सुधार और दुलार
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सुधार और दुलार
एक आंख सुधार की, एक आंख दुलार की।
मिडिल क्लास फैमिली में पली-बढ़ी खुशबू अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा गुस्सा अपने पापा से थी। पापा के लिए उसके मन में नफरत के अलावा कुछ न था।
22 साल की हो चुकी खुशबू ने आज तक एक भी वेलेंटाइन डे नहीं मनाया था, जबकि उसकी क्लास मेट्स हर साल अलग-अलग बॉयज के साथ वेलेंटाइन डे मनाती थी।
खैर! आज खुशबू की आग्नेय के साथ शादी हो रही थी। शादी के वक़्त वह सबसे ज्यादा खुश थी कि आखिर इस बेहद स्ट्रिक्ट, कड़क और अनुशासन प्रिय पापा से छुटकारा तो मिला। यह न करो, वह न करो। ऐसे कपड़े न पहनो। लेट नाईट पार्टियाँ नहीं। लड़कों से दोस्ती नहीं।
आज तक एक स्मार्टफ़ोन तक नहीं खरीद कर दिया पापा ने। सारे सपनों और अरमानों को अपने नैरो माइंडेड सोच के कारण कुचलकर रख दिया था। अब मैं आग्नेय के साथ रह कर अपनी सारी दबी इच्छाएँ पूरी करूँगी। आग्नेय और खुशबू पिछले तीन सालों से एक ही कॉलेज में साथ-साथ पढ़ते थे और एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। एक दूसरे की पसंद-नापसंद का अच्छे से ख्याल रखते थे। खुशबू ने बहुत डरते-डरते पापा से आग्नेय के साथ शादी की इच्छा जताई थी और पापा ने आग्नेय और उसके परिवार वालों से मिलकर शादी के लिए हामी भर दी।
खुशबू ने विदाई के समय पहली बार पापा को उससे लिपटकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोते देखा, पर खुशबू को पापा के इमोशन से कोई मतलब नहीं था। वह बस पत्थर की बुत बन कर खड़ी थी। जाते-जाते पापा ने ढेर सारे गिफ्ट के साथ एक बंद लिफाफा भी खुशबू को दिया।
ससुराल पहुँचते ही सबसे पहले खुशबू ने लिफाफा खोल कर पापा की चिट्ठी को पढ़ना शुरु किया - “खुशबू बेटा! मैं जानता हूँ कि पिछले दस सालों से मैं तुम्हारे साथ बैड डैड की तरह पेश आता रहा। मैं तुम्हारे सामने स्ट्रिक्ट इसलिए बनता था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा भी हाल रागिनी जैसा हो। रागिनी मेरे साथ कॉलेज में पढ़ने वाली एक बहुत अच्छे घर की, पढ़ने में तेज, शरीफ लड़की थी परंतु फैशन और नकली ग्लैमर के चक्कर में उसने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर ली थी। उसने वह सब किया जिससे मैं तुम्हें हमेशा रोकता रहा। फैशनेबल कपड़े, लड़कों से दोस्ती, लेट-नाईट पार्टियाँ वह सब करती थी। सोचती कि चरित्र अच्छा है तो इन सब में कोई हर्ज नहीं। फिर एक दिन उसके ड्रिंक्स में नशा डालकर उसके कुछ दोस्तों ने....। इस घटना से वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठी और समाज के तानों और लोगों से आमना-सामना होने से बचने के लिए उसके पापा ने उसकी माँँ और छोटी बहन के साथ सल्फास खाकर सुसाइड कर लिया।
खुशबू बेटा! आज से तुम अब दो परिवारों की इज़्ज़त हो और मैं तुमसे यही उम्मीद करूँगा कि तुम ऐसा कोई काम नहीं करोगी जिससे दोनों परिवारों की इज़्ज़त पर कोई दाग लगे और हो सके तो अपने बैड डैड को माफ कर देना।”
