डॉ. विश्वेश्वरैया
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डॉ. विश्वेश्वरैया
Image by myungho lee from Pixabay
ब्रिटेन में एक ट्रेन द्रुत गति से दौड़ रही थी। ट्रेन अंग्रेजों से भरी हुई थी। उसी ट्रेन के एक डिब्बे में अंग्रेजों के साथ एक भारतीय भी बैठा हुआ था।
डिब्बा अंग्रेजों से खचाखच भरा हुआ था। वे सभी उस भारतीय का मजाक उड़ाते जा रहे थे। कोई कह रहा था - देखो कौन नमूना ट्रेन में बैठ गया, तो कोई उनकी वेशभूषा देखकर उन्हें गंवार कहकर हँस रहा था। कोई तो इतने गुस्से में था कि ट्रेन को कोसकर चिल्ला रहा था - एक भारतीय को ट्रेन मे चढ़ने क्यों दिया? इसे डिब्बे से उतारो।
किंतु उस धोती-कुर्ता, काला कोट एवं सिर पर पगड़ी पहने शख्स पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह शांत, गम्भीर भाव से बैठा था, मानो किसी उधेड़बुन में लगा हो।
ट्रेन द्रुत गति से दौड़े जा रही थी औऱ अंग्रेजों का उस भारतीय का उपहास, अपमान भी उसी गति से जारी था।
किन्तु यकायक वह शख्स सीट से उठा और जोर से चिल्लाया - “ट्रेन रोको...., तुरंत रोको ट्रेन....।”
कोई कुछ समझ पाता उससे पूर्व ही उसने ट्रेन की जंजीर खींच दी।
ट्रेन रुक गई।
अब तो जैसे अंग्रेजों का गुस्सा फूट पड़ा। सभी उसको गालियां दे रहे थे। गंवार, जाहिल जितने भी शब्द शब्दकोश में थे, बौछार कर रहे थे, किंतु वह शख्स गम्भीर मुद्रा में शांत खड़ा था। मानो उस पर किसी की बात का कोई असर न पड़ रहा हो।
उसकी चुप्पी अंग्रेजों का गुस्सा और बढ़ा रही थी।
ट्रेन का गार्ड दौड़ा-दौड़ा आया। कड़क आवाज में पूछा - “किसने ट्रेन रोकी....?”
कोई अंग्रेज बोलता उससे पहले ही वह शख्स बोल उठा - “मैंने रोकी है, श्रीमान्!”
“पागल हो क्या? पहली बार ट्रेन में बैठे हो? तुम्हें पता है, बिना कारण ट्रेन रोकना अपराध है”, गार्ड गुस्से में बोला।
“हाँ श्रीमान्, ज्ञात है किंतु मैं ट्रेन न रोकता तो सैंकड़ों लोगो की जान चली जाती।”
उस शख्स की बात सुनकर सब जोर-जोर से हंसने लगे। किंतु उसने बिना विचलित हुये, पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा - यहाँ से करीब एक फरलाँग (220 गज) की दूरी पर पटरी टूटी हुई है। आप चाहें तो चलकर देख सकते हैं।”
गार्ड के साथ वह शख्स और कुछ अंग्रेज सवारी भी साथ चल दी।
रास्ते भर भी अंग्रेज उस पर फब्तियां कसने में कोई कोर-कसर नहीं रख रहे थे, किंतु सबकी आँखें उस वक्त फ़टी की फटी रह गई जब वाक़ई बताई गई दूरी के आस-पास पटरी टूटी हुई थी।
नट-बोल्ट खुले हुए थे।
अब गार्ड सहित वे सभी चेहरे, जो उस भारतीय को गंवार, जाहिल, पागल कह रहे थे, सब बहुत अचंभित थे। वे सभी उसकी ओर कौतूहलवश देखने लगे।
मानो पूछ रहे हों कि आपको ये सब इतनी दूरी से कैसे पता चला?
गार्ड ने पूछा - तुम्हें कैसे पता चला कि पटरी टूटी हुई है?
उसने कहा - श्रीमान्! लोग ट्रेन में अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। उस वक्त मेरा ध्यान ट्रेन की गति पर केंद्रित था। ट्रेन स्वाभाविक गति से चल रही थी। किन्तु अचानक पटरी की कम्पन से उसकी गति में परिवर्तन महसूस हुआ। ऐसा तब होता है, जब कुछ दूरी पर पटरी टूटी हुई हो। अतः मैंने बिना क्षण गंवाए, ट्रेन रोकने हेतु जंजीर खींच दी।
अब तो अपने आप को आधुनिक मानने वाले, आधुनिक वेशभूषा वाले सभी अंग्रेज बहुत शर्मिंदा हो रहे थे।
गार्ड और वहाँ खड़े अंग्रेज दंग रह गये।
गार्ड ने पूछा - इतना बारीक तकनीकी ज्ञान! आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं लगते। अपना परिचय दीजिये।
शख्स ने बड़ी शालीनता से जवाब दिया - श्रीमान्! मैं इंजीनियर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया।
जी हाँ! वह असाधारण शख्स कोई और नहीं “डॉ विश्वेश्वरैया” ही थे, जो देश के “प्रथम आधुनिक इंजीनियर” थे जिनका 15 सितम्बर को जन्मदिवस आता है।
उनके जन्मदिवस को देश भर में अभियंता दिवस (इंजीनियर डे) के रूप में धूमधाम से मनाते हैं।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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