समर्पित भक्त
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समर्पित भक्त
Image by Ian Lindsay from Pixabay
एक ब्राह्मण था। वह भगवान का महान भक्त था। वह मंदिर की पूजा में बहुत शानदार सेवा पेश करना चाहता था, लेकिन उसके पास धन नहीं था।
एक दिन की बात है। वह एक भागवत पाठ में बैठा हुआ था और उसने सुना कि नारायण मन में भी पूजे जा सकते हैं।
उसने इस अवसर का लाभ उठाया क्योंकि वह एक लंबे समय से सोच रहा था कि कैसे बहुत शान से नारायण की पूजा करूँ, लेकिन धन के अभाव की वजह से वह ऐसा नहीं कर पा रहा था।
जब वह यह समझ गया कि मन के भीतर नारायण की पूजा कर सकते हैं, तो गोदावरी नदी में स्नान करने के बाद, वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया।
अपने मन के भीतर वह बहुत खूबसूरत सिंहासन का निर्माण कर रहा था, सिंहासन पर गहनों के साथ लदी भगवान की मूर्ति को रखते हुए वह मन ही मन में भगवान का गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी नदी के जल के साथ अभिषेक कर रहा था।
फिर बहुत अच्छी तरह से भगवान का शृंगार कर रहा था और फूल, माला के साथ पूजा कर रहा था।
वह बहुत अच्छी तरह से भोजन पका रहा था और प्रसाद के लिए वह मीठे चावल पका रहा था। वह परखना चाहता था कि क्या वह बहुत गरम थे, क्योंकि प्रसाद में भोजन बहुत गर्म नहीं लिया जाता है। तो उसने भोजन में अपनी उंगली डाली और उसकी उंगली जल गई।
तब उसका ध्यान टूटा क्योंकि वहाँ कुछ भी नहीं था। केवल अपने मन के भीतर वह सब कुछ कर रहा था।
लेकिन उसने अपनी उंगली जली हुई देखी, तो वह चकित रह गया।
उस समय बैकुण्ठ से नारायण मुस्कुरा रहे थे।
देवी लक्ष्मी जी ने पूछा - आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं?
“मेरा एक भक्त अतिप्रभावी मानस पूजन कर रहा है। मेरे अन्य धनिक भक्त सब उच्च साधनों से, सामग्रियों से मेरी अर्चना करते है। लेकिन उनका मन भटकता रहता है। इस समर्पित भक्त का वास बैकुण्ठ मे होना चाहिए। अतः मेरे दूतों को तुरंत भेजो उसे बैकुण्ठ लाने के लिए।”
भक्ति-योग इतना अच्छा है कि भले ही आपके पास भगवान की भव्य पूजा के लिए साधन न हों, आप मन के भीतर यह कर सकते हो। मन से की गई पूजा में भी यह संभव है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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