सिपाही धनपतराय
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सिपाही धनपतराय
Image by _Alicja_ from Pixabay
मलूकपुर थाने में एक रोशनलाल नाम का सिपाही हुआ करता था। वह अपनी बहादुरी, साहस और ईमानदारी के लिए पूरे थाने में ही क्या, बल्कि पूरे थाना क्षेत्र में प्रसिद्ध था।
अब वह रिटायर होकर अपने घर पर ही रहा करता था। रिटायर हुए उसे अभी केवल 4 साल ही हुए थे। उसकी आयु 60 वर्ष से अधिक थी।
उसके परिवार में उसके दो बेटे, एक बेटी और उसकी पत्नी थी। उसके दोनों बेटों की शादियां हो चुकी थी। अब उनके 2-2 छोटे-छोटे बच्चे थे। रोशनलाल के पौत्र स्कूल जाते और वहां से आकर अपने दादाजी से लिपटकर नाना प्रकार की जिद्द किया करते थे।
एक दिन जाड़े के मौसम में उन्होंने अपने दादाजी को घेर लिया। रात के समय सब लोग लिहाफ ओढे़ अपनी चारपाई पर लेटे थे। रोशनलाल बच्चों के लिए मूंगफली लाए थे, बच्चे खुशी-खुशी मूंगफली खा रहे थे और दादा से कोई कहानी सुनाने की जिद्द कर रह थे।
काफ़ी देर तक जिद्द करने के बाद रोशनलाल जी ने कहानी सुनाने के लिए ‘हां’ कर ली।
फिर सब बच्चे खामोश होकर दादा जी के चेहरे की ओर देखने लगे।
“सुनो बच्चों! मैं अपने जीवन के उन दिनों का किस्सा सुना रहा हूं, जब हम मलूकपुर थाने में थे।” दादाजी ने अपने जीवन की एक बेहतरीन घटना को बच्चों के सामने कहानी का रूप देकर सुनाना शुरू किया -
हमारे थाने में धनपत राय नाम का एक सिपाही बड़ा होनहार, ईमानदार और साहसी हुआ करता था। उसकी बहादुरी के चर्चे पूरे थाने में थे।
एक बार तो उसने अपनी जान की बाजी लगाकर डाकुओं के सरदार को धर दबोचा। वह अपने पास हमेशा चाकू, छुरा और तमंचा आदि रखता था। उस डाकू ने अपने साथियों के साथ गांव के ही जंगल में डेरा डाल रखा था और सूरज डूबते ही वे आते-जाते राहगीरों को लूट लिया करते थे।
उस डाकू का भी आसपास के कई गांव में बड़ा दबदबा था। उसका नाम डाकू कक्कड़ सिंह था।
हुआ यों कि एक दिन हमारे थाने का वह सिपाही (धनपतराय) पास के एक अन्य गांव से वापस लौट रहा था कि उसे किसी लड़की की चीखने की आवाज सुनाई पड़ी।
आवाज सुनकर धनपत राय के कान खड़े हो गये। वह आवाज़ की दिशा की ओर लपका।
वहां पहुंचकर उसने देखा कि एक लंबा-चौड़ा, बड़ी-बड़ी मूछों वाला, काला स्याह एवं डरावना आदमी लड़की को दबोच रहा है।
उसे देखते ही धनपतराय समझ गया कि हो न हो, यह डाकू कक्कड़ सिंह ही होगा।
इससे पहले धनपत राय ने उसे कभी नहीं देखा था, हांँ! थाने में उसकी फाइल में लगा उसका फोटो उसने अवश्य देखा था।
कक्कड़ सिंह को एक लड़की के साथ दुर्व्यवहार करते देख धनपतराय के तन-बदन में आग लग गयी। साहसी तो वह था ही। उसने आव देखा ना ताव, उसकी ओर झपटा।
लेकिन डाकू कक्कड़ सिंह भी कुछ कम नहीं था और जैसे धनपत उसकी तरफ झपटा वैसे ही एक गोली उसके कान के पास से ‘सन्न’ की आवाज के साथ गुज़री।
परंतु, धनपत राय ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए उसके ऊपर छलांग लगाई और आनन-फानन में वह कक्कड़ से गुत्थम-गुत्था हो गया।
जैसे ही कक्कड़ ने अपना छुरा धनपत के पेट में घोंपना चाहा तो फुर्ती से उसने अपना बचाव किया और तभी पीछे खड़ी उस लड़की ने कक्कड़ की टांग पकड़कर घसीट दिया।
