प्रेम से जियो
👼👼💧💧👼💧💧👼👼
प्रेम से जियो
Image by Martin Winkler from Pixabay
दो भाई थे। वे परस्पर बड़े ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे। बड़ा भाई कोई वस्तु लाता तो छोटे भाई तथा उसके परिवार के लिए भी अवश्य ही लाता। छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता।
पर एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा-सुनी हो गई। बात बढ़ गई और छोटे भाई ने बड़े भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था? दोनों के बीच दरार पड़ ही गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और कोई किसी से नहीं बोला। कई वर्ष बीत गये। मार्ग में आमने-सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते। छोटे भाई की कन्या का विवाह का अवसर आया। उसने सोचा कि बड़े अंत में बड़े ही होते हैं। जाकर मना लाना चाहिए।
वह बड़े भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा मांगने लगा। बोला - ‘भैया! अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए।’
पर बड़ा भाई न पसीजा। चलने से साफ मना कर दिया। छोटे भाई को बहुत दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाकर लाया जाए। इधर विवाह के भी बहुत ही थोड़े दिन रह गये थे। संबंधी आने लगे थे।
किसी ने कहा - ‘उसका बड़ा भाई एक संत के पास नित्य जाता है और उनका कहना भी मानता है।’
छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बात बताते हुए अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और प्रार्थना की कि ‘आप किसी भी प्रकार मेरे भाई को मेरे यहाँ आने के लिए तैयार कर दें।’
दूसरे दिन जब बड़ा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने पूछा - ‘तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है। तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो?’
बड़ा भाई बोला - ‘मैं विवाह में सम्मिलित नहीं हो रहा हूँ। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।’
संत जी ने कहा जब सत्संग समाप्त हो जाए तो जरा मुझसे मिलते जाना।
सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा।
उन्होंने पूछा - ‘मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था, उसमें क्या बतलाया गया था?’
बड़ा भाई मौन! कहा - ‘कुछ याद नहीं पड़ता कि कौन सा विषय था?’
संत ने कहा - ‘अच्छी तरह याद करके बताओ।’
पर प्रयत्न करने पर भी उसे वह विषय याद नहीं आया।
संत बोले - ‘देखो। मेरी बताई हुई अच्छी बात तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रही और छोटे भाई के कड़वे बोल जो कुछ वर्ष पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे हैं। जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते, तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे और जब जीवन नहीं सुधारा तब सत्संग में आने का क्या लाभ? अतः कल से यहाँ मत आया करो।’
अब बड़े भाई की आँखें खुली। अब उसने आत्म-चिंतन किया और देखा कि मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ। छोटों की बुराई भूल जाना चाहिए। इसी में बड़प्पन है।
उसने संत के चरणों में सिर नवाते हुए कहा - ‘मैं समझ गया गुरुदेव! अभी छोटे भाई के पास जाता हूँ। आज मैंने अपना गंतव्य पा लिया।’
शिक्षा -
जीते जी वैर रखना और मरने के बाद फोटो के ऊपर फूल चढ़ाकर हाथ जोड़ना - यह कैसी परंपरा है। दुनिया में सबसे प्यार से व्यवहार करना सीखो।
--
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद।
Comments
Post a Comment