क्या हम पूर्ण सुखी हैं?

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क्या हम पूर्ण सुखी हैं?

Image by Ulrike Mai from Pixabay

पुराने समय में एक राजा था। राजा के पास सभी सुख-सुविधाएं थी और असंख्य सेवक-सेविकाएं हर समय उनकी सेवा में उपलब्ध रहते थे।

उन्हें किसी चीज की कमी नहीं थी। फिर भी राजा अपने जीवन में सुखी नहीं था, क्योंकि वह अपने स्वास्थ्य को लेकर काफी परेशान रहता था। वह सदा बीमारियों से घिरा रहता था।

राजा का उपचार सभी बड़े-बड़े वैद्यों द्वारा किया गया, परंतु राजा को स्वस्थ नहीं कर सके। समय के साथ राजा की बीमारी बढ़ती जा रही थी। इतने अच्छे राजा की बढ़ती हुई बीमारी से राजदरबार चिंतित हो गया।

राजा की बीमारी दूर करने के लिए दरबारियों द्वारा नगर में ऐलान करवा दिया गया कि जो भी राजा का स्वास्थ्य ठीक करेगा, उसे असंख्य स्वर्ण मोहरें दी जाएंगी।

यह सुनकर एक वृद्ध राजा का इलाज करने राजा के महल में गया।

वृद्ध ने राजा के पास आकर कहा - ‘महाराज! आप आज्ञा दें, तो आपकी बीमारी का इलाज मैं कर सकता हूँ।’

राजा की आज्ञा पाकर वह बोला - ‘आप किसी पूर्ण सुखी मनुष्य के वस्त्र पहनिए, आप अवश्य स्वस्थ और सुखी हो जाएंगे।’

वृद्ध की बात सुनकर राजा के सभी मंत्री और सेवक जोर-जोर से हंसने लगे।

इस पर वृद्ध ने कहा - ‘महाराज आपने सारे उपचार करके देख लिए हैं, यह भी करके देखिए। आप अवश्य स्वस्थ हो जाएंगे।’

राजा ने उसकी बात से सहमत होकर सेवकों को सुखी मनुष्य की खोज में राज्य की चारों दिशाओं में भेज दिया, परंतु उन्हें कोई पूर्ण सुखी मनुष्य नहीं मिला।

प्रजा में सभी को किसी न किसी बात का दुःख था।

अब राजा स्वयं सुखी मनुष्य की खोज में निकल पड़े। अत्यंत गर्मी के दिन होने से राजा का बुरा हाल हो गया और वह एक पेड़ की छाया में विश्राम हेतु रुका।

तभी राजा को एक मज़दूर इतनी गर्मी में मज़दूरी करता दिखाई दिया।

राजा ने उससे पूछा - ‘क्या, आप पूर्ण सुखी हो?’

मज़दूर खुशी-खुशी और सहज भाव से बोला - ‘भगवान की कृपा से मैं पूर्ण सुखी हूँ।’

यह सुनते ही राजा भी अति प्रसन्न हुआ। उसने मज़दूर को ऊपर से नीचे तक देखा तो मज़दूर ने सिर्फ धोती पहनी थी और वह गाढ़ी मेहनत से पूरा पसीने से तर था।

राजा यह देखकर समझ गया कि श्रम करने से एक आम मज़दूर भी सुखी है और राजा कोई श्रम नहीं करने की वजह से ही बीमारी से घिरे रहते हैं।

राजा ने लौटकर उस वृद्ध का उपकार मान उसे असंख्य स्वर्ण मुद्राएं दी। अब राजा स्वयं आराम और आलस्य छोड़कर श्रम करने लगे। परिश्रम से कुछ ही दिनों में राजा पूर्ण स्वस्थ और सुखी हो गए।

कथा का सार यही है कि आज हम भौतिक सुख-सुविधाओं के इतने आदी हो गए हैं कि हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति क्षीण होती जा रही है। इससे हम जल्द ही बीमारी की गिरफ्त में आ जाते हैं।

अतः स्वस्थ और सुखी जीवन का रहस्य यही है कि थोड़ा बहुत शारीरिक परिश्रम जैसे योग, ध्यान, भ्रमण आदि अवश्य करें।

एस्ट्रोलॉजर विपेंद्र कुमार उपाध्याय

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी

पंडित महामना मदनमोहन मालवीय पुरस्कार से सम्मानित।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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