राजा और चार रानियाँ
👼👼💧💧👼💧💧👼👼
राजा और चार रानियाँ
Image by Karl Egger from Pixabay
एक समय की बात है, एक राजा था। उसकी चार पत्नियां थी, जो एक से बढ़कर एक सुन्दर एवं गुणों से युक्त थी। राजा उन चारों से अनुराग रखता था, परंतु उसे चौथी पत्नी सर्वाधिक प्रिय थी। फिर तीसरी, फिर दूसरी और फिर पहली। पहली पत्नी उनमें सर्वाधिक वयस्क थी।
एक दिन राजा वन में आखेट के लिए गया। वहाँ उसे एक अज्ञात कीट ने काट लिया और वह एक दुर्लभ बीमारी से ग्रसित हो गया। वैद्य एवं तांत्रिकों ने अपनी सारी विद्या का प्रयोग किया, परंतु उसकी अवस्था को सुधार नहीं पाए। अंततः उन्होंने यह कहा कि राजा की मृत्यु निकट है और अब वह कुछ ही दिनों के अतिथि हैं।
राजा ने अपनी संपत्ति को रानियों में विभाजित करने का निर्णय किया, क्योंकि उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। परंतु सामान्य रूप से विभाजन करने की जगह कौन-सी रानी उसे कितना प्रेम करती है, इस आधार पर संपत्ति को बांटने का निर्णय किया। उसने एक चतुर योजना बनाई और सभी रानियों को एक-एक कर के बुलाया।
उसने कहा - “मेरे जीवन के केवल तीन दिन शेष हैं। मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूँ। बहुत पहले मुझे एक साधु ने एक शक्तिशाली यंत्र दिया था, जिससे मुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी, यदि मैं साथ में एक और व्यक्ति को ले जाऊँ। परंतु इससे पहले कि हम स्वर्ग में प्रवेश करें, हमें दारुण यंत्रणा सहन करनी होगी और नर्क में सात वर्ष व्यतीत करने होंगे। क्योंकि हम एक-दूसरे से सर्वाधिक प्रेम करते हैं, इसलिए मैंने यह निश्चय किया है कि मैं तुम्हें अपने साथ आने का यह अवसर प्रदान करूँगा।”
उसने चौथी रानी से आरम्भ किया जो सबसे छोटी थी और जिससे वह सबसे अधिक प्रेम करता था। उन्होंने उससे पूछा, “क्या तुम मरने के बाद, मेरे साथ चलोगी?” रानी को राजा की आसन्न मृत्यु पर पूर्ण विश्वास हो गया था और उसने भावना रहित स्वर में कहा, “इसमें संदेह नहीं कि मैं आपसे प्रेम करती हूँ, परंतु प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मृत्यु का स्वयं ही सामना करना होता है। मैं यहाँ रानी के रूप में ही रहना पसंद करूँगी। मुझे तो प्रेम एवं सत्कार की आदत है।” मतलब चौथी पत्नी ने साफ़ मना कर दिया और चली गई।
राजा को अपनी तीसरी पत्नी भी बहुत प्यारी थी और उस पर उन्हें गर्व था। उन्होंने उसे बुलाया और साथ में मरने के लिए पूछा। तीसरी पत्नी बोली, “मैं आपको यह सिद्ध करूँगी कि मैंने आपसे सबसे अधिक प्रेम किया है, पर मैं आपके साथ नहीं चल सकती। मुझे अपनी ज़िन्दगी बहुत प्यारी है।”
राजा की दूसरी पत्नी हर मुश्किल समय में उसका साथ देती आ रही थी। राजा ने उससे भी साथ चलने के लिए पूछा। दूसरी पत्नी ने कहा, “माफ़ कीजिये, महाराज! मैं इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकती। मैं आपका अंतिम संस्कार ज़रूर करवा सकती हूँ और मैं उस वक़्त तक आपके साथ रहूँगी।”
तभी एक आवाज़ आती है, “मैं आपके साथ चलूंगी और जहाँ भी जाएंगे वहां जाऊँगी, भले ही वो मौत के बाद का सफ़र हो।” राजा ने देखा, ये उसकी पहली पत्नी की आवाज़ थी। राजा अब शांति अनुभव करता है कि कोई तो है जो उसे बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करता है। पर पश्चाताप भी होता है कि उन्होंने उस पर सबसे कम ध्यान दिया था।
राजा स्वयं को बहुत शर्मिंदा महसूस करने लगा। उन्होंने कहा, “जब तक मैं जीवित था, तुम्हारा ध्यान नहीं रखा, जबकि तुम्हें मेरी मौत के बाद भी मेरा ध्यान है। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना। मैं अपनी सारी सम्पत्ति का दायित्व तुम्हें सौंपता हूँ। तुम जैसे चाहो, इसका उपयोग कर सकती हो।”
इस कहानी का भावार्थ हमें क्या सिखाता है? वास्तव में यह कथा आपकी, हमारी और प्रत्येक मनुष्य की है। हर व्यक्ति की चार निम्नलिखित पत्नियां होती हैं -
चौथी पत्नी है, हमारा शरीर। हम इसे खूब सजाते हैं, गहने पहनाते हैं, अच्छे कपड़े पहनाते हैं, पर आखिर में ये हमारा साथ छोड़ देती है।
हमारी तीसरी पत्नी होती है धन-संपत्ति। हम जीवन का बहुत सारा समय धन कमाने और घर को साजो-सामान से भरने में लगा देते हैं। वह भी हमारे साथ नहीं चल सकती।
दूसरी पत्नी है हमारा परिवार और दोस्त। वे हमारा हर सुख-दुःख में साथ देते हैं, लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा, वे हमारे आखिरी समय में हमें अलविदा कहने आ सकते हैं, पर साथ में नहीं चल सकते।
पहली पत्नी होती है हमारा चरित्र व संस्कार, जिस पर हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते। पर यह ही वह पत्नी है जो मरने के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ती, सदा साथ जुड़ी रहती है।
हममें से अधिकतर लोग इस कहानी के राजा की तरह ही जीवन जीते हैं। ऊपर लिखे क्रमानुसार ही अपनी पत्नियों से प्रेम करते हैं। हालांकि यह जीवन का आधार भी है और आवश्यक भी है, ताकि हम साजो-सामान के साथ आरामदायक जीवन जियें। परिवार और दोस्तों को, प्यार से संजो कर रखें। अपने शरीर का ध्यान रखें, इसे स्वस्थ रखें। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है संस्कार, जो हमारे साथ अगले जन्म में भी जाएंगे। अतः उच्च संस्कारित बनें और अपने जीवन को सार्थक बनाएं।
--
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद।
Comments
Post a Comment