ईश्वर के दर्शन

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ईश्वर के दर्शन

Image by Mariya 💚 STAY SAFE ☘️ Take care of each other 🌍 from Pixabay

सरस्वती चंद्र तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे। लंबे और कठिन सफ़र को देखते हुए साथ में बर्तन, भोजन और ज़रूरत का अन्य सामान भी था। रास्ते में एक गांव पार करते हुए वे वहां के एक वीरान मंदिर में रुक गए। पहले तो सोचा कि यहां कोई नहीं होगा पर मंदिर के अंदर गए तो देखा, एक बीमार वृद्ध कराह रहे हैं। उनकी हालत देखकर लगता था कि उन्होंने काफ़ी दिनों से कुछ खाया न हो। सरस्वती चंद्र को उन पर दया आ गई।

उन्होंने कुछ समय वहीं रुककर उनकी सेवा करने का फैसला किया। उन्होंने अपने कपड़े उस वृद्ध सज्जन को पहना दिए। अपने सारे बर्तन मंदिर के उपयोग के लिए रख दिए। अपना भोजन भी उन्हें खिला दिया। फिर आसपास से फल और कुछ औषधियां ले आए।

खाली समय में सरस्वती चंद्र मंदिर की सफाई में लगे रहते। इस तरह मंदिर का कायाकल्प हो गया। इधर वृद्ध सज्जन धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। कुछ दिनों के बाद सरस्वती चंद्र बिना तीर्थधाम गए ही घर वापस आ गए। घर वालों ने इस तरह आने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि रास्ते में ही उन्हें ईश्वर के दर्शन हो गए थे। इसलिए आगे जाने की उन्होंने कोई आवश्यकता ही नहीं समझी और लौट आए।

मंदिर के पुनरोद्धार हो जाने से लोग भी वहाँ फिर से आने-जाने लगे। इस तरह सूने पड़े मंदिर में रौनक लौट आई। वहाँ आने-जाने वाले लोगों को और हर किसी मिलने-जुलने वाले व्यक्ति को वह वृद्ध सज्जन यह बताते थे कि एक दिन यहाँ ईश्वर आए थे। उन्होंने ही इस मंदिर को तीर्थ बनाया है और मुझे जीवन-दान दिया है।

वास्तव में ईश्वर के दर्शन करने के लिए तीर्थ पर ही जाना आवश्यक नहीं है। यदि हमारे मन में इस सृष्टि के हर प्राणी के प्रति दया का भाव है तो हमें हर प्राणी में ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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