चिट्ठी पढ़कर खुशबू ने फूट-फूट कर रोते हुए तुरंत फ़ोन लगाकर भर्राई आवाज़ में पापा से कहा, “मुझे माफ़ कर दीजिए, पापा! मैं आपके गुस्से के पीछे के प्यार को नहीं देख पाई। आपकी चिल्लाहट के पीछे की केअर नहीं देख पाई। आपकी झुंझलाहट के पीछे का समर्पण नहीं देख पाई। मैं हर जन्म में आपकी ही बेटी बनना चाहूँगी, पापा।”
वक़्त बीतता गया....।
खुशबू को ससुराल आए लगभग एक साल होने को आया, मगर ऐसा कोई दिन न था, जिस दिन उसने अपने पापा को याद न किया हो। आज उसके पापा का जन्मदिन था। सुबह मंदिर गई। पूजा की। अपने पापा की खुशी और सलामती के लिए दुआएँ माँँगी। फिर शाम को केक लाकर अपने ससुराल वालों के साथ उनका जन्मदिन मनाने का प्रोग्राम बनाया।
केक काटने से पहले पापा को वीडियो कॉल लगाया। उधर पापा, मम्मी के साथ उदास बैठे थे। खुशबू उन्हें देखते ही चहक कर बोली, “हैप्पी बर्थडे टू यू, माई स्वीट पापा!! पता है पापा, यहाँ मैं आपकी डाँट, आपके गुस्से को हर दिन मिस करती हूँ। यहाँ सारे लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं, स्पेशली सासु माँ। पता है पापा, एक दिन घर में मुहल्ले की औरतें सासु माँ को यह बोल रही थी कि कितनी अच्छी बहू मिली है तुम्हें, और स्वभाव में कितनी शालीनता है! ज़रूर इसके मम्मी-पापा से विरासत में मिले हैं इसे ये गुण। आज कल की लड़कियों में इतने संस्कार अब कहाँ मिलते हैं? आपके लिए ये शब्द सुनकर पापा मेरा सर फख्र से ऊँचा हो गया।
आज मुझे आप पर प्राउड है पापा। आप मम्मा को हमेशा बोलते थे कि सारी दुनिया को तो सुधार नहीं सकते, बस अपना दामन बचा कर रखना होगा। जानती हूँ पापा और महसूस भी किया है मैंने कि आजकल लड़कियों के लिए बॉयफ्रेंड बनाना, ड्रिंक्स करना, लिव इन रिलेशन रखना और ट्रांसपेरेंट ड्रेस पहनना एक फैशन-सा है, पर आपने एक सुरक्षा कवच बनकर मुझे इन बुराइयों से बचाये रखा।
आपको पता है पापा! जब मैं यहाँ बी.एड. का एग्जाम पास कर टीचर बनूँगी न तो बच्चों को यही सिखाऊँगी कि पापा के तेज़ गुस्से के पीछे का प्यार महसूस कर सको तो कर लो। ऐसा न हो कि बाद में सिर्फ पछताने के सिवा कुछ न रहे।”
दूसरी तरफ पापा के होंठ काँप रहे थे। वह आँखों में आँसू लिए अपनी खुशबू बेटी के लिए बोल रहे थे, “खुश रहो। भगवान करे तुम्हें मेरी उम्र और सारी खुशियाँ लग जाए बेटा!”
मित्रों! सभी परिवार इसी तरह के संस्कार अपने बच्चों को देना चाहते हैं और हर माँ और पिता की यही भावना होती है कि कहीं मेरे दामन में किसी भी प्रकार का दाग न लग जाए।
माता-पिता को बच्चों पर एक आंख सुधार की और एक आंख दुलार की रखनी होगी। केवल लड़कियों को नहीं, अपितु लड़कों को भी सुधारना होगा। तभी वे देश के सभ्य नागरिक बनेंगे और देश में बलात्कार जैसी घिनौनी हरकतों से निजात मिलेगी।
हम बदलेंगे, तभी युग बदलेगा।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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