिर राह में ख्याल आया कि बच्चे कहीं गवां न दें, यहां-वहां खो न दें। इससे तो अच्छा है कि गधे के गले में लटका दूँ। गधे के लिए आभूषण बन जाएगा।

अब कुम्हार के हाथ हीरा लगेगा तो गधे के गले में ही लटकेगा। और जाएगा कहाँ! उसने गधे के गले में हीरा लटका दिया। एक जौहरी अपने घोड़े पर सवार होकर आ रहा था। गधे के गले में हीरा लटकता हुआ देख कर चौंक गया। उसने बहुत हीरे देखे थे, पर ऐसा हीरा नहीं देखा था। और वह भी गधे के गले में लटका हुआ। उसने अपना घोड़ा रोक लिया।

वह समझ गया कि इस मूढ़ को हीरे की कीमत का कुछ पता नहीं है। इसलिए उसने कुम्हार से यह नहीं कहा कि इस हीरे का कितना दाम लोगे; उसने कहा कि बोल! इस पत्थर को बेचना है क्या? क्या लेगा इसका? कुम्हार ने बहुत सोचा-विचारा। फिर बहुत हिम्मत करके कहा कि आठ आने दे दें। जौहरी अच्छी तरह समझ गया कि इसे इसकी कीमत का कुछ भी पता नहीं है। आठ आने में करोड़ों का हीरा बेच रहा है। मगर जौहरी के मन में भी कंजूसी आ गई। उसने कुछ सोचा और कहा कि चार आने लेगा? चार आने में देगा क्या? इस पत्थर के आठ आने मांगते हुए शर्म नहीं आती। कुम्हार ने कहा कि फिर रहने दो। यह गधे के गले में ही ठीक है। चार आने के पीछे कौन उसके गले में पहनाए हुए चमकीले पत्थर को उतारे।

जौहरी यह सोच कर आगे बढ़ गया कि ज्यादा से ज्यादा और दो आने ले लेगा या आगे बढ़ जाऊँ तो शायद खुद ही आवाज़ देकर चार आने में दे दे। मगर उसके पीछे ही एक और जौहरी आ रहा था और उसने एक रुपये में वह पत्थर खरीद लिया।

जब तक पहला जौहरी वापस लौटा, हीरे का सौदा हो चुका था। पहले जौहरी ने कहा - अरे मूर्ख! अरे पागल कुम्हार! तुझे पता है तूने क्या किया? करोड़ों की चीज एक रुपये में बेच दी!

वह कुम्हार हंसने लगा। उसने कहा - मैं तो कुम्हार हूँ। मुझे तो पता नहीं था कि वह पत्थर करोड़ों का हीरा था। मैंने तो सोचा कि एक रुपया मिल रहा है, यही क्या कम है! महीने भर की मज़दूरी हो गई। मगर तुम्हारे लिए क्या कहूँ? तुम तो जौहरी हो। तुम आठ आने में न ले सके। करोड़ों तुमने गंवाए हैं, मैंने नहीं गंवाए। मुझे तो पता ही नहीं था।

बंधुओं! तुम्हें भी पता नहीं है कि तुम अपने हीरे जैसे जीवन में कितना गवां रहे हो। मगर तुमसे भी ज्यादा वे लोग गवां रहे हैं जिन्हें शास्त्र कंठस्थ हैं; जिन्हें वेद, उपनिषद, कुरान याद हैं; जो रोज़ हीरों की बातें कर रहे हैं। तुमसे भी ज्यादा वे गवां रहे हैं। कम से कम उन्हें तो बोध होना चाहिए।

परमात्मा की बातें बहुत होती हैं, पर खोज कोई नहीं करता। आत्मा की बातें होती हैं लेकिन ध्यान कोई नहीं करता। मंदिर में पूजा-पाठ के आयोजन होते हैं, मगर जीवन को बदलने वाली पूजा और प्रार्थना कहाँ हो पाती है। पूजा और प्रार्थना केवल क्रिया-कांड का नाम नहीं है; औपचारिकता नहीं है। यह तो स्वयं में स्वयं को खोजने का माध्यम है।

पूजा और प्रार्थना से आत्मा के पाप-प्रक्षालन की सम्यक् तैयारी करनी चाहिए। तब ही ध्यान कर सकते हैं और हीरे जैसे जन्म का मूल्य जान सकते हैं।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

Comments

  1. कितने भोले थे हमारे अनपढ़ bazurag

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