देना ही लेना
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देना ही लेना
Image by fred prose from Pixabay
एक राजा के राज्य में एक फ़कीर रहता था। राजा का रोज़ाना का नियम था कि सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक अपने खज़ाने से ग़रीबों व भिख़ारियों को दान किया करता था अर्थात खज़ाना, पैसा आदि बांटा करता था। जिससे उस राजा को बहुत खुशी मिलती थी। एक फ़कीर रोज़ आता था और लाइन में लग जाता था। जो भी उससे पहले खड़े होते थे या उसके बाद जो और लोग आते थे, वह अपनी बारी, और लोगों को देता रहता था। धीरे-धीरे शाम के 5:00 बज जाते थे और फकीर का नंबर नहीं आता था।
धीरे-धीरे कई दिन बीत चुके थे। ऐसा ही रोज़ाना होता था। फकीर अपनी बारी दूसरों को देता रहता था और शाम 5:00 बजे तक उसको दान नहीं मिलता था। यह क्रिया राजा का एक दरबारी देखता रहता था और नोट करता रहता था। उसने यह सारी बात राजा को बताई। राजा ने भी गौर किया। उसके बाद राजा ने उस फकीर को बुलाया और उस फकीर महाशय से पूछा - महाशय! तुम रोज़ हमसे दान लेने के लिए आते हो लेकिन रोज़ाना खाली हाथ लौट जाते हो। तुम लोगों को अपने से आगे करते रहते हो और अपना नंबर दूसरों को देते रहते हो। फकीर ने कहा - राजा जी! आप राजा हो। आपके पास संपत्ति, अमानत, रुपया, पैसा सब कुछ है। आप यह दान करते हो और मेरे पास बारी है, मैं वह दान करता हूं।
राजा जी जब आप किसी को दान देते थे, तब आपके चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिखाई देती थी। मैं उस खुशी को देखकर सोचने लगा कि राजा दान देकर खुश होते हैं, तो मुझे भी कुछ देना चाहिए। मैं तो फकीर हूँ। मेरे पास तो कुछ देने के लिए नहीं है। तब मैंने सोचा कि मेरे पास बारी देने के लिए है। मैं तो फ़कीर हूँ। मुझे तो ये हीरे, जवाहरात, रत्न, खज़ाने, रुपया, पैसा लेने की जरूरत ही नहीं है। मेरे लिए ये चीज़ें महत्व नहीं रखती। तब मैंने भी वह देना शुरू किया, जो मेरा था। इससे मैं आपसे ज्यादा खुशी का अनुभव करने लगा हूँ।
देवताओं को सदा आशीर्वाद देने की विशिष्ट मुद्रा में दिखाते हैं, जिससे उनका चेहरा सदा हर्षित रहता है। लक्ष्मी को धन देने की मुद्रा में दिखाते हैं अर्थात जिसके पास जो होता है, वह दूसरों को देकर हर्षित होता है। तो हमें सोचना है कि हमारे पास क्या है, जो हम लोगों को दे सकें, क्योंकि देना ही लेना है। अगर हम स्थूल या सूक्ष्म कुछ भी देते हैं तो उसके बदले में हमें कई गुना मिलता है। किसी को सम्मान देंगे, तब हमें कई गुना सम्मान मिलेगा। हम दिन भर लोगों को क्या देते हैं, थोड़ा सा इस पर नज़र डालते हैं।
वर्तमान में जो हम देते हैं
हम आज कलियुग के अंत समय में हैं। अब हम रोज़ाना अपने अपने दान को चेक करेंगे। आज हमने क्रोध कितने व्यक्तियों या जीव-जन्तुओं को दिया है। कितनों पर कठोर वाणी के पत्थर बरसाए हैं। कितनों को ईर्ष्या का दान दिया है। कितनों पर घृणा की दृष्टि डाली है। कितनों को बुरी निगाह से देखा है। कितनों के अवगुणों को नोटिस किया है। देखना अर्थात हमारे संकल्प बनना और संकल्प बनना अर्थात दूसरों को देना। लिस्ट तो बहुत लंबी है। यह तो सभी जानते हैं कि हम क्या-क्या देते हैं तो उनको लिखना ही शक्ति/एनर्जी को कमज़ोर करना है। क्या हमारे पास यही सब कुछ देने के लिए है? क्या इसके अलावा और कुछ भी देने के लिए नहीं है?
