साथी
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साथी
Image by Aleksey Kutsar from Pixabay
पिछली रात बड़ी बेचैनी से कटी। बमुश्किल सुबह एक रोटी खाकर घर से अपनी दुकान के लिए निकला। आज किसी के पेट पर पहली बार लात मारने जा रहा हूँ, यह बात अंदर ही अंदर कचोट रही थी।
ज़िंदगी में यही फ़लसफ़ा रहा मेरा कि अपने आस-पास किसी को रोटी के लिए तरसना न पड़े। पर इस विकट काल में अपने पेट पर ही आन पड़ी है तो मैं भी क्या करता।
दो साल पहले ही अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर कपड़े का शोरूम खोला था मगर दुकान के सामान की बिक्री अब आधी हो गई है। अपनी ही कपड़े की दुकान में दो लड़के और दो लड़कियों को रखा है मैंने ग्राहकों को कपड़े दिखाने के लिए। लेडीज डिपार्टमैंट की दोनों लड़कियों को निकाल नहीं सकता। एक तो कपड़ों की बिक्री उन्हीं की ज्यादा है, दूसरे वे दोनों बहुत ग़रीब हैं।
बाकी दो लड़कों में से एक पुराना है और वह घर में इकलौता कमाने वाला है और जो नया वाला लड़का है ‘दीपक’, मैंने विचार उसी पर किया है। शायद उसका एक भाई भी है जो अच्छी जगह नौकरी करता है और वह खुद तेज़तर्रार और हँसमुख भी है। उसे कहीं और भी काम मिल सकता है।
पिछले सात महीनों में मैं बिलकुल टूट चुका हूँ। स्थिति को देखते हुए एक वर्कर कम करना मेरी मज़बूरी है। यही सब सोचता हुआ मैं दुकान पर पहुँचा।
चारों आ चुके थे। मैंने चारों को बुलाया और बहुत उदास हो कर बोला, “देखो! दुकान की अभी की स्थिति तुम सब को पता है। मैं तुम सब को काम पर नहीं रख सकता।” उन चारों के माथे पर चिंता की लकीरें मेरी बातों के साथ गहरी होती चली गई। मैंने बोतल के पानी से अपने गले को तर किया - “किसी एक का हिसाब आज कर देता हूँ। दीपक! तुम्हें कहीं और काम ढूंढना होगा।”
“जी अंकल जी!”
मैंने उसे पहली बार इतना उदास देखा। लड़कियों के चेहरे पर भी कोई ख़ास प्रसन्नता नहीं थी। एक लड़की जो शायद उसी के मोहल्ले से आती है, कुछ कहते-कहते रुक गई।
“क्या बात है? बेटी! तुम कुछ कह रही थी।”
“अंकल जी! इसके भाई का भी काम कुछ एक महीने पहले छूट गया है और इसकी मम्मी बीमार रहती है।”
मेरी नज़र दीपक के चेहरे पर गई। आँखों में ज़िम्मेदारी के आँसू थे जो वह अपने हँसमुख चेहरे से छुपा रहा था। मैं कुछ बोलता कि तभी दूसरी लड़की बोल पड़ी - “अंकल जी! बुरा न मानें तो एक बात बोलूँ।”
“हाँ, हाँ बेटी! बोलो न!”
“किसी को निकालने से अच्छा है, हमारे पैसे कम कर दो। बारह हजार की जगह नौ हजार कर दो आप।”
मैंने बाकियों की तरफ देखा।
“हां साहब! हम इतने से ही काम चला लेंगे।”
बच्चों ने मेरी परेशानी को आपस में बांटने की इतनी अच्छी सोच से मेरे मन के बोझ को कम ज़रूर कर दिया था।
“पर तुम लोगों को यह कम तो नहीं पड़ेगा न!”
“नहीं साहब! कोई साथी भूखा रहे, इससे अच्छा है कि हम सब अपना निवाला थोड़ा कम कर दें।”
मेरी आँखों में आंसू छोड़ वे सभी बच्चे अपने काम पर लग गए, मेरी नज़रों में मुझसे कहीं ज्यादा बड़े बनकर।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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