गुदड़ी का लाल

👼👼💧💧👼💧💧👼👼

गुदड़ी का लाल

Image by Ralph from Pixabay

जिस प्रकार उर्वरा भूमि अनेक अन्नों को उपजाती है, उसी प्रकार यह भारत भूमि अनेक महापुरुषों को जन्म देने वाली भूमि है।

गंगा के किनारे बसी वाराणसी नगरी को हिंदुओं और जैनियों का प्राचीन तीर्थ स्थान माना जाता है। इसी के पास मुगलसराय नामक स्थान है। यहीं लाल बहादुर ने 2 अक्टूबर सन 1904 में भारत भूमि पर जन्म लिया। इनके पिता एक स्कूल में अध्यापक थे। वे असमय में ही काल कवलित हो गए। अब लाल बहादुर को अपना रास्ता स्वयं चुनना था।

स्कूल से छुट्टी मिलने पर सभी बालक घर की ओर जा रहे थे। बीच में गंगा नदी पड़ती थी। बिना पैसे कौन उसे पार ले जाता? अतः उसने बस्ता सिर पर बांधा और गंगा नदी को तैरते हुए घर पहुंच गए। वह धनाभाव में भी पढ़ते चले गए। पढ़ने में तेज होने से उन्हें प्रतिमाह 5 रुपए की दर से छात्रवृत्ति भी मिलने लगी। कई लड़कों ने मिलकर सामूहिक भोजन करने का प्रोग्राम बनाया, जिसे ‘बाल फेडरेशन’ नाम मिला।

विद्या अभ्यास करते हुए उन्हें शास्त्री की डिग्री मिल गई। तभी से लोग उन्हें लाल बहादुर शास्त्री कहने लगे। उन्होंने हमेशा भारत की सेवा में ही अपना जीवन बिताया। वे ‘लोक सेवक मंडल’ के आजीवन सदस्य रहे। जवाहरलाल नेहरू व टंडन जी इनके अभिन्न मित्र थे। ये उनके सहयोग से कांग्रेस में अधिक से अधिक काम करने का समय देने लगे। नमक सत्याग्रह और लगान बंदी में इन्होंने बड़े उत्साह से काम किया। किसान कमेटी के संयोजक शास्त्री जी ही थे। दूसरी बार के चुनाव में शास्त्री जी गृह मंत्री बन गए, जो उनके विश्वास और ईमानदारी का फल था।

अब नेहरु जी उन्हें और भी ऊंचा पद देने को तैयार थे। फलस्वरूप उन्होंने कांग्रेस के महामंत्री, भारत में रेल मंत्री, वाणिज्य मंत्री, गृहमंत्री आदि अनेक महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर अपनी योग्यता का परिचय दिया। ये बड़े सरल व सीधे आदमी थे। पहनावा केवल धोती कुर्ता ही था। वे अपने कर्तव्य को पहचानते थे। कभी भी पद और प्रतिष्ठा का गर्व इन्हें नहीं था।

जब 27 मई 1964 में नेहरू जी का निधन हो गया तो अन्य नेताओं के रहते हुए भी इन्हीं को प्रधानमंत्री चुना गया। इस प्रकार पैसे के अभाव से तैरकर गंगा पार करने वाला भारत का खेवनहार बन गया। प्रधानमंत्री काल में इन्होंने अनेक असाधारण पौरुष का परिचय दिया। सन् 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। इस पर भी शास्त्री जी नहीं घबराए।

13 अगस्त 1965 को शास्त्री जी ने भारत को एक नया संदेश दिया। ताकत का जवाब ताकत से दिया जाएगा। आक्रमणकारी को किसी भी हालत में सफल नहीं होने दिया जाएगा। अंत में भारत की विजय हुई। शास्त्री जी ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा सारे भारत में गुंजा दिया, जो आज तक गूंज रहा है। लेकिन दुर्भाग्य था कि ऐसा भारत का लाल केवल 18 महीने ही प्रधानमंत्री पद पर रह सका। 11 जनवरी सन् 1966 को क्रूर काल ने भारत रत्न को भारत से छीन लिया। जो देश की गरीब जनता की समस्याएं अपने अनुभव से जानता था, उन्हें हल करने में लगा रहता था, वह सचमुच धरती का लाल था ‘गुदड़ी का लाल’।

--

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद।

Comments

Popular posts from this blog

ईश्वर की कृपा

समर्पण भाव होना चाहिए

समस्या का सामना

चरणों की धूल

आधे रास्ते को मंजिल न समझें

एक बुढ़िया की रोचक कहानी

Y for Yourself

जो चाहोगे सो पाओगे

राजा मोरध्वज

जहाँ प्रेम वहीं ईश्वर