अल्लूरी सीताराम राजुनि थल्ली (माता) - सूर्यनारायण अम्मा
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वीर माताएँ
(क्रान्तिवीरों की माताओं के उद्गार)
लेखिका - श्रीमती संगीता अनिल पंवार
अल्लूरी सीताराम राजुनि थल्ली (माता) - सूर्यनारायण अम्मा
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात् माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। पर मित्रों, जिन माताओं ने अपने बच्चों को अपनी मातृभूमि को स्वतन्त्र कराने के लिए मातृभूमि पर न्यौछावर कर दिए और वे बच्चे भी अपनी माताओं के सामने ही फाँसी पर ख़ुशी-ख़ुशी झूल गए, उन माताओं को क्या कुछ झेलना पड़ा होगा, क्या कुछ वेदनाएँ हुई होंगी, उन वेदनाओं, उन भावनाओं को लेखिका ने अपनी कलम से काग़ज़ पर उकेरा है।
दक्षिण भारत के रेम्पा विद्रोह के नेता - अल्लूरी सीताराम राजू जब छोटे थे, तभी उनके पिता श्री वेंकटराम राजू का स्वर्गवास हो गया था। माँ सूर्यनारायण अम्मा आदिवासी महिला थी। फिर भी उसने सीताराम को अन्याय के विरुद्ध लड़ने की शक्ति और शिक्षा दी। स्वातन्त्र्य की जन्मघुट्टी पीते-पीते ही वे बड़े हुए। पर ऐसे बेटे की मृत्यु की कड़वी ख़बर भी माँ सूर्यनारायण को निगलनी पड़ी और वह अपनी मृत्यु तक रोज़ अपने शहीद बेटे के गुणगान की अमृतवाणी सुनती रही। आज भी आन्ध्र के लोग सीताराम राजू को भगवान मानते हैं।
हमारी कोंडाडोरा जमात का एक लड़का दौड़ता हुआ आया और उसने मुझे कहा - अम्मा, पुलिस सीताराम दादा को पकड़ कर ले गई। मैं झाड़ी-झुरमुट में से छिपते-छिपते ही, पर दौड़ती हुई वहाँ तक गई, जहाँ पुलिस ने सीताराम को पकड़ रखा था। पर वहाँ जो देखा तो मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। गामू मेरे पास बैठा था और मेरी देखभाल कर रहा था। इसके आगे मुझे कुछ भी नहीं मालूम।
जब आँखें खोली, तो मैं गामू गण्टम के घर पर थी। गामू मेरे सिरहाने बैठा था। उसने मेरे पैर पर हाथ रखते हुए कहा - ब्रिटिश वालों ने मेरे सीताराम दादा को मारा है। उसे मैं जिन्दा नहीं छोड़ूँगा ... या तो वह रहेगा या मैं ... इतना कह कर वह मेरे सामने ही बाहर निकल गया।
श्रीराम का जन्म 4 जुलाई 1897 को विशाखापट्टणम् जिले के पण्डरंगी गाँव का है। हम वहीं रहते थे। वह जब छोटा था, तभी उसके थाण्ड्री (पिता) वेंकटराम राजू गुजर गए। अब सारी जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। हम जंगल से लकड़ी तोड़ते, तो कभी काश्तकारी करते या मज़दूरी करते। आजू-बाजू के लोग श्रीराम को सीताराम राजू कहते थे। वैसे तो हम मूल रहने वाले थे मलबार के - हम तो वनवासी लोग, पहाड़ों और बीहड़ में रहने वाले। श्रीराम के पिताजी की मृत्यु के बाद हम टुनी आ गए। बहुत सालों बाद हम हिमालय की तीर्थ यात्रा करने निकले।
रास्ते में राजू की क्रान्तिकारी पृथ्वीसिंह आज़ाद से मुलाकात हुई। चटगाँव के क्रान्तिकारियों के बारे में भी उसे वहाँ जानकारी मिली।
हम तीर्थ यात्रा के नाम से तो निकले, पर मुंबई, वड़ोदरा, बनारस, ऋषिकेश, बद्रीनाथ, आसाम, बंगाल, नेपाल आदि सब दूर घूम आए। वापिस कृष्णदेवी पेटा आए तो श्रीराम ने संन्यस्त जीवन बिताने का निश्चय किया। गोदावरी के जंगलों में रहने वाले आदिवासी उसे पवित्र साधु कहते थे, परन्तु ...
