विजेता मेंढक

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विजेता मेंढक

Image by Joe from Pixabay

बहुत समय पहले की बात है। एक सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सरोवर के बीचों-बीच एक बहुत पुराना धातु का खम्भा भी लगा हुआ था, जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने लगवाया था। खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिल्कुल चिकनी थी।

एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों न एक रेस करवाई जाए। रेस में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को खम्भे पर चढ़ना होगा और जो सबसे पहले ऊपर पहुँच जाएगा वही विजेता माना जाएगा।

रेस का दिन आ पहुँचा। चारों तरफ रेस देखने वालों की बहुत भीड़ थी। आस-पास के इलाकों से भी कई मेंढक इस रेस में हिस्सा लेने पहुँचे। माहौल में सरगर्मी थी। हर तरफ शोर ही शोर था।

रेस शुरू हुई........।

लेकिन चिकने खम्भे को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी मेंढक को यह यकीन नहीं हुआ कि कोई भी मेंढक ऊपर तक पहुँच पायेगा।

हर तरफ यही सुनाई देता -

“अरे! ये रेस बहुत कठिन है....।”

“मेंढक कभी भी ये रेस पूरी नहीं कर पायेंगे....।”

“सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं, इतने चिकने खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता....।”

और यही हो भी रहा था। जो भी मेंढक चढ़ने की कोशिश करता, वह थोड़ा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता।

कई मेंढक दो-तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे।

पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी - “ये नहीं हो सकता, असंभव....असंभव....” और वे उत्साहित मेंढक भी यह सुन-सुनकर हताश हो गए और सबने अपना प्रयास छोड़ दिया।

लेकिन उन्हीं मेंढकों के बीच एक छोटा-सा मेंढक था, जो बार-बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था। वह लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और अंततः वह खम्भे के ऊपर पहुँच गया और इस रेस का विजेता बना।

उसकी जीत पर सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। सभी पत्रकार मेंढक उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे, “तुमने यह असंभव काम कैसे कर दिखाया? भला तुम्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली? ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने यह विजय कैसे प्राप्त की?”

वह मेंढक बिना कुछ बोले चुपचाप खड़ा रहा। तभी पीछे से एक आवाज़ आई, “अरे! उससे क्या पूछते हो, वह तो बहरा है।”

यही अवस्था हमारे जीवन में होती है। अक्सर हमारे अन्दर भी अपना लक्ष्य प्राप्त करने की काबिलियत होती है, पर हम अपने चारों तरफ मौजूद नकारात्मकता की वजह से खुद को कम आंक बैठते हैं और हमने जो बड़े-बड़े सपने देखे होते हैं, उन्हें पूरा किये बिना ही अपनी ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम हमें कमज़ोर बनाने वाली हर एक आवाज के प्रति बहरे और ऐसे हर एक दृश्य के प्रति अंधे हो जाएं और तब हमें सफलता के शिखर पर पहुँचने से कोई नहीं रोक पायेगा।

ज़िंदगी चाहे एक दिन की हो, चाहे चार दिन की।

उसे ऐसे जियो, जैसे ज़िंदगी तुम्हें नहीं, ज़िंदगी को तुम मिले हो।

--

 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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धन्यवाद।

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