भक्ति से मुक्ति

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भक्ति से मुक्ति

Image by Capri23auto from Pixabay

गुरु गोविन्द सिंह जी अपने शिष्यों के साथ जंगल के रास्ते से कहीं जा रहे थे तो रास्ते में एक बहुत बड़ा अजगर पड़ा था और उसे बहुत सी चींटियाँ खा रही थी। अजगर की आँखों से आँसू गिर रहे थे पर वह वैसे ही पड़ा हुआ था। गुरु गोविन्द सिंह जी लांघ कर आगे चले गए। पर शिष्य हैरानी से यह दृश्य देखने लगे।

उन्होंने गुरु जी से पूछा - गुरु जी! इसके पीछे क्या कारण है? इतना बड़ा अजगर और ये नन्हीं-नन्हीं चीटियाँ! यह उन से अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पा रहा?

गुरु गोविन्द सिंह जी ने कहा - ये इसके कर्मों का फल है।

शिष्य - गुरुवर! ये कौन से कर्म का फल है?

गुरुवर - इसे जब मानव जन्म मिला था तो यह एक ढोंगी गुरु की पदवी पर बैठ गया था और ये जो चीटियाँ हैं, ये सब इसके शिष्य थे। इस अजगर के जीव ने मानव तन में खुद तो ईश्वर को जाना नहीं और इन आत्माओं को भी ईश्वर की तरफ जाने से रोक कर अपने से जोड़ लिया। यह खुद तो अधोगति में गया और इन्हें भी अधोगति में ले आया। अब ये इससे हर जन्म में ऐसे ही हिसाब पूरा करेंगी। यही कर्मों का खेल है।

शिष्य - हे गुरुवर! इनकी मुक्ति का कोई उपाय नहीं है क्या?

गुरुवर - ये योनियाँ केवल किए हुए कर्मों को भोग सकती हैं। नया कर्म नहीं कर सकती।

कबहुँक करि करूना नर देहि।

देत ईस बिन हेतु सनेही।।

ईश्वर की कृपा से फिर जब कभी मानव तन मिलेगा और उस समय फिर ईश्वर के बनाए भक्ति के नियम के अनुसार जो भक्ति करेगा, वही मुक्त हो पायेगा।

गोविन्द मिलन की ऐह तेरी बरिया।

भई परापत मानख देहरिया।।

कहा गया है -

लोभी गुरु, लालची चेला। 

नरक मे होये ठेलम ठेला।।

अतः यों ही नहीं कहा जाता -

नर तेरा चोला, रतन अमोला, विरथा खोवै मत न।  

भाई तन्नै देह मिली है नर की, इसमैं भगति कर लै हर की।

सुधबुध भूल गया उस घर की, इसमैं सोवै मत न।।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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