जीवन है एक खाली महल

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जीवन है एक खाली महल

Image by Ralph from Pixabay

हमारा जीवन एक खाली महल की तरह है। अब हम चिंतन करें कि हमें अपने जीवन के महल को किस तरह से भरना है।

एक राजा था। उसे अपने उत्तराधिकारी की चिंता हुई। विभिन्न राज्यों से तीनों राजकुमारों को आमंत्रित किया गया और अलग-अलग तीन महलों को बनवा कर उन्हें एक सप्ताह के अंदर भरने का आदेश दे दिया गया। तीनों को इस कार्य के लिए राशि सिर्फ एक हज़ार रुपए ही दी गई। पहले राजकुमार को उसके मित्र ने सलाह दी कि जुआ खेलो, जिससे ज्यादा रुपया आ जाएगा और किसी भी चीज से महल को भर लेना। वरना एक हज़ार रुपए में आएगा ही क्या? राजकुमार वह रुपए जुए में हार गया और उसका महल खाली ही रह गया।

दूसरे राजकुमार के मन में यह भाव आया कि एक हज़ार रुपए में क्या होगा? और चिंतन करने पर उसने रास्ता निकाल लिया।

तीसरे ने भी बहुत सोच-समझकर एक रास्ता तलाश किया।

राजा ने पहले राजकुमार के महल को देखा, तो वह खाली पड़ा था। राजकुमार को उदास देखा तो उससे उसके कार्य की सारी जानकारी ली और उसके कुसंस्कारों को कोसता हुआ आगे बढ़ गया।

दूसरा बहुत प्रसन्न था, परंतु यह क्या? उसके महल से बहुत दुर्गन्ध आ रही थी। पूछने पर वह बोला - एक हजार रुपए में आता ही क्या है? बड़ी मुश्किल से सारे नगर का कचरा एक हजार रुपए में खरीदा है। राजा निराश हो गया। उसने सोचा कि महल तो भरा है परंतु गंदगी से भरा है। यह इसके विकृत संस्कारों का ही परिणाम है।

तीसरे राजकुमार के महल पर पहुंचकर देखा कि महल खाली पड़ा है और उसके बीच में केवल एक दीप रखा है। राजा की समझ में कुछ नहीं आया। राजकुमार ने कहा - बस! एक मिनट ठहरो, राजा साहब! राजकुमार ने महल में रखे दीप को प्रज्ज्वलित किया और साथ ही साथ अगरबत्ती और धूप की सुगंध से सारे महल को महका दिया। राजा आश्चर्यचकित रह गया। राजकुमार ने राजा से कहा - इस सारे महल को सुगंध एवं प्रकाश से भरने में मैंने केवल 100 रुपए व्यय किए हैं। ये लो अपने बाकी के नौ सौ रुपए।

राजकुमार की बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर राजा ने उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यह था सुसंस्कारों का प्रभाव। बस! मैं भी आप सब से यही कहना चाहता हूँ कि अपने जीवन के महल को हम सब भी भरें पर उससे पहले यह विचार लेना जरूरी है कि जीवन का महल किस प्रकार के संस्कारों से भरें। सुगंध और प्रकाश से या दुर्गन्ध और विनाश से।

कुसंस्कार विनाश की ओर ले जाते हैं, विकृत संस्कार का फल नफरत व घृणा है और सुसंस्कार हमें सबका प्रिय बनाते हैं और राजसिंहासन प्रदान करते हैं।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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धन्यवाद।

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