वो अजनबी
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वो अजनबी
Image by Christel SAGNIEZ from Pixabay
दिसंबर की सर्द रात, कोहरा भी काफी था। ऐसे मे सुधा को रात 8:30 की ट्रेन पकड़नी थी वापस घर जाने को।
यहां वह अपने मम्मी पापा से मिलने आई थी और पति मोहन ऑफिस की व्यस्तता के चलते उसके साथ नहीं आए थे।
खैर... इससे पहले भी वह अकेले सफर कर चुकी थी मगर उस रात कुछ ज्यादा ही कोहरा छाया था। स्टेशन पहुंची तो पता चला कि उसकी ट्रेन पांच घंटे लेट है।
मां अकेली थी सो पिताजी को वापस भेज दिया मगर मन में डर था। अब अकेले स्टेशन पर वह कैसे पांच घंटे बिताएगी।
टिकट ए.सी. कोच का था सो वो वेटिंग रूम में पहुंची मगर वहां सिर्फ दो पुरुष थे।
वह भय के कारण गेट के पास वाली बेंच पर बैठ गई। कुछ देर में उन दो पुरुष यात्रियों में से एक उठकर चला गया। शायद उसकी ट्रेन आ गई थी। अब उस कमरे में केवल सुधा और वह अजनबी पुरुष था।
मगर वह अजनबी चुपचाप अखबार को धीमी रोशनी में पढ़ने की कोशिश कर रहा था। अभी कुछ देर ही बीती थी कि बाहर से कुछ लोगों की आवाजें आने लगी। शायद उनकी भी ट्रेन लेट थी। लेकिन वे जब अंदर आए तो उनके साथ शराब की बदबू भी आनी शुरू हो गई। सुधा को अब कुछ सही नहीं महसूस हो रहा था क्योंकि हालात ही ऐसे थे। वह उस कमरे में एक अकेली महिला थी और पुरुषों की संख्या अब चार थी।
ऊपर से आए दिन समाज में होती रेप जैसी वारदातों से पहले ही मन घबराया हुआ था। अचानक कमरे में पहले वाले पुरुष यात्री ने अपना बैग उठाया और सुधा के पास आकर दोनों के बीच बैग रखकर वहीं बैठ गया।
सुधा अब भी खौफ में थी तभी एक चायवाले ने अंदर आते हुए आवाज दी - चाय गर्म! चाय गर्म!
उस पुरुष यात्री ने दो चाय का इशारा किया। एक स्वयं लेकर दूसरी सुधा को देने को कहा।
चायवाले ने वैसा ही किया। इससे पहले सुधा चाय के पैसे देती, उस अजनबी ने चाय के पैसे दे दिए।
समय बीता और ट्रेन की घोषणा हुई। उस अजनबी की ट्रेन आ गई थी। पहले तो वह उठा फिर बोला - अरे! क्या बात है? चलिए न दीदी! अपनी ही ट्रेन की घोषणा हुई है।
सुधा ने एकटक उसे देखा और फिर उन तीनों शराबियों को देखा।
फिर चुपचाप उठी और वह भी बाहर चल दी। बाहर पहुंचकर उस अजनबी ने कहा - देखिए! मुझे नहीं पता कि ये आपकी ट्रेन है या नहीं, बहन!
पर मुझे उन शराबियों के बीच आपको अकेले बैठे छोड़ने का मन नही था, इसीलिए...
वैसे ये मेरी ट्रेन तो है। अगर आपकी भी है तो आप अपने कोच की तरफ चले जाइए।
सुधा ने कहा - जी… ये मेरी ट्रेन नहीं है। अभी कुछ वक्त लगेगा। आप जाइए।
उस अजनबी ने एकबारगी कुछ सोचा और फिर कहा - बहन! आप घबराइए नहीं।
मैं अगली ट्रेन पकड़ लूंगा मगर ऐसी स्थिति में, जैसे हर भाई को करना चाहिए, मैं भी वहीं करूंगा।
और उसने वो ट्रेन छोड़ दी।
कुछ समय बाद सुधा की ट्रेन आई तो उस अजनबी ने सुधा को उसके कोच में बैठने में मदद की और बाहर खड़े होकर ट्रेन चलने का इंतजार करने लगा। जैसे-जैसे ट्रेन चलने लगी वैसे-वैसे वो अजनबी सुधा की नजरों से दूर हो रहा था। सुधा ने दोनों हाथों को जोड़कर उस अजनबी को धन्यवाद दिया और उस अजनबी के लिए अपने भगवान से प्रार्थना करने लगी। शायद आज उसका समाज में होती वारदातों से जो भरोसा जो विश्वास खो रहा था, आज वापस वही भरोसा वही विश्वास महसूस हो रहा था।
मेरे दोस्तों! सचमुच पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होती।
आज भी समाज मे ऐसे लोग भी मौजूद है जो अपने घरों की तरह बाहर समाज में बहन बेटियों की इज्ज़त करते हैं, उनका सम्मान करते है और जहां एक अभिभावक की तरह उनकी रक्षा के लिए खडे़ होना चाहिए, वे वहां मौजूद रहते हैं।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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