संसार का नियम

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संसार का नियम

Image by Stefan Schweihofer from Pixabay

एक ग़रीब परिवार था। खाने को कुछ नहीं था। काफी सोचा कि काम मिले, मगर कोई काम नहीं मिला। परिवार में दो बच्चे थे और पत्नी थी। एक दिन उन्हें विचार आया कि इस गांव में काम मिलना मुश्किल है। चलो, कहीं और चलते हैं।

इस इरादे से वे एक दिन गांव छोड़कर चल दिये। रात का समय था, रास्ता भी जंगली था।

सोचा कि वृक्ष के नीचे रात गुज़ारी जाये। आदमी ने अपने एक लड़के को लकड़ी चुनने तथा दूसरे को पानी लाने के लिए भेज दिया तथा पत्नी को चूल्हा बनाने के लिए कहा और उसने जगह साफ़ कर दी। चारों ने अपने-अपने काम कर लिए। चूल्हा जलाया गया, पानी गर्म होने लग गया।

वृक्ष के ऊपर एक हंस रहता था। वह सोचने लगा - ये कैसे मूर्ख हैं? इन्होंने चूल्हा तो जला लिया, मगर इनके पास पकाने को तो है ही नहीं कुछ भी।

हंस ने उनसे पूछा - तुम्हारे पास पकाने को क्या है?

वह आदमी बोला - तुझे मार कर खायेंगे।

हंस बोला - मुझे क्यों मारोगे?

आदमी बोला - हमारे पास न पैसा है और न ही सामान, तो क्या करें?

हंस सोच में पड़ गया। इन्होंने चूल्हा भी जला लिया है। सब कर्मशील हैं, मुझे तो ये खा ही जायेंगे।

हंस बोला - अगर मैं आपको धन दे दूँ, तो क्या मुझे छोड़ दोगे?

घर का स्वामी बोला - हाँ, छोड़ देंगे।

हंस कहने लगा - मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें धन देता हूँ।

हंस उनको थोड़ी दूर ले गया और चोंच से इशारा किया और कहा कि यहाँ से धन निकाल लो।

उन्होंने गड्ढा खोदा और वहाँ वास्तव में धन से भरा घड़ा मिला। उसने वह धन निकाल लिया।

हंस का धन्यवाद कर के वे वापिस अपने गांव आ गये और एक ही दिन में धनवान बन कर खूब मौज से रहने लगे।

अब उनके घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। पड़ोसी ने देखा कि इस परिवार को ऐसा कौन-सा गड़ा खजाना हाथ लग गया, जो इनके पास इतनी समृद्धि आ गई।

उसने छोटे लड़के को बुला कर सारी बात पूछ ली कि पैसा कहाँ से आया है।

उनके भी दो बच्चे थे। उन्होंने भी ऐसी योजना बनाई और चल दिये।

उन्होंने भी उसी वृक्ष के नीचे डेरा लगा लिया। आदमी ने अपने बड़े लड़के को कहा कि लकड़ी लाओ तथा छोटे लड़के को पानी लाने के लिए कहा, परन्तु दोनों आनाकानी करने लगे। पत्नी ने भी कहा कि मैं थक चुकी हूँ। अब मुझ से चूल्हा नहीं जलता।

जैसे-तैसे लकड़ी इकट्ठी की गई और चूल्हे पर पानी गर्म होने लगा।

हंस फिर आया और बोला - तुम्हारे पास खाना बनाने को तो कुछ है नहीं, तो फिर पानी क्यों गर्म कर रहे हो?

आदमी बोला - तुझे मार कर खायेंगे।

हंस मुस्कुरा उठा और बोला - मारने वाले तो तीन दिन पहले आये थे। तुम अपना समय खराब मत करो। घर जाओ। तुम मुझे क्या मारोगे? तुम तो आपस में ही लड़ रहे हो। जिन्हें दूसरों को जीतना होता है, वे खुद नहीं लड़ते।

वे चारों मुँह लटका कर वापिस अपने घर आ गए।

संसार का नियम भी ऐसा ही है। जिन लोगों को तरक्की करनी है, वे मिलकर चलते हैं और आज भी संसार में उनका ही बोल-बाला है। जो आपसी तालमेल में रहते हैं वे ही उन्नति रूपी हंस के मन को जीत सकते हैं। जो अपनी सारी शक्ति आपसी लड़ाई में ही नष्ट कर देते हैं, उन्हें किसी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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