वृन्दावन के बांके बिहारी

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वृन्दावन के बांके बिहारी

Image by Corina Selberg from Pixabay

भीकू नाम का लड़का रेलगाड़ी में साफ़-सफ़ाई करके उससे जो पैसे मिलते, उससे अपने घर का गुज़ारा करता था।

उसके घर में एक बूढ़ी मां, एक छोटी बहन और बीमार पिता थे।

एक दिन रेलगाड़ी की सीट के नीचे से सफ़ाई करते-करते उसको एक पर्स मिला। पर्स को पकड़ते ही उसके हाथ कांपने लगे। उसको लगा कि इसमें बहुत सारे पैसे होंगे। उसने जल्दी से पर्स उठाया और अपनी निक्कर की जेब में डाल लिया। वह इस इंतजार में था कि कब गाड़ी रुके और कब मैं इस पर्स को खोल कर देखूं कि इसमें कितने पैसे हैं और उन पैसों से मैं अपने घर के लिए कुछ राशन और बीमार पिता के लिए दवाई लेकर जाऊं।

स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही वह जल्दी से गाड़ी से उतरा और कहीं एकांत में जाकर जल्दी-जल्दी उस पर्स को खोल कर देखने लगा। पर्स को देखते ही उसके होश उड़ गए क्योंकि पर्स बिल्कुल खाली था। उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया।

पर्स की पिछली जेब में अचानक उसको किसी भगवान की तस्वीर नज़र आई। तस्वीर को देखते ही जैसे उसके शरीर में हलचल-सी होने लगी और उसकी आँखों से दो मोटे-मोटे आंसू निकल कर उस तस्वीर के चरणों में गिर पड़े।

पता नहीं, ये आंसू पर्स में कुछ न मिलने के कारण थे या उस तस्वीर में मिले भगवान को देखकर थे। बहुत हिम्मत करके वह वहां से उठा और थके हुए कदमों से चलने को तैयार हुआ। चलते-चलते वह सोचने लगा कि आज तो घर में खाने को कुछ नहीं है। मां भी भूखी है, बहन के पेट में भी अन्न का एक दाना नहीं गया। बीमार पिता को भी दवाई खाने से पहले कुछ खाना था। यही सोचते-सोचते गली के नुक्कड़ पर पहुँचा, जहाँ किसी की शादी हो रही थी। शादी में बचा हुआ खाना वहां का सेठ लोगों को बांट रहा था तो वह भी लाइन में लग गया। उसको भी 2-3 लिफाफे भर कर खाने के लिए मिले।

उसकी तो ख़ुशी का जैसे ठिकाना ही नहीं था। घर जाते ही उसने यह खाना अपनी मां को दिया और कहा कि मां! देखो आज मैं कितना खाना लाया हूँ। मां कहती है - बेटा! ला तेरी बहन भूख के कारण सुबह से रो रही है और मैंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया और तेरे बीमार पिता को भी कुछ चाहिए खाने के लिए।

भीकू हैरान था कि जो सेठ उसको देख कर नाक-मुंह सिकोड़ता था, आज उसने मुझे खाने को क्यों दे दिया? तभी उसने जेब में से पर्स निकाल कर उस तस्वीर को देखा और उसका धन्यवाद किया कि शायद आज आपके कारण ही मुझे खाना मिला है।

मां ने कहा कि यह खाना तो कल पूरा दिन चल जाएगा। अगले दिन भीकू फिर काम के लिए निकला। स्टेशन पर पहुंचते ही वह गाड़ी में चढ़ने लगा। तभी एक बीमार और बूढ़ी औरत उसको कहने लगी कि मेरे लिए टिकट ले आओ। मेरे पैर में चोट लगी है। भीकू बोला - हां मांजी! मैं ला दूंगा।

उसने उसको 500 का नोट दिया और वह भी झट से टिकट लेने के लिए चला गया। तभी गाड़ी की सीटी बज गई और गाड़ी चलने के लिए तैयार थी तो भीकू भागा।

रेलगाड़ी की खिड़की से ही उस बूढ़ी औरत को टिकट पकड़ा दी लेकिन बाकी पैसे उसके हाथ में ही रह गए तो बूढ़ी औरत उसको खिड़की से इशारा करती है कि बाकी तू रख ले। बाकी 275 रुपए बचे थे। भीकू हैरानी से हाथ में पकड़े उन पैसों को देखता रहा। तब तक गाड़ी जा चुकी थी। वह गाड़ी में न चढ़कर घर की तरफ चल पड़ा और रास्ते में उन पैसों से उसने एक हफ्ते का राशन ले लिया और मां को देकर बोला - देखो मां! आज तो खूब कमाई हुई। यह एक हफ्ते का पूरा राशन है। मां यह देखकर बहुत खुश हुई। तभी उसने जेब में से फिर वही भगवान की फोटो को निकाल कर देखा और कहा कि यह सब चमत्कार आपके कारण ही हो रहा है।

मैं नहीं जानता कि आप कौन हो? तभी उसने जेब में से तस्वीर को निकाल कर अपनी मां को दिखाया और कहा कि मां! यह कौन से भगवान हैं?

