बंद मुट्ठी खुली मुट्ठी

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बंद मुट्ठी खुली मुट्ठी

Image by Mariya 🌸🥀🌻🎋🌷🌹💐🌼 from Pixabay

एक आदमी के दो पुत्र थे राम और श्याम। दोनों थे तो सगे भाई पर एक दूसरे के बिलकुल विपरीत। जहाँ राम बहुत कंजूस था वहीं श्याम को फिजूलखर्ची की आदत थी। दोनों की पत्नियां भी उनकी इस आदत से परेशान थी।

घरवालों ने दोनों को समझाने के बहुत प्रयास किये पर न राम अपनी कंजूसी छोड़ता और न ही श्याम अपनी फिजूलखर्ची से बाज आता।

एक बार गाँव के करीब ही एक सिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। वृद्ध पिता ने सोचा - क्यों न उन्हीं से इस समस्या का समाधान पूछा जाए और अगले ही दिन वे महात्मा जी के पास पहुंचे।

महात्मा जी ने ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनी और अगले दिन दोनों पुत्रों को लेकर आने को कहा।

पिताजी तय समय पर पुत्रों को लेकर पहुँच गए।

महात्मा जी ने पुत्रों के सामने अपनी बंद मुट्ठियां घुमाते हुए कहा, “बताओ यदि मेरा हाथ हमेशा के लिए ऐसा ही हो जाए तो कैसा लगेगा?”

पुत्र बोले, “ऐसे में तो यह लगेगा, जैसे कि आपको कोढ़ हो।”

“अच्छा! अगर मेरे हाथ हमेशा के लिए ऐसे हो जाएं तो कैसा लगेगा?” महात्मा जी ने अपनी फैली हथेलियाँ दिखाते हुए पूछा।

“जी! तब भी यही लगेगा कि आपको कोढ़ है” पुत्र बोले।

तब महात्मा जी गंभीरता से बोले, “पुत्रों! यही तो मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ। हमेशा अपनी मुट्ठी बंद रखना यानि कंजूसी दिखाना या हमेशा अपनी हथेली खुली रखना यानि फिजूलखर्ची करना एक तरह का कोढ़ ही तो है। हमेशा मुट्ठी बंद रखने वाला धनवान होते हुए भी निर्धन ही रहता है और हमेशा मुट्ठी खुली रखने वाला चाहे जितना भी धनवान हो उसे निर्धन बनते, समय नहीं लगता। सही व्यवहार है कि कभी मुट्ठी बंद रहे तो कभी खुली तभी जीवन का संतुलन बना रहता है।”

पुत्र महात्मा जी की बात समझ चुके थे। अब उन्होंने मन ही मन सोच-समझ कर ही खर्च करने के बाद बचत करने का निश्चय किया।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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धन्यवाद।

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