धनपत राय को मौका मिल गया और उसने कक्कड़ के हाथ से छुरा छीन लिया।
लड़की ने उसकी टांग को नहीं छोड़ा और धनपत ने कक्कड़ के गले पर अपने हाथ में थमे छुरे से प्रहार कर दिया।
उसकी गर्दन से खून की एक तेज धार फूटी और कक्कड़ के हलक से एक जोरदार चीख निकली।
तभी वह झटके से उठा और एक दिशा में भाग निकला।
छुरा उसकी गर्दन पर काफी जोरदार पड़ा था और उसके भागने की लड़खड़ाहट बता रही थी कि वह कुछ दूर आगे जाकर गिर जाएगा। किंतु धनपत राय ने उसके बारे में कुछ नहीं सोचा और वह उस लड़की को साथ लेकर थाने में आ गया।
जब थाने में लड़की के बयान लिये गये तो पता चला कि वह लड़की गांव के प्रधान की लड़की है।
फिर उसी लड़की ने बताया कि उसके पिताजी और डाकू कक्कड़ की कोई पुरानी रंजिश है।
और अगले ही दिन गांव में चर्चा हो गई, डाकू कक्कड़ सिंह किसी खेत में मरा पड़ा है।
चर्चा आस-पास के गांवों और पुलिस के बड़े-बड़े अफसरों तक पहुंची।
तब हमारे कोतवाल साहब ने धनपत राय की नौकरी की रिकॉर्ड डायरी में उसके साहसी होने के विषय में अनेकों बातें लिखी जिससे कि अवसर प्राप्त होने पर उसकी पदोन्नति हो सके।
मगर उसी थाने मे एक अन्य सिपाही था। उसका नाम तालेवर था। वह धनपत राय से ईर्ष्या रखता था और उसकी प्रवृत्ति चुगलखोर, कामचोर होने के साथ-साथ चापलूसी भरी थी।
उसने अफसरों के कान भरने शुरू कर दिये कि धनपत राय तो डाकूओं से मिला हुआ है, न जाने रात को अपने कमरे में क्या ठोका-पीटी करता रहता है और रात को उससे मिलने न जाने कैसे-कैसे लोग आते हैं, जिनके साथ वह जंगल की तरफ जाता है।
एक दिन डी.आई.जी साहब मुआयने पर आये हुए थे। वह चुगलखोर, चापलूस सिपाही भी वहीं था। वह तो ऐसे मौके की तलाश में रहा करता था कि जब भी कोई बड़ा अफसर आता वह उसकी बहुत ज्यादा चापलूसी किया करता और उसकी तारीफ के पुल बांँधा करता था।
भाग्यवश डी.आई.जी. के स्वागत की जिम्मेदारी का काम भी उसे ही सौंप दिया गया।
उसने डी.आई.जी. साहब की खूब आवभगत की और बातों-बातों में धनपत के बारे में उल्टा सीधा कहने लगा।
तब डी.आई.जी. साहब ने कोतवाल साहब से पूछताछ की।
कोतवाल साहब के टोकने पर सिपाही तालेवर ने कहा - “मैं आपसे झूठ नहीं बोल रहा हूंँ। मैं आपको आज ही करिश्मा दिखा सकता हूंँ। यदि मेरी बात गलत हो तो हुजूर मेरी गर्दन आपके सामने हाजिर है, किंतु रात के समय लगभग एक बजे आपको मेरे साथ चलने का कष्ट उठाना पड़ेगा।” डी.आई.जी. साहब और कोतवाल ने उसकी बात को स्वीकार किया।
रात को जब 12:30 का समय हुआ तो धनपत राय के कमरे से रोज की तरह ठक-ठक, अटेंशन, खट-खट की आवाज़ें आने लगी।
चुगलखोर सिपाही तालेवर ने उन आवाजों को सुना।
वह फौरन दौड़ा-दौड़ा डी.आई.जी. साहब के कमरे की तरफ आया। कोतवाल साहब तथा डी.आई.जी. साहब उस समय कुछ जरूरी वार्तालाप कर रहे थे।
अतः तालेवर को देखते ही वे समझ गये कि वह इस समय उनके पास किस काम से आया है।
वे दोनों तुरंत उसके साथ चल दिये।
धनपत राय के कमरे पर पहुंँचकर उन्होंने किवाड़ों से अपने कान सटा दिये।
वास्तव में उसके कमरे से खट-खट, ठक-ठक की आवाज आ रही थी।
उस समय कमरे में हल्का प्रकाश फैला हुआ था।
उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो धनपतराय घबरा गया।
