बुजुर्गों को समय चाहिए

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बुजुर्गों को समय चाहिए

Image by นายพิพัฒน์ศักดิ์ ไชยวงษ์ from Pixabay

छोटे ने कहा, “भैया! दादी कई बार कह चुकी हैं, कभी मुझे भी अपने साथ होटल ले जाया करो।”

गौरव बोला - “ले तो जायें, पर चार लोगों के खाने पर कितना खर्च होगा? याद है पिछली बार जब हम तीनों ने डिनर लिया था, तब सोलह सौ का बिल आया था। हमारे पास अब इतने पैसे कहाँ बचे हैं।”

पिंकी ने बताया कि मेरे पास पॉकेट मनी के कुछ पैसे बचे हुए हैं। तीनों ने मिलकर तय किया कि इस बार दादी को भी लेकर चलेंगे। पर इस बार महंगी पनीर की सब्जी की जगह मिक्स वेज मंगवाएंगे और आइसक्रीम भी नहीं खायेंगे।

छोटू, गौरव और पिंकी तीनों दादी के कमरे में गये और बोले, “दादी! इस संडे को लंच बाहर लेंगे। चलोगी हमारे साथ....?”

दादी ने खुश होकर कहा, “तुम ले चलोगे अपने साथ....?”

“हाँ, दादी!”

संडे को दादी सुबह से ही बहुत खुश थी। आज उन्होंने अपना सबसे बढ़िया वाला सूट पहना। हल्का सा मेकअप किया। बालों को एक नये ढंग से बाँधा, आँखों पर सुनहरे फ्रेम वाला नया चश्मा लगाया। यह चश्मा उनका मंझला बेटा बनवाकर दे गया था, जब वह पिछली बार लंदन से आया था, किन्तु वह उसे पहनती नहीं थी। कहती थी - इतना सुन्दर फ्रेम है। पहनूँगी तो पुराना हो जायेगा। आज दादी शीशे में खुद को अलग-अलग एंगल से कई बार देख चुकी थी और संतुष्ट थी।

बच्चे दादी को बुलाने आये तो पिंकी बोली, “अरे वाह दादी! आज तो आप बड़ी क्यूट लग रही हैं।”

गौरव ने कहा, “आज तो दादी ने गोल्डन फ्रेम वाला चश्मा पहना है। क्या बात है, दादी! किसी बॉयफ्रेंड को भी बुला रखा है क्या?”

दादी शर्मा कर बोली, “धत्त....।”

होटल में सेंटर की टेबल पर चारों बैठ गए। थोड़ी देर बाद वेटर आया। बोला, “ऑर्डर प्लीज!”

अभी गौरव बोलने ही वाला था कि दादी बोली, “आज ऑर्डर मैं करूँगी क्योंकि आज की स्पेशल गैस्ट मैं हूँ।”

दादी ने लिखवाया - दालमखनी, कढ़ाईपनीर, मलाईकोफ्ता, रायता वेजिटेबल वाला, सलाद, पापड़, नान बटर वाली और मिस्सी रोटी। हाँ, खाने से पहले चार सूप भी।

तीनों बच्चे एक दूसरे का मुँह देख रहे थे। थोड़ी देर बाद खाना टेबल पर लग गया। खाना टेस्टी था। जब सब खा चुके तो वेटर फिर आया - “डेजर्ट में कुछ, सर!”

दादी ने कहा, “हाँ! चार कप आइसक्रीम।”

तीनों बच्चों की हालत खराब! अब क्या होगा? दादी को मना भी नहीं कर सकते। पहली बार आई हैं....।

बिल आया। इससे पहले गौरव उसकी तरफ हाथ बढ़ाता, बिल दादी ने उठा लिया और कहा, “आज का पेमेंट मैं करूँगी। बच्चों! मुझे तुम्हारे पर्स की नहीं, तुम्हारे समय की आवश्यकता है। तुम्हारी कंपनी की आवश्यकता है। मैं पूरा दिन अपने कमरे में अकेली पड़े-पड़े बोर हो जाती हूँ। टी.वी. भी कितना देखूँ! मोबाइल पर भी चैटिंग कितना करूँ! बोलो, बच्चों! क्या अपना थोड़ा-सा समय मुझे दोगे।” कहते-कहते दादी की आवाज भर्रा गई।

पिंकी अपनी कुर्सी से उठी। उसने दादी को अपनी बाँहों में भर लिया और फिर दादी के गालों पर ‘किस’ करते हुए बोली, “मेरी प्यारी दादी! जरूर....।”

गौरव ने कहा, “यस दादी! हम प्रॉमिस करते हैं कि रोज आपके पास बैठा करेंगे और तय रहा कि हर महीने के दूसरे रविवार को लंच या डिनर के लिए बाहर आया करेंगे और पिक्चर भी देखा करेंगे।”

दादी के होठों पर 1000 वॉट की मुस्कुराहट तैर गई। आँखों में फ्लैश लाइट सी चमक आ गई और चेहरे की झुर्रियां खुशी के कारण नृत्य-सा करती महसूस होने लगी।

बूढ़े माँ-बाप रूई के गट्ठर समान होते हैं। शुरू में उनका बोझ नहीं महसूस होता, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ रुई भीग कर बोझिल होने लगती है।

बुजुर्ग समय चाहते हैं, पैसा नहीं। पैसा तो उन्होंने सारी जिंदगी आप के लिए ही कमाया है कि बुढ़ापे में आप उन्हें समय देंगे।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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धन्यवाद।

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