कर्मों का हिसाब-किताब
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कर्मों का हिसाब-किताब
Image by hartono subagio from Pixabay
एक स्त्री थी जिसे 20 साल तक संतान नहीं हुई। फिर कर्म संजोग से 20 वर्ष के बाद उसे पुत्र संतान की प्राप्ति हुई। किन्तु दुर्भाग्यवश 20 दिन में ही वह संतान मृत्यु को प्राप्त हो गयी। वह स्त्री हद से ज्यादा रोई और उस मृत बच्चे का शव ले कर एक सिद्ध महात्मा जी के पास पहुँच गई।
वह महात्मा जी से रो-रो कर कहने लगी, मुझे मेरा बच्चा एक बार जीवित कर के दीजिये। मात्र एक बार मैं उसके मुख से “माँ” शब्द सुनना चाहती हूँ।
स्त्री के बहुत जिद करने पर महात्मा जी ने 2 मिनट के लिए उस बच्चे की आत्मा को वापिस बुलाया।
तब उस स्त्री ने उस आत्मा से कहा - तुम मुझे क्यों छोड़ कर चले गए मेरे बच्चे? मैं तुम से सिर्फ एक बार “माँ” शब्द सुनना चाहती हूँ।
तभी उस आत्मा ने कहा - कौन माँ? कैसी माँ? मैं तो तुम से कर्मों का हिसाब-किताब करने आया था।
स्त्री ने पूछा - कैसा हिसाब-किताब?
आत्मा ने बताया - पिछले जन्म में तुम मेरी सौतन थी और मेरी आँखों के सामने तू मेरे पति को ले गई। मैं बहुत रोई। तुम से अपना पति मांगा। पर तुम ने मेरी एक नहीं सुनी। तब मैं रो रही थी और आज तुम रो रही हो। बस! मेरा तुम्हारे साथ जो कर्मों का हिसाब था, वह मैंने पूरा किया और मर गया।
इतना कह कर वह आत्मा वापिस चली गयी।
उस स्त्री को यह सब देख और सुन कर ऐसा झटका लगा कि उसकी आंखें खुल गई। फिर उसे महात्मा जी ने समझाया कि देखो मैंने कहा था कि ये सब रिश्तेदार, माँ, पिता, भाई-बहन सब कर्मों के कारण जुड़े हुए हैं।
उस औरत ने महात्मा जी से कहा - जी, महात्मा जी! आप सच बोल रहे थे। अब मेरी आंखें खुल चुकी हैं। हम सब यहाँ पर कर्मों का हिसाब-किताब करने आये हैं। इसलिए सदा अच्छे कर्म करो ताकि हमें बाद में यह सब भुगतना न पड़े। वह स्त्री समझ गयी और अपने घर लौट गयी।
इसलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए। हमारा यह शरीर एक किराये का घर है। जैसे कि जब हम “किराए का मकान” लेते हैं तो “मकान मालिक” कुछ शर्तें रखता है।
मकान का किराया समय पर देना।
मकान में गंदगी नहीं फैलाना, उसे साफ-सुथरा रखना।
मकान मालिक का कहना मानना और मकान मालिक जब चाहे मकान को खाली करवा सकता है।
इसी प्रकार परमात्मा ने भी जो हमें यह शरीर दिया है, यह भी एक किराए का मकान ही है। हमें परमात्मा ने जब यह शरीर दिया है, तो ये सारी शर्तें हमारे लिये भी लागू होती हैं।
1. किराया है भजन-सिमरन।
2. गन्दगी (बुरे विचार और बुरी भावनायें) नहीं फैलानी।
3. जब मर्जी होगी परमात्मा इस शरीर को खाली करवा सकता है और आत्मा को वापिस बुला सकता है।
मतलब यह है कि यह जीवन हमे बहुत थोड़े समय के लिए मिला है। इसे लड़ाई-झगड़े कर के या मन में द्वेष भावना रख कर नहीं बल्कि प्रभु जी के नाम का सिमरन करते हुए बिताना चाहिए और हर समय उस सच्चे मालिक के आगे विनती करनी है कि -
‘हे मेरे प्रभु जी। इतनी कृपा करना कि हम आप की आज्ञा में रहें और भजन-सुमिरन करते रहें।’
यह जन्म, मनुष्य शरीर जो हमें मिला है, गुरु कृपा का प्रसाद समझें। हम इस की बेकदरी न करें और अपने हर श्वास के साथ नाम जपन और जीवन का राज समझें।
रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय॥
अर्थात् रात सो कर बिता दी, दिन खा कर बिता दिया। हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया। मानव जीवन का इस से दुःखद उपयोग और क्या हो सकता है? हीरे जैसे अनमोल जीवन का मूल्य पहचानो। इसे कौड़ियों के भाव न बिकने दो।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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Bahut Sundar
ReplyDeleteBhut sundar
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