परंतु बार-बार दरवाज़ा खटखटाये जाने पर उसने कमरे का दरवाजा खोला।
सामने खड़े डी.आई.जी. साहब, कोतवाल साहब और चुगलखोर सिपाई को देख कर धनपतराय के पसीने छूट गये।
तीनों व्यक्ति कमरे के अंदर पहुंचे।
वहां हल्के प्रकाश में सबने देखा कि सामने की दीवार में एक आदमकद शीशा लगा है और सिपाही धनपतराय ने इंस्पेक्टर की वर्दी पहन रखी है।
उसे देखकर डी.आई.जी. साहब का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
उन्होंने कहा - “नौकरी सिपाही की, वर्दी इंस्पेक्टर की! बदतमीज! बेवकूफ बनाते हो हमारा, रात में तुम इन्स्पेक्टर की वर्दी पहनकर डाकुओं से मिलते हो।”
धनपतराय अपने अफसर के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर हैरान हो गया। उससे कुछ कहते न बना।
कोतवाल साहब ने उस चुगलखोर सिपाही को आदेश दिया कि पकड़ लो इस बदमाश को और इसे डी.आई.जी. साहब के कमरे पर ले चलो।
उसने आगे बढ़कर धनपतराय की कलाई अपने हाथ में पकड़ी और उनके पीछे-पीछे कमरे की ओर चल दिया।
कमरे में पहुंँचकर धनपत राय ने धैर्यपूर्वक कहा - “हुजूर, मेरा क्या कसूर है, जो मुझे इस तरह पकड़ कर यहां लाया गया?”
“तुमने इंस्पेक्टर की वर्दी पहन रखी है और फिर हमसे पूछते हो कि तुम्हारा क्या कसूर है?” डी.आई.जी. साहब ने कड़कदार आवाज में कहा।
“हुजूर आप मेरी बात तो सुनिये....।” धनपत राय जल्दी से बोला - “जब मैं अपनी पढ़ाई खत्म करके कॉलेज से निकला था, तो मेरी गुरुजी ने मुझे एक बात समझाई थी कि बेटे अपने जीवन में सदा ईमानदार बने रहना, मेहनत से जी न चुराना। ऐसा करने पर तुम जो बनना चाहोगे, वह बन जाओगे। साहब, मुझे तो इंस्पेक्टर बनना है। इसलिए मैं यह वर्दी पहनकर एकांत में अभ्यास करता हूंँ। हर कमांड पर अपने अफसर को सैल्यूट करता हूंँ, सर! यह खट-खट की आवाज मेरी सैल्यूट की थी। आप मेरी रिकॉर्ड डायरी में मेरा रिकॉर्ड देख लीजिए। अगर मैंने कभी भी कोई गलत काम किया हो तो आप मुझे अपनी मर्जी से सजा दे सकते हैं।”
तब डी.आई.जी. साहब ने कोतवाल से उसकी रिकॉर्ड डायरी को लाने के लिए कहा और उसे जाने का आदेश दिया।
धनपतराय मायूसी को अपने दामन में समेटे कमरे में आया और लेट गया।
उसकी रिकॉर्ड डायरी की छानबीन डी.आई.जी. साहब ने स्वयं की।
धनपत राय का ड्यूटी रिकॉर्ड बहुत सही पाया गया।
तब डी.आई.जी. साहब की सिफारिश पर एक मास के भीतर ही आदेश हो गया कि धनपतराय की उन्नति करके उसे पुलिस हेडक्वार्टर पर तैनात किया जाये।
बच्चे बड़े गौर से दादाजी की कहानी सुन रहे थे।
तब उन्होंने सम्मिलित स्वर में पूछा - “दादाजी, वह धनपतराय सिपाही इस समय कहांँ होगा?”
तो दादाजी ने हंँसकर कहा - “तुम्हारे सामने।”
“ओह! सभी बच्चों के मुंह खुले के खुले रह गये और आंँखें फटी की फटी रह गयी - यानी, दादा जी आप हमें वास्तव में अपनी ही कहानी सुना रहे थे।”
मित्रों! मनुष्य यदि होनहार, ईमानदार, साहसी और लगनशील है, तो कोई बाधा ऐसी नहीं जो उसकी उन्नति में रोड़ा बनकर अटके। रोशनलाल सिपाही ने अपनी मेहनत, लगन और ईमानदारी के बल पर उन्नति प्राप्त की।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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विनम्र निवेदन
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