मेरे साथ, मेरा क्या जाएगा

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मेरे साथ, मेरा क्या जाएगा

Photo by Jess Bailey Designs from Pexels

अपने अन्तर्मन में झाँके।

एक विद्वान साधु थे जो दुनियादारी से दूर रहते थे। वह अपनी ईमानदारी, सेवा तथा ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे।

एक बार वह पानी के जहाज से लंबी यात्रा पर निकले। उन्होंने यात्रा में खर्च के लिए पर्याप्त धन तथा एक हीरा संभाल कर रख लिया। ये हीरा किसी राजा ने उन्हें उनकी ईमानदारी से प्रसन्न होकर भेंट किया था सो वे उसे अपने पास न रखकर किसी अन्य योग्य राजा को देने के लिए ही यह यात्रा कर रहे थे।

यात्रा के दौरान साधु की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। वे उन्हें ज्ञान की बातें बताते गए। एक फ़क़ीर यात्री ने उन्हें नीचा दिखाने की मंशा से नजदीकियां बढ़ा ली। एक दिन बातों-बातों में साधु ने उसे विश्वासपात्र ‘अल्लाह का बन्दा’ समझकर हीरे की झलक भी दिखा दी। उस फ़क़ीर को और लालच आ गया।

उसने उस हीरे को हथियाने की योजना बनाई। रात को जब साधु सो गया तो उसने उसके झोले तथा उसके वस्त्रों में हीरा ढूंढा पर उसे नहीं मिला। अगले दिन उसने दोपहर के भोजन के समय साधु से कहा कि इतना कीमती हीरा है। आपने संभाल कर रखा है न! साधु ने अपने झोले से निकालकर दिखाया कि देखो! यह इस झोले में रखा है। हीरा देखकर फ़क़ीर को बहुत हैरानी हुई कि यह उसे कल रात को क्यों नही मिला?

‘आज रात फिर प्रयास करूंगा’ यह सोचकर उसने जैसे-तैसे दिन काटा और सांझ होते ही तुरन्त अपने कपड़े टांगकर, सामान रखकर, स्वास्थ्य ठीक नहीं है, ऐसा कहकर जल्दी सोने का नाटक किया।

निश्चित समय पर सन्ध्या पूजा-अर्चना के पश्चात जब साधु कमरे में आये तो उन्होंने फ़क़ीर को सोता हुआ पाया। सोचा आज स्वास्थ्य ठीक नहीं है इसलिए फ़क़ीर बिना इबादत किये जल्दी सो गया होगा। उन्होंने भी अपने कपड़े तथा झोला उतारकर टांग दिया और सो गए।

आधी रात को फ़क़ीर ने उठकर फिर साधु के कपड़े तथा झोला झाड़-झाड़ कर देखा। उसे हीरा फिर नहीं मिला।

अगले दिन उदास मन से फकीर ने साधु से पूछा - “इतना कीमती हीरा संभाल कर तो रखा है न साधु बाबा! यहां बहुत से चोर हैं।”

साधु ने फिर अपनी पोटली खोल कर उसे हीरा दिखा दिया।

अब हैरान परेशान फ़क़ीर के मन में जो प्रश्न था, उसने साधु से खुलकर कह दिया। उसने साधु से पूछा - “मैं पिछली दो रातों से आपके कपड़े तथा झोले में इस हीरे को ढूंढता रहा हूँ, मगर मुझे नहीं मिला। ऐसा क्यों? रात को यह हीरा कहां चला जाता है?”

साधु ने बताया - “मुझे पता था कि तुम कपटी हो। तुम्हारी नीयत इस हीरे पर खराब थी और तुम इसे हर रात अंधेरे में चोरी करने का प्रयास करते थे इसलिए पिछली दो रातों से मैं अपना यह हीरा तुम्हारे ही कपड़ों में छिपा कर सो जाता था और प्रातः उठते ही तुम्हारे उठने से पहले इसे वापस निकाल लेता था।”

मेरा ज्ञान यह कहता है कि इसी प्रकार व्यक्ति अपने गुण-अवगुण जानने के लिए अपने भीतर नहीं झांकता, न ही उन्हें ढूंढता। दूसरे में ही सब अवगुण तथा दोष देखता रहता है। क्या तुम कभी अपने कपड़े टटोलते हो?”

यह बात सुनकर फकीर के मन में और ज्यादा ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न हो गया। वह मन ही मन साधु से बदला लेने की सोचने लगा। उसने सारी रात जागकर एक योजना बनाई।

सुबह उसने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। ‘हाय! मैं मर गया। मैं लुट गया। मेरा एक कीमती हीरा चोरी हो गया।’ वह रोने लगा।

जहाज़ के कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम घबराते क्यों हो? जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम अभी एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।’

यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब साधु बाबा की बारी आई तो जहाज़ के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, ‘आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो अविश्वास करना ही अधर्म है।’

यह सुन कर साधु बोले, ‘नहीं। जिसका हीरा चोरी हुआ है उसके मन में शंका बनी रहेगी इसलिए मेरी भी तलाशी ली जाए।’

बाबा की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

दो दिन के बाद जब यात्रा खत्म हुई तो उसी फ़क़ीर ने उदास मन से साधु से पूछा, ‘बाबा इस बार तो मैंने अपने कपड़े भी टटोले थे। हीरा तो आपके पास था। वो कहां गया?’

साधु ने मुस्कुराकर कहा, ‘उसे मैंने बाहर पानी में फेंक दिया।’

साधु ने पूछा - क्या तुम जानना चाहते हो, क्यों? क्योंकि मैंने जीवन में दो ही पुण्य कमाए थे - एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से हीरा मिलता और मैं लोगों से कहता कि यह मेरा ही है तो शायद सभी लोग साधु के पास हीरा होगा, इस बात पर विश्वास नहीं करते। यदि मेरे भूतकाल के सत्कर्मों के कारण विश्वास कर भी लेते तो भी मेरी ईमानदारी और सत्यता पर कुछ लोगों का संशय बना रहता।

“मैं धन तथा हीरा तो गंवा सकता हूँ लेकिन ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को खोना नहीं चाहता था। यही मेरे पुण्यकर्म की सम्पत्ति है जो मेरे साथ जाएगी।” उस फ़क़ीर ने साधु से माफी मांगी और उनके पैर पकड़ कर रोने लगा।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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