मेरे पति मेरे देवता (भाग - 14)
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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 14)
श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं
श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी
प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)
हंसते-हंसते जेल-यात्रा
कोतवाली के बाद शास्त्री जी मिलाका जेल भेज दिए गए। कुछ दिनों के बाद मिलाई (मिलने की) की दरख़्वास्त दी गई। दरख़्वास्त मंजूर हो गई। मिलाई के दिन दोनों बीबी, अम्माजी और हम मिलने गई। फाटक के अन्दर जेलर साहब वाले कमरे में शास्त्री जी आए। अम्माजी के कारण न वे हमसे कुछ कह सकते थे और न हम उनसे कुछ कह सकती थी। बस! देखने का सुख था। वह भी बहुत आज़ादी के साथ नहीं।
अम्माजी और बहिनों के साथ उनकी बातचीत होती रही। 20 मिनट मिलाई का समय होता था। वह पूरा हो जाने पर एक सिपाही उन्हें अन्दर ले जाने के लिए आया और साथ ही हम लोगों को बाहर निकलने का भी संकेत दिया। सब लोग उठने लगे तो शास्त्री जी हमारी ओर इशारा करके सिपाही से बोले - हम एक सैकिंड के लिए उन्हें रोक रहे हैं। हम रुक गई। सब कमरे के बाहर चले गए। शास्त्री जी ने हमारी पीठ थपथपा कर कहा - ‘अलग रहने से मुहब्बत बढ़ती है। मुझे यहाँ कोई कष्ट नहीं है। तुम खुश रहना। अगर खुश नहीं रहोगी तो मुझे तकलीफ़ पहुँचेगी। रामनगर में सबकी सेवा करना, लेकिन अपनी तंदुरुस्ती का भी ख़्याल रखना।’
हम उनकी बातों को न ‘हाँ’ कर सकी और न ‘न’। हमारा गला भर आया था और आँखें भी भर आई थी। शास्त्री जी बाहर निकले। हमने झटपट आँचल से आँसू पोंछे और घूंघट को तनिक आगे खींचती हुई उनके पीछे-पीछे बाहर आ गई। फाटक से निकलते समय उन्होंने छोटी बीबी और बड़ी बीबी से कहा - ‘इन्हें बच्चा हो जाने पर ही आप लोग अपने-अपने घर जाइयेगा और इनका पूरा ख़्याल रखियेगा।’ सच्ची मुहब्बत की परख़ इन्हीं अवसरों पर हुआ करती है।
उन्होंने अम्माजी के पैर छूए और सिपाही के संग अन्दर की ओर मुड़ गए। लीडर रोड वाला मकान छोड़ दिया गया। हम सब रामनगर आ गई। कुसुम के होने के बाद ही छोटी बीबी और बड़ी बीबी अपने घर गई।
क्रमशः
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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