मांस का मूल्य

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मांस का मूल्य

Image by andrew kim from Pixabay

मगध सम्राट् बिन्दुसार ने एक बार अपनी सभा में पूछा - देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है?

मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये। चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता।

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा - राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है। इसे पाने में  मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।

सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधानमंत्री चाणक्य चुप थे।

तब सम्राट् ने उनसे पूछा - आपका इस बारे में क्या मत है?

चाणक्य ने कहा - मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूँगा।

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल में पहुंचे। सामन्त ने द्वार खोला। वह इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया।

प्रधानमंत्री ने कहा - शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं। राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के कलेजे का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके कलेजे का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूँ। इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें और देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहाँ पहुंचे और सभी से उनके कलेजे का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दी।

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख दी।

सम्राट् ने पूछा - यह सब क्या है?

तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। राजन्! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है? जीवन अमूल्य है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है। लेकिन वे अपनी जान बचाने मे असमर्थ हैं और मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है - बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि।

पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं। तो क्या बस इसी कारण उनसे जीने का अधिकार छीन लिया जाए?

शुद्ध आहार, शाकाहार।

मानव आहार, शाकाहार।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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