सुन्दर और दुर्लभ सत्य कथा

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सुन्दर और दुर्लभ सत्य कथा

Image by pkong88 from Pixabay

एक बार गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा - ‘हे कृष्ण! हमें अगस्त्य ऋषि को भोग लगाने जाना है और यह यमुना जी बीच में पड़ती हैं। अब बताओ कैसे जाएँ?’

भगवान श्री कृष्ण ने कहा - जब तुम यमुना जी के पास जाओ, तो कहना कि हे यमुना जी! अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी हैं, तो हमें रास्ता दें।

गोपियाँ हंसने लगी कि लो! ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझता है। सारा दिन तो हमारे पीछे-पीछे घूमता है, कभी हमारे वस्त्र चुराता है, कभी मटकियाँ फोड़ता है। खैर! फिर भी हम बोल देंगी।

गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर कहती हैं - हे यमुना जी! अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी हैं, तो हमें रास्ता दें।

और गोपियों के कहते ही यमुना जी ने रास्ता दे दिया।

गोपियाँ तो सन्न रह गई कि ये क्या हुआ, कृष्ण और ब्रह्मचारी?

जब गोपियाँ अगस्त्य ऋषि को भोजन करवा कर वापिस आने लगी, तो उन्होंने अगस्त्य ऋषि से कहा कि अब हम घर कैसे जाएँ? यमुना जी बीच में पड़ेंगी।

अगस्त्य ऋषि ने कहा कि तुम यमुना जी को कहना - अगर अगस्त्य जी निराहार हैं, तो हमें रास्ता दें।

गोपियाँ मन में सोचने लगी कि अभी हम इतना सारा भोजन लाई, सो सब गटका गये और अब अपने आप को निराहार बता रहे हैं?

गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर बोली - हे यमुना जी! अगर अगस्त्य ऋषि निराहार हैं तो हमें रास्ता दें।

और यमुना जी ने रास्ता दे दिया।

गोपियाँ आश्चर्य करने लगी कि जो खाता है वह निराहार कैसे हो सकता है? और जो दिन-रात हमारे पीछे-पीछे फिरता है, वह ब्रह्मचारी कैसे हो सकता है?

इसी उधेड़ बुन में गोपियों ने कृष्ण के पास आकर फिर से वही प्रश्न किया।

भगवान श्री कृष्ण कहने लगे - गोपियों! मुझे तुम्हारी देह से कोई लेना-देना नहीं है। मैं तो तुम्हारे प्रेम के भाव को देख कर तुम्हारे पीछे आता हूँ। मैंने कभी वासना के तहत संसार नहीं भोगा। मैं तो निर्मोही हूँ। इसलिए यमुना ने आप को मार्ग दिया।

तब गोपियाँ बोली - भगवन्! मुनिराज ने तो हमारे सामने भोजन ग्रहण किया, फिर वे क्यों बोले कि अगस्त्य आजन्म उपवासी हों, तो हे यमुना मैया! मार्ग दे दें। और बड़े आश्चर्य की बात है कि यमुना जी ने मार्ग दे दिया।

श्री कृष्ण हंसने लगे और बोले कि अगस्त्य आजन्म उपवासी हैं। अगस्त्य मुनि भोजन ग्रहण करने से पहले मुझे भोग लगाते हैं और उनका भोजन में कोई मोह नहीं होता, उनको कतई मन में नहीं होता कि मैं भोजन करूँ या मैं भोजन कर रहा हूँ। वे तो अपने अंदर रह कर मुझे भोजन करा रहे होते हैं, इसलिए वे आजन्म उपवासी हैं।

जो मुझसे प्रेम करता है, मैं उनका सच में ऋणी हूँ और मैं तुम सभी का ऋणी हूँ।

राधे-राधे।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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धन्यवाद।

Comments

  1. भक्तिभाव और आस्था की पराकाष्ठा से ईश्वरीय शक्ति में विश्वास से क्या नहीं संभव हो सकता। यही सार और ज्ञान है।

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