सुख का स्त्रोत

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सुख का स्त्रोत

Image by bess.hamiti@gmail.com from Pixabay

एक आदमी संन्यासी के पास गया और धन की याचना की। संन्यासी ने कहा - ‘मेरे पास कुछ भी नहीं है।’ उसने बहुत आग्रह किया तो संन्यासी ने कहा - ‘जाओ! सामने नदी के किनारे एक पत्थर पड़ा है, वह ले आओ।’ वह गया और पत्थर ले आया। संन्यासी ने कहा - ‘यह पारसमणि का पत्थर है। इससे लोहा सोना बन जाता है।’

वह बहुत प्रसन्न हुआ। संन्यासी को प्रणाम कर वह वहाँ से चला। थोड़ी दूर जाने पर उसके मन में एक विकल्प उठा। पारसमणि ही यदि सबसे बढ़िया होती, तो संन्यासी इसे क्यों छोड़ता? हो सकता है कि संन्यासी के पास इससे भी बढ़िया कोई वस्तु है। वह फिर आया और प्रणामकर बोला - बाबा! मुझे यह पारसमणि नहीं चाहिए। आप मुझे वह दो, जिसे पाकर आपने इस पारसमणि को ठुकरा दिया।’

संत उसकी बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें ऐसे ही शिष्य की तलाश थी, जो उनके मार्ग पर उनके साथ चल सके और सुख के सच्चे स्त्रोत को पहचान कर औरों को भी उसका पता बता सके। संत के पास रह कर उसने सुख का वह झरना पा लिया, जिसके सामने दुनिया की सारी दौलत फीकी पड़ने लगी।

वह जान गया कि सुख का स्त्रोत संग्रह करने में नहीं, त्याग में है। दूसरों की भलाई करने में ही अपनी भलाई है।

कहने का अर्थ यह है कि पारसमणि को ठुकराने की शक्ति किसी भौतिक सत्ता में नहीं हो सकती। अध्यात्म ही एक ऐसी सत्ता है, जिसकी दृष्टि में पारसमणि का एक पत्थर से अधिक कोई उपयोग नहीं है। आत्मा के आनंद के स्त्रोत का साक्षात्कार होने पर आदमी उसे वैसे ही ठुकरा देता है, जैसे संन्यासी ने पारसमणि को ठुकराया था।

हमारी दशा तो ठीक कस्तूरी मृग के समान हो रही है। कस्तूरी की सुगंध मृग की नाभि में है और उसे खोजने के लिए वह जंगल-जंगल दौड़ता चला जा रहा है। इसी प्रकार मनुष्य भी उस कस्तूरी (शांति व आनंद) की खोज में है, जो उसके स्वयं के भीतर ही है। उसे खोजने के लिए अपने भीतर ही उतरना होगा, कहीं बाहर से वह मिलने वाली नहीं है। तभी तो संतवाणी में कहा गया है कि -

माँहे सुन-सुन आवत हांसी रे, पानी में मीन प्यासी रे।

आत्म-ज्ञान बिना नर भटके, कभी मथुरा कभी काशी रे।।

माँहे सुन-सुन आवत हांसी रे.........।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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