आज और कल
👼👼💧💧👼💧💧👼👼
आज और कल
आपका आज का कार्य ही तय करेगा कि कल आप क्या करेंगे?
सूखे के कारण माधवपुर गाँव के किसान बहुत परेशान थे। धरती से पानी गायब हो चुका था। ट्यूबवेल जवाब दे चुके थे, खेती करने के लिए सभी बस इंद्र की कृपा पर निर्भर थे।
बहुत से पूजा-पाठ और यज्ञों के बावजूद बारिश होने का नाम नहीं ले रही थी। हर रोज किसान एक जगह इकट्ठा होते और बादलों को ताकते रहते कि कब बारिश हो और वे खेतों में काम के लिए लौट सकें।
आज भी सभी बारिश के इंतज़ार में बैठे हुए थे कि तभी किसी ने कहा, “अरे! ये हरिया कहाँ रह गया? दो-तीन दिन से वह आ नहीं रहा। कहीं मेहनत-मज़दूरी करने शहर तो नहीं चला गया?”
बात हंसी में टल गयी पर जब अगले दो-तीन दिन हरिया दिखाई नहीं दिया तो सभी उसके घर पहुंचे।
“बेटा! तेरे बाबूजी कहाँ हैं?”, हरिया के बेटे से किसी ने प्रश्न किया।
“पापा खेत में काम करने गए हैं”, बेटा यह कहते हुए अन्दर की ओर भागा।
“खेत में काम करने।” सभी को बहुत आश्चर्य हुआ कि हरिया ऐसा कैसे कर सकता है?
“लगता है इस गर्मी में हरिया पगला गया है।” किसी ने चुटकी ली और सभी ठहाका लगाने लगे।
लेकिन सबके अन्दर कौतूहल था कि हरिया खेत में क्या कर रहा होगा और सभी उसे देखने के लिए चल पड़े।
उन्होंने देखा कि हरिया खेत में गड्ढा खोद रहा था।
“अरे! हरिया! ये तू क्या कर रहा है?”
“कुछ नहीं बस बारिश होने के बाद की तैयारी कर रहा हूँ।”
“जहाँ बड़े-बड़े जतन करने से बारिश नहीं हुई, वहाँ तेरा ये गड्ढा खोदने का टोटका कहाँ काम आने वाला है।”
“नहीं-नहीं! मैं टोटका नहीं कर रहा। मैं तो बस कोशिश कर रहा हूँ कि जब बारिश हो तो मैं हर तरफ का बहाव इस जलाशय की ओर कर के इसमें ढेर सारा पानी इकट्ठा कर सकूँ, ताकि अगली बार बारिश के बिना भी कुछ दिन काम चल जाए।”
“इस बार का ठिकाना नहीं और तू अगली बार की बात कर रहा है! महीनों बीत गए और एक बूँद नहीं टपकी है आसमान से। ये बेकार की मेहनत में समय बर्बाद मत कर। चल हमारे साथ वापस चल।”
लेकिन हरिया ने उनकी बात अनसुनी कर दी और कुछ दिनों में अपना जलाशय तैयार कर लिया।
ऐसे ही कई दिन और बीत गए, पर बारिश नहीं हुई। फिर एक दिन अचानक ही रात में बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। बिजली चमकने लगी और बारिश होने लगी।
मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू सारे इलाके में फ़ैल गयी। किसानों के चेहरे खिल उठे। सभी सोचने लगे कि बस! अब उनके बुरे दिन खत्म हो जायेंगे, लेकिन ये क्या कुछ देर बरसने के बाद बारिश थम गयी और किसानों की ख़ुशी भी जाती रही।
अगली सुबह सब खेतों का जायजा लेने पहुंचे। मिट्टी बस ऊपर से गीली भर हो पायी थी। ऐसे में खेतों की जुताई शुरू तो हो सकती थी लेकिन सिंचाई के लिए और भी पानी की ज़़रुरत पड़ती। किसान मायूस हो अपने घरों को लौट गए।
दूसरी तरफ हरिया भी अपने खेत पहुँचा और लबालब भरे छोटे से जलाशय को देखकर खुश हो गया। समय गँवाए बिना उसने हल उठाया और खेत जोतना शुरू कर दिया। कुछ ही महीनों में माधवपुर के सूखाग्रस्त इलाके में बस एक ही चीज हरी-भरी दिखाई दे रही थी - हरिया का खेत।
प्रकृति का नियम है कि दिन के बाद रात तो रात के बाद दिन आना ही आना है। बस! इतना समझ लीजिये कि आज आप क्या कर रहे हैं यही तय करेगा कि कल आप क्या करेंगे।
इसलिए अगर असफल लोगों की भीड़ का हिस्सा नहीं बल्कि मुट्ठी भर कामयाब लोगों के समूह का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो इस आज को अपना बनाइये।
उठाइये अपने औजार और तैयारी करिए लहलहाती फसल की। सुखों की बारिश बस होने ही वाली है।
--
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद।
Comments
Post a Comment