वहाँ से श्रीराम जब वापिस आया तो हमारे आन्ध्र में भी आन्दोलन चालू हो गया था। हमारी जाति पर अंग्रेज़ जो अत्याचार कर रहे थे, वे जो हमारा शोषण कर रहे थे, वह तो शान्ति के मार्ग से खत्म हो नहीं सकता था। यह राजू निश्चित रूप से जान गया था। इसलिए शस्त्र तो उठाना ही पड़ेगा, यह भी उसे मालूम हो गया था। तीर्थ यात्रा के समय हमारे संरक्षण हेतु उसने घुड़सवारी, निशानेबाजी, तीरंदाजी सीखी थी। उसे योगविद्या और ज्योतिष का भी ज्ञान था।
एक दिन रेम्पा विद्रोह का नेतृत्व उसने स्वीकार किया। बाद में धीरे-धीरे विद्रोह तेज होता गया। गामू गण्टम डोरा और गामू मल्लू डोरा उसके दाहिने हाथ थे।
चित्तपल्ली पुलिस स्टेशन पर राजू ने हमला किया। पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई और पुलिस वाले भाग गए। एक थानेदार की पीठ पर बंदूक लगा कर राजू ने कहा - निकालो सब बंदूकें। मैं लेने आया हूँ। उसने चुपचाप सब बंदूकें निकाल कर दे दी। श्रीराम ने सारी बंदूकें सब को बाँट दी। उसके बाद आदिवासियों पर होने वाले अन्यायकारक कागज़ात इसने जला डाले।
बाद में कृष्णादेवी पेट्टा में भी चित्तपल्ली की ही पुनरावृत्ति हुई। अब तो अंग्रेज़ बहुत ही डर गए थे। बाहर से हज़ारों पुलिस वाले बुलाए। पर यह कहाँ चुप बैठने वाला था। 12 दिन रुका और आमुमँगी पुलिस चौकी पर हमला किया। वहाँ से अपने मित्र वीरप्पा डोरा को छुड़ाया। वीरप्पा लागराची क्रान्ति का नेता था। वह भी इससे मिल गया।
श्रीराम और उसके सैनिक दिन में किसानों के वेष में रहते थे। देहातों में मज़दूरी करते थे। गुप्त रूप से उनकी बैठकें होती थी और रात को पुलिस चौकी पर हमले करते थे।
एक दिन हम जंगल में लकड़ी काट रहे थे कि 4-5 पुलिस हवलदार और फौजदार आए। मैं तो घबरा गई। हम सब एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे। श्रीराम ने आँखों से इशारा किया और हम सब काम करने लगे। पुलिस वाले हरेक से पूछने लगे - राजू इव्हारु? राजू कैसा दिखता है? उसके साथीदार, स्वातन्त्र्य क्रान्तिकारी कैसे हैं? मेरे पास आकर मुझसे भी पूछा और मैंने नकारार्थी सिर हिला दिया। फिर वे श्रीराम के पास जाकर खड़े हो गए। मेरा तो दिल धड़कने लगा। पर श्रीराम ने ऐसा नाटक किया कि वह बोल ही नहीं सकता। वह तो छूट गया। रात को हम चाँदनी में बैठे थे, तो सब ने उसकी बहुत तारीफ़ की।
पुलिस वाले उसे ढूँढने गाँव में आते, तो उनके सामने एक बाण आ गिरता। उसमें एक चिट्ठी लगी रहती थी। उस पर लिखा रहता था - हमने अंग्रेज़ी राज को मिटाने की प्रतिज्ञा की है। मिरपकायट्या - मिरची वाले अंग्रेज़ यह सब देख कर ही डर जाते थे।
राजू कभी किसी की प्राणहानि न खुद करता, न करने देता। हथियार छीन लेता था। एक बार गण्टम और मल्लू के हाथों हण्टर और कॉट मारे गए थे तो राजू को यह बात बिल्कुल पसन्द नहीं आई। उसने दोनों को बहुत डाँटा।
इन दो अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या अंग्रेज़ सरकार के लिए तो एक चुनौती थी। उन्होंने राजू को पकड़ने के लिए हमारे दुर्गम इलाके में टेलीग्राफ के तार डाले। रास्ते बनाने की कोशिश की, पर हमारे लोग रातों-रात उखाड़ कर फेंक देते। बाकी आदिवासी भी हमारी बहुत मदद करते थे।
