मोदक भोग
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मोदक भोग
Image by Mary Basket from Pixabay
जब ठाकुर जी ने मोदक भोग लगायो।
एक थे गवारिया बाबा। वृन्दावन में ही रहते थे। बिहारी जी को अपना यार कहते थे। सिर्फ कहते नहीं, मानते भी थे। नियम था बिहारी जी को नित्य सांय शयन करवाने जाते थे। एक बार शयन आरती करवाने जा रहे थे। बिहारी जी की गली में बढ़िया मोदक बन रहे थे। अच्छी खुशबू आ रही थी। चार मोदक मांग लिए बिहारी जी के लिए। वृन्दावन के लोग बिहारी जी के भक्तों का बहुत आदर करते हैं। उन्होंने मना नहीं किया। एक दोने में बांध दिये साथ में। बाबा भीतर गए तो बिहारी जी के भोग के पट बंद हो चुके थे।
गवारिया बाबा जी ने वहीं बैठकर अपना कम्बल बिछाया और उस पर बैठकर अपने मन के भाव में खो गए। वहाँ बिहारी जी की आरती का समय हुआ तो श्री गौसाई जी बहुत प्रयास कर रहे हैं लेकिन ठाकुर जी के मंदिर का पट नहीं खुल रहा। बड़े हैरान इधर-उधर देखते रहे। एक संत कोने में बैठे सब दृश्य आरंभ से देख रहे थे। पुजारी जी ने लाचारी से देखा तो संत बोले - उधर गवारिया बाबा बैठे हैं। उनसे पूछो, वह बता देंगे।
गौसाई जी ने बाबा से कहा - रे बाबा! तेरे यार तो दरवाजा ही न खोल रहियो? बाबा हड़बड़ा कर उठे। रोम-रोम पुलकित हो रहा था बाबा का। बाबा ने कहा - जय....जय.... और बाबा ने पुजारी से कहा - अब जाओ और दरवाजा खोलो।
पुजारी जी ने तब मंदिर खोला और दरवाज़ा खोलने का प्रयास किया, लेकिन हल्का सा छूते ही दरवाजा खुल गया। पुजारी जी ने आरती की और बिहारी जी को शयन करवा दिया। लेकिन आज पुजारी जी के मन में यह बात लगी कि आज मैं प्रयास करके हार गयो लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। लेकिन बाबा ने कहा और दरवाजा खुल गया। पुजारी जी गवारिया बाबा के पास गए और कहा - बाबा! आज तुझे तेरे यार की सौगंध है। साँची-साँची कह दे, आज तेरे यार ने क्या खेल खेलो?
गवारिया बाबा हंस दिए। कहते - जय....जय....। जब आप भोग के लिए दरवाजा खोल रहे थे तब बिहारी जी मेरे पास मोदक खा रहे थे। अभी मैंने उनका मुंह भी नहीं धुलाया था कि आपने आवाज़ दे दी। उनका मुंह साफ कर देना। जाइये! उनका मुख तो धुला दीजिये। उनके मुख पर जूठन लगी है। गौसाई जी ने स्नान किया। मंदिर में गए तो देखा कि ठाकुर जी के मुख पर तो लड्डू की जूठन लगी थी।
सच में रहस्य रस है ठाकुर जी की सेवा में। अधिकार रखिये श्री ठाकुर जी पर। सर्वस्व न्योछावर करके उनकी सेवा सुख मिलता है। अनहोनी होती है फिर सेवा की कृपा से। इसे सिर्फ श्री कृष्ण भक्त ही समझ सकते हैं। दूसरों को ऐसी बातें समझ नहीं आती। कृष्ण भक्त तो ठाकुर जी की हरेक कथा को अपने मन की आँखों से साक्षात् देख लेते है। उसी में आनंद लेते है। फिर दुनिया की भी परवाह नहीं करते। ठाकुर जी की तरफ जो सच्चे मन से बढ़ता है, फिर ठाकुर जी भी उसके जीवन में ऐसा खेल खेलते हैं कि जिसे वह अपना समझता है और ज़िंदगी भर अपना समझना चाहता है, जल्दी ही उसकी सारी पोल खोल देते हैं। और सच में जो सच्चे मन से ठाकुर जी की शरण आ गयो, उसे फिर संसार की चिंता नहीं रहती। उसकी चिंता फिर ठाकुर जी स्वयं करते हैं।
‘जय जय श्री राधे’
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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