आज थोड़ा हट कर सोचते हैं।
आज से हमें यह देना है
हमारे पास पैसा है तो पैसे का दान कीजिए। समय है तो समय का दान कीजिए। हमारे पास ज्ञान है तब ज्ञान का दान कीजिए अर्थात जो भी हमारे पास है उसका दान कीजिए। शुभ भावनाएं हैं तो उनका दान कीजिए। वह किया हुआ छोटा-सा दान कई गुना होकर हमको वापस मिलता है। इसको ‘देना ही लेना’ कहा जाता है।
अन्य शब्दों में कहें तो जब हम छोटे बच्चे को बेटा कहते हैं, तब वह हमें रिस्पेक्ट देता है। माना कि हमारे पास कुछ भी नहीं है। हमें चलते फिरते समय जो सामने दिखता है या जो भी हमें दिन भर में मिलता है या संपर्क में आता है, उन सभी के लिए कल्याण की भावना रख सकते हैं। उसके लिए कुछ शब्द हम लिख रहे हैं। इससे हम अपने मन के द्वारा दान दे सकते हैं। इसमें खर्च कुछ नहीं है। सिर्फ संकल्प से दान देना है।
सभी का कल्याण हो। सभी सुखी हो और सब का भला हो। सभी का जीवन सफल हो। सभी के जीवन में सुख, शांति, खुशी और पवित्रता आ जाए। सभी निरोगी बन जाए। सभी स्वस्थ हो जाएं। सभी इस वायरस के दुःख से मुक्त हो जाएं। सभी के अंदर देवताओं जैसे गुण आ जाएं। सभी सर्वगुण संपन्न बन जाएं। सभी निर्विकारी बन जाएं। सभी संपूर्ण पवित्र बन जाए। सभी फरिश्ता बन जाए। सभी दूसरे के मददगार बन जाए। सभी सुखी हो जाएं। सभी सदा खुश रहें...... आदि आदि।
हम इस प्रकार का कोई भी दान दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त जो भी आपको अच्छा लगे, आप वह दे सकते हैं। इसमें न समय का खर्च है, न पैसे का, न मेहनत का कोई भी खर्च है। सिर्फ मन से संकल्प के द्वारा देना है। इसके बदले वर्तमान में खुशी मिलेगी और बाद में पुण्य के खाते में जमा हो जाएगा जो हमारे कठिन समय में कितना काम आएगा, वह तो समय ही बताएगा।
शिक्षा -
इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि किसी के जीवन में बहुत पैसा है और कोई ग़रीब है। किसी के रिश्ते में बहुत अनबन है और किसी का रिश्ता कुछ हद तक ठीक है। कोई बहुत बीमार है और कोई लगभग स्वस्थ है। इन सबके पीछे राज क्या है? जब हम इस दुनिया में आते हैं तो मुट्ठी बंद करके आते हैं और जब हम इस दुनिया से जाते हैं तब हाथ फैलाकर जाते हैं। आते समय भी कुछ दिखाई नहीं देता है और जाते समय भी कुछ दिखाई नहीं देता है कि हम क्या लेकर आए थे और अब क्या लेकर जा रहे हैं। फिर यह अमीरी, ग़रीबी, दुख, कष्ट, बीमारी आदि हमें कैसे प्राप्त होती है? ज़रूर पिछले जन्म में हमने कुछ दिया होगा, उसी के बदले में यह मिल रहा है। अब हमें अगले जन्म के लिए सोचना है कि हमें अगले जन्म में क्या-क्या लेना है, तो हम उसके हिसाब से क्या देना है, वह सब देकर जाएं।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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