बिटिया राधा रानी

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बिटिया राधा रानी

Image by Albrecht Fietz from Pixabay

बरसाने में एक सेठ रहते थे। उनकी तीन-चार दुकानें थी। बहुत अच्छी तरह चलती थी। तीन बेटे और तीन बहुएं थी। सब आज्ञाकारी थे पर सेठ के मन में एक इच्छा थी। उनके बेटी नहीं थी। संतों के दर्शन से उसकी चिन्ता कम हुई। संत बोले - मन में अभाव हो, तो उसमें भगवान का भाव स्थापित कर लो।

सुनो सेठ तुमको मिल्यो बरसाने का वास।

यदि मानो नाते राधे सुता, काहे रहत उदास॥

सेठ जी ने राधा-रानी का एक चित्र मंगवाया और अपने कमरे में लगा कर उसके साथ पुत्री भाव से रहते। रोज सुबह राधे-राधे कहते, भोग लगाते और दुकान से लौटकर राधे-राधे कहकर सोते।

तीन बहू बेटे हैं घर में, सुख सुविधा है पूरी।

संपत्ति भरि भवन रहती, नहीं कोई मजबूरी॥

कृष्ण कृपा से जीवन पथ पे, आती न कोई बाधा।

मैं बहुत बड़भागी पिता हूँ, मेरी बेटी है राधा॥

एक दिन एक मनिहारी चूड़ी पहनाने सेठ के अहाते में दरवाज़े के पास आ गयी। चूड़ी पहनने की गुहार लगाई। तीनों बहुएँ बारी-बारी से चूड़ी पहन कर चली गयी। फिर एक हाथ और बढ़ा तो मनिहारी ने सोचा कि कोई रिश्तेदार आया होगा। उसने उसे भी चूड़ी पहनाई और चली गयी।

उसने सेठ की दुकान पर पहुँच कर पैसे मांगे और कहा कि इस बार पैसे पहले से ज्यादा चाहिए। सेठ जी बोले कि क्या चूड़ी मंहगी हो गयी हैं? मनिहारिन बोली - नहीं सेठ जी! आज मैं चार लोगों को चूड़ी पहना कर आ रही हूँ। सेठ जी ने कहा कि तीन बहुओं के अलावा चौथा कौन है? झूठ मत बोल। यह ले तीन का पैसा। मैं घर पर पूछूँगा, तब एक का पैसा और दूँगा। अच्छा! कहकर मनिहारिन तीन का पैसा ले कर चली गयी।

सेठ जी ने घर पर पूछा कि चौथा कौन था जिसने चूड़ी पहनी है? बहुएँ बोली - हम तीन के अलावा तो कोई भी नहीं था।

रात को सोने से पहले सेठ सुता राधा रानी को स्मरण करके सो गये। नींद में राधा जी प्रगट हुई। सेठ जी बोले, “बेटी! बहुत उदास हो। क्या बात है?”

वृषभानु दुलारी बोली -

तनया बनायो तात, नात ना निभायो।

चूड़ी पहनि लीनी मैं, जानि पितु गेह।

आप मनिहारिन को मोल ना चुकायो।

तीन बहू याद, किन्तु बेटी नहीं याद रही।

कहत श्री राधिका को नीर भरि आयो है।

कैसी भई दूरी कहो, कौन मजबूरी हाय।

आज चार चूड़ी काज मोहि बिसरायो है।

सेठ जी की नींद टूट गयी पर नयनों का नीर नहीं टूटा। रोते रहे, सवेरा हुआ। स्नान-ध्यान करके मनिहारिन के घर सुबह-सुबह पहुँच गये। मनिहारिन उन्हें देखकर चकित हुई। सेठ जी आँखों में आंसू लिये बोले -

धन धन भाग तेरो मनिहारिन,

तोरे से बड़भागी नहीं कोई,

संत-महंत पुजारी,

धन-धन भाग तेरो मनिहारिन।

मनिहारिन बोली - सेठ जी! क्या हुआ?

सेठ आगे बोले -

मैंने मानी सुता (पुत्री), किन्तु निज नैनन नहीं निहारिन।

चूड़ी पहन गयी तव कर ते, श्री वृषभानु दुलारी।

धन-धन भाग तेरो मनिहारिन।

बेटी की चूड़ी पहिराई लेहु जाहू तौ बलिहारी।

जन जोडि कर करियो चूक हमारी।

जुगल नयन जलते भरि मुख ते कहे न बोल।

मनिहारिन के पांय पड़ि, लगे चुकावन मोल।

मनिहारिन ने सोचा -

जब तोहि मिलो अमोल धन।

अब काहे मांगत मोल।

ऐ मन मेरो प्रेम से, श्री राधे-राधे बोल। 

श्री राधे-राधे बोल! श्री राधे-राधे बोल!!

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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