अदभुत कहानी

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अदभुत कहानी

Image by Ralph from Pixabay

एक दिन मेरे पिता ने हलवे के 2 कटोरे बनाये और उन्हें मेज़ पर रख दिया।

एक के ऊपर 2 बादाम थे, जबकि दूसरे कटोरे में हलवे के ऊपर कुछ नहीं था।

फिर उन्होंने मुझे हलवे का कोई एक कटोरा चुनने के लिए कहा। क्योंकि उन दिनों तक हम गरीबों के घर बादाम आना मुश्किल था, मैंने 2 बादाम वाले कटोरे को चुना।

मैं अपने बुद्धिमान विकल्प/निर्णय पर खुद को बधाई दे रहा था और जल्दी-जल्दी मुझे मिला 2 बादाम वाला हलवा खा रहा था।

परंतु मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, जब मैंने देखा कि मेरे पिता वाले कटोरे के हलवे के नीचे 8 बादाम छिपे थे।

बहुत पछतावे के साथ मैंने अपने निर्णय में जल्दबाजी करने के लिए खुद को डांटा।

मेरे पिता मुस्कुराए और मुझे यह याद रखना सिखाया कि आपकी आँखें जो देखती हैं, वह हरदम सच नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि यदि आप स्वार्थ की अपनी आदत बना लेते हैं, तो आप जीत कर भी हार जाएंगे।

अगले दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए और टेबल पर रखे। एक कटोरे के शीर्ष पर 2 बादाम और दूसरा कटोरा जिसके ऊपर कोई बादाम नहीं था।

फिर से उन्होंने मुझे अपने लिए कटोरा चुनने को कहा। इस बार मुझे कल का संदेश याद था, इसलिए मैंने शीर्ष पर बिना किसी बादाम वाले कटोरे को चुना।

परंतु मेरे आश्चर्य करने के लिए इस बार इस कटोरे के हलवे के नीचे एक भी बादाम नहीं छिपा था।

फिर से मेरे पिता ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, “मेरे बच्चे, आपको हमेशा अनुभवों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी जीवन आपको धोखा दे सकता है या आप से चालें खेल सकता है। स्थितियों से कभी भी ज्यादा परेशान या दुःखी न हों, बस अनुभव को एक सबक के रूप में समझें, जो किसी भी पाठ्यपुस्तक से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

तीसरे दिन मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए।

पहले 2 दिन की ही तरह, एक कटोरे के ऊपर 2 बादाम, और दूसरे के शीर्ष पर कोई बादाम नहीं। मुझे उस कटोरे को चुनने के लिए कहा जो मुझे चाहिए था।

लेकिन इस बार, मैंने अपने पिता से कहा, “पिताजी, आप पहले चुनें, आप परिवार के मुखिया हैं और आप परिवार में सबसे ज्यादा योगदान देते हैं। आप मेरे लिए जो अच्छा होगा वही चुनेंगे।”

मेरे पिता मेरे लिए खुश थे।

उन्होंने शीर्ष पर 2 बादाम के साथ कटोरा चुना, लेकिन जैसे ही मैंने अपने कटोरे का हलवा खाया, कटोरे के हलवे के एकदम नीचे 4 बादाम थे।

मेरे पिता मुस्कुराए और मेरी आँखों में प्यार से देखते हुए उन्होंने कहा, “मेरे बच्चे, तुम्हें याद रखना होगा कि जब तुम भगवान पर सब कुछ छोड़ देते हो, तो वे हमेशा तुम्हारे लिए सर्वोत्तम का चयन करेंगे और जब तुम दूसरों की भलाई के लिए सोचते हो, अच्छी बातें स्वाभाविक तौर पर आपके साथ भी हमेशा होती रहेंगी।”

शिक्षा - बड़ों का सम्मान करते हुए उन्हें पहले मौका व स्थान देवें। बड़ों का आदर-सम्मान करोगे तो कभी भी खाली हाथ नहीं लौटोगे।

“अनुभव पूर्ण दृष्टि का ज्ञान व विवेक के साथ सामंजस्य हो जाये, बस यही सार्थक जीवन है।”

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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