मां ने उसकी तरफ नहीं देखा क्योंकि वह तो इतना राशन देखकर ही बहुत खुश हो रही थी। भीकू ने देखा कि मां नहीं देख रही तो उसने पर्स अपनी जेब में ही रख लिया। फिर एक दिन जब वह रेलगाड़ी में सवार होकर सफ़ाई के लिए जा रहा था और सीटों के नीचे सफ़ाई कर रहा था, तभी उसने देखा कि 8-10 लोग वही तस्वीर लेकर ज़ोर-ज़ोर से हरे कृष्णा का जाप कर रहे हैं।

भीकू उस तस्वीर को देखकर हैरान हो गया और सीट पर बैठी एक बूढ़ी औरत को हाथ जोड़ कर बहुत विनम्रता से बोला कि माताजी! ये कौन हैं और आप यह क्या भजन कर रहे हो? मुझे भी बताओ। तो वह औरत कहती है कि यह बांके-बिहारी जी हैं। यह वृंदावन में रहते हैं। जो भी इनकी शरण में जाता है, बांके-बिहारी उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।

यह वृंदावन के मालिक ही समझ लो। भीकू जेब में से उस तस्वीर को निकालकर उस माताजी को दिखाता है कि यह बांके-बिहारी जी हैं तो वह कहती है - हां बेटा! यह बांके-बिहारी जी हैं। यह वृंदावन में रहते हैं। भीकू की आंखों में फ़िर आंसू आ गए। वह कहता है कि मुझे भी वृंदावन जाना है। क्या मुझे लेकर जाओगे। तो माता जी कहती हैं - यह गाड़ी वृंदावन ही जा रही है। तुम मेरे साथ ही चलो। भीकू को अपने पीछे अपनी मां और बहन के खाने की कोई चिंता नहीं थी, क्योंकि बिहारी जी ने तब तक के लिए तो उनका इंतजाम कर ही दिया था। पहले भी वह कई दिनों तक घर नहीं जा पाता था।

भीकू माताजी और 8-10 लोगों के साथ चल पड़ा। वृंदावन पहुंचते ही वे लोग अपने रास्ते चल पड़े। भीकू को कुछ भी नहीं पता था कि वह कहां जाए? बिहारी जी कहां रहते हैं? तो वह लोगों को बिहारी जी की तस्वीर को दिखाता हुआ कहता है कि यह बिहारी जी कहां रहते हैं? वृंदावन के लोग उस पर हंसते हुए कहते हैं कि यह वृंदावन उनका ही है।

ये हर जगह रहते हैं। फिर वह कहता कि उनका घर कहां है? तब एक सज्जन पुरुष भीकू को मिला और कहने लगा कि चलो! मैं तुझे बिहारी जी के पास लेकर जाता हूँ। तब उसको बिहारी जी के मंदिर लेकर आ गया। मंदिर में बहुत भीड़ थी। भीकू को कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। वह दूर से ही श्रीजी को देखकर निहाल हो गया।

उसकी आँखों में झर-झर आंसू बहने लगे। आंसू के कारण उसकी आँखों में बिहारी जी की छवि धुंधली-धुंधली नज़र आने लगी। तभी मंदिर की लाइट चली गई। आँखों में धुंधलेपन के कारण और लाइट न होने के कारण भीकू को कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। तभी उसको अपने पास एक तेज रोशनी नज़र आई और उसको लगा कि कोई उसका हाथ खींच रहा है।

उसने ध्यान से देखा। एक छोटा-सा बालक उसको खींच कर कह रहा है - भीकू! तुम आओ मेरे साथ।

वह बालक उसको एक कोने में ले जाकर कहता है कि अब आए हो! मैं तो कब से तुम्हारी राह देख रहा हूँ। भीकू कहता है - तुम कौन हो? उससे घबराहट के कारण कुछ भी बोला नहीं जा रहा था।

मैं वही हूँ जिसको तुम अपनी जेब में लेकर घूम रहे हो। तेरा मेरा नाता तो उसी दिन से बन गया था, जब तूने मेरी तस्वीर को देखकर अपने आँसुओं से मेरे पैरों को धोया था। तबसे तू मेरी शरण में है और मैं कब से तुम्हारी राह देख रहा हूँ। आज तुम आए हो। अब मैं तुम्हें जाने न दूंगा।

भीकू से कुछ भी न बोला गया और मन में सोचने लगा कि मैं यहां रह जाऊंगा तो मेरे माता-पिता और छोटी बहन का क्या होगा?

बिहारी जी उसके मन की मंशा को समझ गए और कहने लगे - तू उनकी चिंता मत कर। वहां पर एक सेठ को, जिस बस्ती में तेरे माता-पिता रहते हैं, मंदिर बनाना था। उन्होंने उस झोपड़ी के बदले तेरे माता-पिता को एक पक्का घर बना कर दे दिया है और साथ में खाने-पीने का भी पूरा प्रबंध है। तो उनकी चिंता मत कर। अब तू यहीं रह। अब से तू मेरा सखा है।

वह कहता है - मैं यहां कहां रहूँगा? तो बिहारी जी बोले - आज से तू बाहर फूलों की माला की दुकान लगाया करेगा और आज से मैं तेरे हाथ के बने फूलों की माला ही पहनूंगा। आज से तू मेरी शरण में है। मेरी शरण में जो एक बार आ जाता है, मैं उसका साथ कभी नहीं छोड़ता। भीकू को तो अपनी किस्मत पर विश्वास ही नहीं हो रहा था और वह आँखों में आंसू की धारा बहाता हुआ बिहारी जी के पांव में गिर पड़ा।

जब उसने ऊपर उठकर देखा तो बिहारी जी वहां नहीं थे। वह तो मंदिर में विराजमान थे। बिहारी जी की अपने ऊपर ऐसी कृपा देखकर भीकू धन्य-धन्य हो उठा और बिहारी जी को एकटक निहारता रहा और मन में बोलता रहा - बांके-बिहारी लाल की जय हो!!

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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