न्याय व्यवस्था भगवान की

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न्याय व्यवस्था भगवान की

Image by Goran Horvat from Pixabay

एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा रास्ते पर चला जा रहा था, कि इस दरवेश ने एक मिठाई की दुकान को देखा। जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबल रहा था, तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा-गरम जलेबियां तैयार हो रही थी। मलंग साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया, शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था। साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा।

साधु कुछ खाना चाहता था, लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते? साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक-दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दे दी। मलंग ने गरम जलेबियां, गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिए प्रार्थना की, फिर आगे चल दिया।

मलंग का पेट भर चुका था। दुनिया के दुखों से बेपरवाह वह फिर एक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था। वह इस बात से बेख़बर था कि एक युवा नव-विवाहित जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता-बचाता उसके पीछे चला आ रहा है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी, बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया।

उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई, इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और मलंग को कॉलर से पकड़ कर कहने लगा - अंधा है! तुझको नज़र नहीं आता। तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गए हैं।

मलंग हक्का-बक्का सा खड़ा था, जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाख़ुशगवार गुज़र रहा था। महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से मलंग को छुड़ाना भी चाहा, लेकिन युवा की आँखों से निकलती नफ़रत की चिंगारी देख वह भी पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई।

राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ मलंग के चेहरे पर जड़ दिया। बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब न झेलता हुआ लड़खड़ाता हुआ कीचड़ में जा पड़ा। युवक ने जब मलंग को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया।

बूढे मलंग ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला - वाह मेरे मालिक! कभी गरम दूध, जलेबियां और कभी करारा थप्पड़। लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है, यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया।

दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती में अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए। वे अपने घर पहुंच गए थे। वह युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी-मज़ाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियां तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी। अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा। महिला बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी। जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके, लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी। युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर में ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो गई।

कुछ लोगों ने दूर से आते मलंग साधु को देखा तो आपस में कानाफूसी होने लगी कि निश्चित रूप से इस मलंग बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है, अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचंभे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर मलंग बाबा को घेर लिया। एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के बंदे हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे? भगवान के बंदों में रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा-सी असुविधा में भी धैर्य न कर सके!

मलंग साधु कहने लगा - भगवान की क़सम! मैंने इस युवा को कभी श्राप नहीं दिया।

अगर आपने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया?

तब मलंग ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि क्या आप में से कोई इस सारी घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा - हाँ, मैं इस घटना का चश्मदीद गवाह हूँ।

मलंग ने अगला सवाल किया - मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था?

युवा बोला - नहीं, लेकिन महिला के कपड़े ज़रूर ख़राब हुए थे।

मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा - फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?

युवा कहने लगा - क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और वह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे। इसलिए उस युवक ने आपको मारा।

बात सुनकर मलंग ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया कि भगवान की क़सम! मैंने श्राप कभी नहीं दिया, लेकिन कोई मेरा भी प्रेमी है जो मुझसे प्रेम रखता है और वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है।

जब युवती के सामान्य से प्रेमी को इसका कष्ट सहन नहीं हुआ, तो भला मेरे प्रेमी को मेरा अपमान कैसे सहन हो सकता था?

नित याद करो मन से शिव को। जो सदा शिव की याद अपने दिल में बसाए रखता है, वे शिव भी उसकी कदम-कदम पर रक्षा करते हैं।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

Comments

  1. अत्यंत उपयोगी जानकारी दी।

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