15 अक्तूबर 1922 अड्डगीतला तहसील के तहसीलदार को राजू ने संदेश भेजा था - आज रात हम हमला करेंगे। तहसीलदार डर गया। उसने सेना को बुला लिया। राजू ने बाणों से सैनिकों को जख्मी करके लड़ाई जीत ली।
अड्डगीतला से लौटते समय अंग्रेज़ों का खुफिया - रुदय्या राजू के लोगों के हाथ लगा था, पर राजू ने उसे छोड़ दिया और कहा - दुबारा इधर मत आना, पर अपने कलैक्टर से जा कर बोल दे कि लड़ाई की इतनी ही गर्मी चढ़ी हो तो आ जा मुझसे मिलने।
29 अक्तूबर को रेपचोडवरम् पर हमला किया और विजय हासिल की।
6 दिसम्बर को हज़ारों की सेना राजू को पकड़ने आई। पर राजू और उसकी सेना पहाड़ों और जंगलों में छिप गए। पर वहाँ गोरे सैनिकों की और क्रान्तिकारियों की आमने-सामने लड़ाई हुई। कई क्रान्तिकारी मारे गए। नदी-नाले इनके खून से लाल हो गए।
अंग्रेज़ सेनापति जॉन को विजय का नशा चढ़ गया। उसने क्रान्तिकारियों के शवों की प्रदर्शनी लगाई और लोगों से कहा - राजू की मदद करोगे तो तुम्हारा भी यही हाल होगा। पर जो सिर पर कफ़न बाँध कर ही लड़ने आए थे, वे तो पीछे हटने से रहे। राजू ने अन्नवरम् पुलिस थाने पर छापा मारा। पृथ्वीसिंह आज़ाद और राज महेन्द्री - इन मित्रों को छुड़ा लिया।
दूसरे दिन जिला कचहरी के सामने मिरचीवालों के नाम पत्र आया - आज शाम हम सब क्रान्तिकारी शेखावरम् में इकट्ठा हो रहे हैं। हिम्मत हो तो आ जाओ शेखावरम् में।
एक दिन तो मल्लू के घर पर पुलिस ने घेरा डाल दिया था। अंग्रेज़ अधिकारी किरन्स के साथ लड़ते समय मल्लू अंग्रेज़ों के हाथ लगा। अंग्रेज़ों ने उसे बहुत दुःख दिए, पर उसने मुँह नहीं खोला।
फिर तो अंग्रेज़ों को और भी नशा चढ़ गया। उन्होंने हमारे लोगों को मारना-पीटना शुरू कर दिया। हमारी झोंपड़ियों को तोड़ना और ध्वस्त करना चालू किया। सामुदायिक दण्ड दिया, पर लोग झुके नहीं। एक बार मुझे भी पकड़ कर ले गए। पर कुछ फायदा नहीं हुआ।
परन्तु 6 मई को निर्णायक युद्ध हुआ। असम रायफल्स के नेता उपेन्द्र पटनायक और अंग्रेज़ों के बीच घमासान लड़ाई हुई। दूसरे दिन 7 मई को राजू पकड़ा गया।
पर मोती नामक अधिकारी को पैसे का मोह हुआ - राजू को मारने वाले को 10 हज़ार का इनाम रखा था। उसने राजू को पकड़ कर पेड़ से बाँध कर रखा और निर्दयता से गोलियाँ चलाई।
मेरे राजू को ... एक शूरवीर को निःशस्त्र हालत में मारा। 2-3 दिन तक राजू का शव पेड़ से बँधा था। हम लोग गण्टम का इन्तज़ार कर रहे थे। पर वह भी मारा गया था।
जहाँ दीप ही बुझ गया, वहाँ तो अन्धकार ही फैलेगा। दीपक को तो एक न एक दिन बुझना ही है। मेरे राजू के मरने का मुझे इतना दुःख नहीं हो रहा है, जितना किसी शूरवीर को जिस बुजदिली से मारा, उसका दुःख है। मेरे शेर को मारा, वह भी छल-कपट से! अरे अंग्रेज़ों! तुम्हारी नीयत पर मुझे घृणा आती है। एक नीच के हाथों मेरे शेर की मृत्यु हुई, उसका दुःख है। किस माँ का दूध पीया था रे अंग्रेज़ों तुमने!
।।भारतमाता की जय।।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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