त्योहार
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त्योहार
Image by Sergio Cerrato - Italia from Pixabay
त्योहार आ रहे हैं।
ऑफिस से निकल कर शर्मा जी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया कि पत्नी ने कहा था, एक दर्ज़न केले लेते आना।
तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए एक बीमार-सी दिखने वाली बुढ़िया माई दिख गयी।
वैसे तो वह फल हमेशा “राम आसरे फ्रूट भण्डार” से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया माई से ही खरीद लूँ?
उन्होंने बुढ़िया माई से पूछा, ‘माई, केले कैसे दिए?’
बुढ़िया माई बोली, ‘बाबूजी 20 रूपये दर्जन।’
शर्मा जी बोले, ‘माई 15 रूपये दूंगा।’
बुढ़िया माई ने कहा, ‘18 रूपये दे देना, दो पैसे मैं भी कमा लूंगी।’
शर्मा जी बोले, ‘15 रूपये लेने हैं तो बोल।’
बुझे चेहरे से बुढ़िया ने ‘न’ कहा।
शर्मा जी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर केले का भाव पूछा तो वह बोला, ‘28 रूपये दर्जन हैं। बाबूजी, कितने दर्जन दूँ?’
शर्मा जी बोले, ‘5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, भाव ठीक लगाओ।’
तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया।
बोर्ड पर लिखा था - ‘मोल भाव करने वाले माफ़ करें।’
शर्मा जी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा। उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर मोड़ दिया।
सोचते-सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए।
बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली, ‘केले दे दूँ बाबूजी, पर भाव 18 रूपये से कम नहीं लगाउंगी।’
शर्मा जी ने मुस्कराकर कहा, ‘माई! एक नहीं दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।’
बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा।
केले देते हुए बोली, ‘बाबूजी मेरे पास थैली नहीं है।’
फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था, तो मेरी भी छोटी-सी दुकान थी। सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर। आदमी की बीमारी में दुकान चली गयी, आदमी भी नहीं रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं। किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नहीं है, जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।
इतना कहते-कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी और उसकी आंखों में आंसू आ गए।
शर्मा जी ने 50 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो वह बोली, ‘बाबूजी! मेरे पास छुट्टे नहीं हैं।’
शर्मा जी बोले, ‘माई! चिंता मत करो, रख लो, अब मैं तुमसे ही फल खरीदूंगा और कल मैं तुम्हें 500 रूपये भी दूंगा। धीरे-धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना।’
बुढ़िया माई कुछ कह पाती, उससे पहले ही शर्मा जी घर की ओर रवाना हो गए।
घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, ‘न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से मोल-भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर मुंह-मांगे पैसे दे आते हैं? शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं।’
अगले दिन शर्मा जी ने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा, ‘माई! लौटाने की चिंता मत करना। जो मैं फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे।’
जब शर्मा जी ने ऑफिस में ये किस्सा बताया, तो सबने बुढ़िया माई से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया।
तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया।
बुढ़िया माई अब बहुत खुश है। उचित खान-पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा रहने लगा।
हर दिन शर्मा जी और ऑफिस के दूसरे लोगों को दुआ देती नहीं थकती।
शर्मा जी के मन में भी अपनी बदली हुई सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है।
जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों! अपनी पूरी जिंदगी में किये गए सभी कार्यों से ज्यादा संतोष मिलेगा।
सोच को बदलो जिंदगी जीने का नजरिया बदल जायेगा।
आगे त्योहार ही त्योहार हैं। त्योहारों की खरीदी ऐसी जगह से करें, जो आपकी खरीदी की वजह से अपना त्योहार मना सकें।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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