अहंकार का सिर नीचा
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अहंकार का सिर नीचा
Image by Steve Bidmead from Pixabay
प्राचीन काल में सुंदर नगर में अक्षय भद्र नाम का एक सेठ था। एक दिन उसका सोने में तुलादान हुआ। उस सोने को ग़रीबों में बांटा गया। उसने ऐलान कर दिया कि कोई भी खाली हाथ न रह जाये।
उसने अपने आदमियों को यह देखने के लिये कि नगर में कौन सोने से वंचित रह गया है, दौड़ा दिया। उसके आदमियों ने पूरा नगर छान मारा, किंतु उन्हें ऐसा कोई आदमी नहीं मिला। उन्होंने यह बात आकर सेठ को बता दी, किंतु सेठ को उनकी बात से संतुष्टि नहीं हुई। वह ख़ुद यह देखने के लिये निकल पड़ा।
चलते-चलते उसका काफ़िला जंगल में से गुज़रा। वहां एक मुनि साधना कर रहे थे।
सेठ ने मुनि का आशीर्वाद लिया और उन्हें सोना देने की बात कही। मुनि ने नकारात्मक जवाब दिया, “सेठ जी! यह आपने अच्छा किया कि ग़रीबों में सोना बंटवा दिया, लेकिन मुझे इससे क्या मतलब! मैं मुनि हूँ। ईश्वर की साधना और उसकी कृपा ही मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा धन है।”
सेठ को मुनि की यह बात बुरी लगी। उसने कठोर स्वर में कहा, “क्या दुनिया में ईश्वर की कृपा का कोई मोल नहीं?”
मुनि सेठ के अहंकार को तोड़ते हुए बोले, “मैं कभी दान नहीं लेता। मेरा प्रभु मुझे उतना दे देता है जितने की मुझे आवश्यकता होती है। फिर भी यदि आप आग्रह कर ही रहे हैं, तो इस राम की तुलसी के पत्ते के बराबर सोना मुझे दे दें।”
इतना कहकर मुनि ने तुलसी के पत्ते पर “राम” का नाम लिखकर सेठ को दे दिया।
यह देखते ही सेठ का अहंकार बलवती हो उठा। बोला, “आप मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं, मुनिदेव! मेरे घर में सोने की कमी नहीं है। आप निर्धनता में रहते हैं, इसलिए मैं आपकी सहायता करना चाहता था।”
“ठीक है। आप मुझे इस पत्ते के बराबर सोना दे दें”, मुनि ने कहा।
सेठ ने खोज कर तराजू मंगाई। उसके एक पलड़े में पत्ता रख दिया और दूसरे में कुछ सोना।
किंतु वह सोना कम रहा, तो सेठ ने और सोना पलड़े में डाल दिया। लेकिन जैसे-जैसे पलड़े में सोना बढ़ता जा रहा था, वैसे-वैसे ही सोना कम पड़ता जा रहा था। पत्ते वाला पलड़ा अपनी जगह से हिलने का नाम तक नहीं ले रहा था।
यह देखकर सेठ हक्का-बक्का रह गया। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ।
वह मुनि के चरणों में गिर पड़ा, “मुनिवर! मेरी आँखों पर अहंकार का पर्दा पड़ा था, अब वह उठ गया है। मैं आपका सच्चे दिल से आभारी हूँ। सच्चे धनी तो आप ही हैं। सचमुच दुनिया में ईश्वर की कृपा का धन से अधिक महत्व है और किसी वस्तु का नहीं।”
इसके बाद सेठ बिल्कुल बदल गया। उसके अंदर का अहंकार बिल्कुल समाप्त हो गया।
मित्रों! ‘अहंकार’ एक ऐसा दैत्य है, जो जिसके सिर पर चढ़ जाता है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट करके रख देता है। साधु-संतों, ऋषि-मुनियों के सामने अहंकार करने वाला सदा मुंह की खाता है। जैसा हाल सेठ अक्षय भद्र का मुनि के सम्मुख हुआ। अहंकार ने उसे नीचा देखने पर मजबूर कर दिया।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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